धर्मेंद्र कुमार
चीन राजनीतिक रूप से कितना 'भरोसेमंद' है, इसका अहसास भारत को साल 1962 के युद्ध के बाद से ही हो जाना चाहिए और व्यापार के मोर्चे पर कितना भरोसेमंद है, यह अब आने वाले कुछ दिनों में पता लगने वाला है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि देश के कई 'बड़े' नेताओं का मानना है कि यदि किसी देश के साथ अच्छे 'व्यापारिक' रिश्ते हैं तो इतने ही अच्छे 'कूटनीतिक' रिश्ते बनने में देर नहीं लगती। और... यह पूरी तरह 'गलत' सिद्ध होने जा रहा है।
चीन लगातार अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन कर रहा है। चीन के इस कदम से युआन अन्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले काफी सस्ता हो गया है और अभी और सस्ता होगा। चीन को इसका फायदा उनके निर्यात में बढ़ोतरी के रूप में मिलेगा। चीन के इस कदम से भारतीय उत्पादों के लिए ग्लोबल बाजार, यहां तक कि स्थानीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। मतलब यह कि अब चीन से आयात और बढ़ जाएगा क्योंकि अवमूल्यन के बाद चीन से आने वाला हर सामान अब और अधिक सस्ता हो जाएगा। इसके चलते, यहां के उत्पादकों को चीन के सस्ते सामान से कड़ी स्पर्धा करनी पड़ेगी। भारत में बाजार पहले से ही चीन के सामान से पटा पड़ा है, यहां तक कि पूजा के लिए जरूरी लक्ष्मी-गणेश भी चीन से ही बनकर आ रहे हैं।
अब इसका एक इलाज यह नजर आ रहा है कि भारत रुपये का अवमूल्यन करे... ताकि निर्यात के जरिए कुछ संतुलन बनाया जा सके। लेकिन, ऐसा करने से डॉलर की तुलना में रुपया और गिर जाएगा। वर्तमान में यह 65 रुपये के ऊपर है। बिना अवमूल्यन के ही इसके 67 रुपये प्रति डॉलर तक जाने की आशंका है। यदि रुपये का अवमूल्यन हुआ तो यह आसानी से 70 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर सकता है। अब आगे आने वाले दिनों की बस कल्पना ही करिए...





