सामरिक महत्व, सतत विकास का अद्भुत उदाहरण है ग्रेट निकोबार परियोजना


ग्रेट निकोबार परियोजना एक सामरिक पहल है, जिसका उद्देश्य अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति को सशक्त बनाना है। यह परियोजना बंदरगाह-आधारित विकास और सटीक पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ-साथ स्थानीय मूल समुदायों के संरक्षण के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।

सामरिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनूठे संगम के माध्यम से, यह परियोजना सुनिश्चित करती है कि ग्रेट निकोबार का विकास न केवल समावेशी और सतत हो, बल्कि राष्ट्रहित के भी पूर्णतः अनुरूप हो।

Read in English: An initiative of Strategic Importance and Sustainable Development

इस परियोजना में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जिसकी क्षमता 14.2 मिलियन टीईयू (ट्वेंटी-फुट इक्विवैलेंट यूनिट) है; ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जिसकी क्षमता व्यस्त समय में 4000 पैसेंजर प्रति घंटा होगी; तथा ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 450 मेगावोल्ट एम्पीयर क्षमता का एक हाइब्रिड बिजली संयंत्र, जो प्राकृतिक गैस और सौर ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों पर आधारित होगा, शामिल हैं।

यह विकास कार्य एक संवेदनशील और समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें स्थानीय मूल समुदायों की आवश्यकताओं और द्वीप के पर्यावरणीय संसाधनों के संरक्षण को सर्वोपरि रखा गया है। यह योजना सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों का सूक्ष्मता से मूल्यांकन करती है तथा ऐसे विकल्पों को प्राथमिकता देती है जो पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों के मध्य एक आदर्श संतुलन स्थापित करते हों।

भारतीय बंदरगाहों में विशालकाय पोतों के लिए आवश्यक गहराई वाले बर्थ की कमी है। इसी कारण, भारतीय कार्गो को कोलंबो और सिंगापुर के माध्यम से भेजा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत को भारी राजस्व की हानि होती है। म्यांमार, चीन और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश इस समुद्री व्यापार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए तीव्रता से गहरे पानी की बुनियादी सुविधाओं का विस्तार कर रहे हैं।

इस संदर्भ में, आईलैंड डेवलपमेंट प्रोग्राम के अंतर्गत ग्रेट निकोबार द्वीप के समग्र विकास के हिस्से के रूप में गैलाथिया बे में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट विकसित किया जा रहा है। प्रस्तावित हवाई अड्डे, टाउनशिप और पावर प्लांट के साथ मिलकर, गैलाथिया बे ट्रांसशिपमेंट पोर्ट पूरे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के एक प्रमुख बुनियादी ढांचागत घटक के रूप में स्थापित है। यह बंदरगाह सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ईस्ट-वेस्ट इंटरनेशनल शिपिंग रूट के अत्यंत निकट, लगभग 40 नॉटिकल मील की दूरी पर, स्थित है और यहां 20 मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई है। अपनी इसी रणनीतिक स्थिति के कारण यह 'गेटवे' और 'ट्रांसशिपमेंट' दोनों प्रकार के कार्गो को आकर्षित करने में सक्षम है, जिससे कोलंबो, सिंगापुर और क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम होगी। इस परियोजना को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा उपस्थिति को सुदृढ़ करने, द्वीपों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और इस क्षेत्र के समग्र विकास को गति देने के लिए तैयार किया गया है।

इस द्वीप पर विश्व स्तरीय पर्यावरणीय संसाधन उपलब्ध हैं, जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने की अपार क्षमता रखते हैं। कनेक्टिविटी में सुधार और द्वीप को पर्यटन के लिए खोलने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा अनिवार्य है। भौगोलिक दृष्टि से यह द्वीप सेनैंग सिटी, फुकेत द्वीप और लंगकावी द्वीप जैसे प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थलों के अत्यंत निकट है। वर्तमान में पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डा सालाना लगभग 1.8 मिलियन यात्रियों का आवागमन संभालता है। ऐसी संभावना है कि नया हवाई अड्डा अपने उद्घाटन के समय कम से कम 10 लाख यात्रियों को सेवा प्रदान करेगा, जिसकी संख्या भविष्य में बढ़कर एक करोड़ यात्री प्रति वर्ष तक पहुंचने का अनुमान है।

प्रस्तावित टाउनशिप का उद्देश्य द्वीप के बंदरगाह-आधारित विकास से उत्पन्न होने वाली आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत आवश्यकताओं को पूरा करना है। यह समग्र एकीकृत विकास ढांचे के अनुरूप, कार्यरत कर्मियों, सेवा प्रदाताओं और संबंधित आर्थिक गतिविधियों के लिए आवश्यक शहरी बुनियादी ढांचा प्रदान करेगी।

ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, हवाई अड्डे और संबंधित शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के सुचारू संचालन के लिए विश्वसनीय विद्युत इंफ्रास्ट्रक्चर अपरिहार्य है। वर्तमान में, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ऊर्जा का मुख्य स्रोत डीजल जेनरेटिंग सेट हैं। इस विद्युत संयंत्र का प्राथमिक उद्देश्य बिना किसी व्यवधान के उच्च गुणवत्ता वाली और विश्वसनीय विद्युत ऊर्जा प्रदान करना है। इस प्रणाली को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि किसी एक मुख्य पुर्जे के खराब होने पर भी बिजली की आपूर्ति निरंतर बनी रहे। इसके अतिरिक्त, ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए अक्षय ऊर्जा स्रोतों की भी योजना बनाई जाएगी। निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति द्वीप की जीडीपी में वृद्धि सुनिश्चित करने वाला एक प्रमुख कारक है।

ग्रेट निकोबार परियोजना को तीन अलग-अलग चरणों में कार्यान्वित किया जा रहा है। चरण I (2025–35, 72.12 वर्ग किमी), चरण II (2036–41, 45.27 वर्ग किमी), तथा चरण III (2042–47, 48.71 वर्ग किमी) होगा

यह परियोजना कुल 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें 35.35 वर्ग किलोमीटर राजस्व भूमि और 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि सम्मिलित है। यह चरणबद्ध दृष्टिकोण न केवल व्यवस्थित बुनियादी ढांचे के विकास को संभव बनाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक चरण में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और जनजातीय कल्याण संबंधी उपायों को प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जाए।

इस परियोजना के सामरिक और आर्थिक महत्व को हिंद महासागर क्षेत्र में ग्रेट निकोबार को एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता से बल मिलता है। इस परियोजना में जमीन का सही इस्तेमाल करने और पर्यावरण का पूरा ख्याल रखने पर जोर दिया गया है, ताकि आने वाले समय में इस पूरे इलाके को बड़ा फायदा मिल सके। साथ ही, इस काम में पर्यावरण से जुड़े सभी नियमों और कानूनी स्वीकृतियों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।

सतत विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सही ढंग से उपयोग सुनिश्चित करने हेतु पर्यावरण प्रभाव आकलन एक प्रमुख साधन है। ईआईए अधिसूचना, 2006 के नियमों के अनुसार, विशेष श्रेणियों की परियोजनाओं के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य है। अलग-अलग क्षेत्रों की विशेषज्ञ समितियां परियोजना के प्रस्तावों की गहराई से जांच करती हैं, पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करती हैं और उसी आधार पर परियोजना को मंजूरी देने या न देने की अनुशंसा करती हैं।

परियोजना ने स्क्रीनिंग (छंटनी), स्कोपिंग (कार्य-क्षेत्र निर्धारण), जन-परामर्श और मूल्यांकन की एक विस्तृत प्रक्रिया के बाद, 'ईआईए अधिसूचना, 2006' के तहत पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त कर ली है। पर्यावरणीय स्वीकृति में वायु, जल, ध्वनि, अपशिष्ट प्रबंधन, समुद्री पारिस्थितिकी, मानव स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन से संबंधित 42 विशिष्ट शर्तें सम्मिलित हैं, जिन्हें एक सशक्त पर्यावरण प्रबंधन योजना के माध्यम से क्रियान्वित किया जाएगा।

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, सलीम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र, भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे विशेषज्ञ संस्थानों ने इस संबंध में विस्तृत अध्ययन किए हैं। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने स्पष्ट किया है कि उचित सुरक्षा उपायों के साथ इस परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है। प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण, और शोंपेन एवं निकोबारी समुदायों के कल्याण की निगरानी के लिए तीन स्वतंत्र निगरानी समितियों का गठन किया गया है।

ग्रेट निकोबार परियोजना के अंतर्गत पर्यावरणीय संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए अंडमान और निकोबार द्वीपों के कुल वन क्षेत्र का मात्र 1.82 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में लाया जाएगा। चिह्नित क्षेत्र में वृक्षों की अनुमानित संख्या 18.65 लाख है, किंतु सरकार ने इसे न्यूनतम रखने का प्रयास किया है और अधिकतम 7.11 लाख वृक्ष ही काटे जाने की संभावना है, जो 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में विस्तृत हैं। वृक्षों की यह कटाई एक साथ न होकर, विभिन्न परियोजनाओं के चरणबद्ध विकास के अनुरूप क्रमबद्ध तरीके से की जाएगी।

पर्यावरणीय संतुलन सुनिश्चित करने के लिए 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को 'ग्रीन जोन' के रूप में संरक्षित रखा जाएगा, जहां एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। चूंकि द्वीपों पर पहले से ही 75 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र उपलब्ध है, अतः नियमों के अनुसार वन क्षेत्र को होने वाली क्षति की भरपाई का कार्य हरियाणा में किया जा रहा है। इसके लिए प्रथम चरण के 48.65 वर्ग किलोमीटर वन डायवर्जन के बदले हरियाणा में 97.30 वर्ग किलोमीटर भूमि को वनीकरण के लिए चिह्नित किया गया है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता दोहराते हुए, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के अंतर्गत अब तक 2.4 मिलियन पौधे रोपे जा चुके हैं।

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह, मंगोलॉयड मूल की दो प्रमुख जनजातियों का निवास स्थल है। यहां शोंपेन समुदाय निवास करते हैं, जो मुख्य रूप से शिकार और संग्राहक हैं। इनके साथ ही यहां निकोबारी समुदाय भी रहते हैं, जो तटीय बस्तियों में बसे हुए हैं और अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से मछली पकड़ने पर निर्भर हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना की रूपरेखा अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ तैयार की गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निकोबारी और शोंपेन समुदायों को अपने मूल स्थान से विस्थापित न होना पड़े। परियोजना क्षेत्र के भीतर जनजातीय आवास केवल न्यू चिंगेन और राजीव नगर में स्थित हैं और प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि इन समुदायों के पुनर्वास या विस्थापन का कोई भी प्रस्ताव नहीं है।

ग्रेट निकोबार परियोजना, शोंपेन नीति 2015 और जरावा नीति 2004 के सिद्धांतों के पूरी तरह अनुरूप है। ये नीतियां यह अनिवार्य करती हैं कि किसी भी बड़े स्तर के विकास प्रस्ताव में 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों' के कल्याण और उनकी अखंडता को सर्वोपरि प्राथमिकता दी जाए तथा एक व्यवस्थित परामर्श प्रक्रिया का पालन किया जाए। जनजातीय हितों की सुरक्षा हेतु, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एक 'स्वतंत्र निगरानी समिति' का गठन अनिवार्य किया गया है। यह समिति निर्माण और संचालन—दोनों चरणों के दौरान शोंपेन और निकोबारी समुदायों को प्रभावित करने वाले विषयों की कड़ी निगरानी करेगी।

इसके अतिरिक्त, समुदायों की सुरक्षा, संरक्षण और सर्वांगीण कल्याण सुनिश्चित करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय, जनजातीय कल्याण निदेशालय, अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति और भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण जैसे विशेषज्ञ संस्थानों के साथ विस्तृत परामर्श किया गया है।

परियोजना के कार्यान्वयन का ढांचा संविधान के अनुच्छेद 338ए (9) के प्रावधानों के पूर्णतः अनुरूप है, जिसमें क्षेत्र के अनुसूचित जनजातियों और'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के हितों के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह प्रशासन ने इस विकास परियोजना के क्रियान्वयन के अतिरिक्त इन जनजातियों को प्रभावित करने वाला कोई भी नया नीतिगत कदम नहीं उठाया है। यह इस तथ्य को पुष्ट करता है कि पूरी योजना प्रक्रिया के केंद्र में जनजातीय अधिकार और उनका कल्याण सर्वोपरि बना हुआ है।

वर्तमान में, ग्रेट निकोबार द्वीप का 751.070 वर्ग किमी क्षेत्र आधिकारिक रूप से 'जनजातीय आरक्षित क्षेत्र' के रूप में चिह्नित है। विकास परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित कुल 166.10 वर्ग किमी भूमि में से, 84.10 वर्ग किमी क्षेत्र जनजातीय आरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हालांकि, इस हिस्से में से 11.032 वर्ग किमी भूमि का वर्ष 1972 से ही नियमितीकरण किया जा चुका है और इसे 'राजस्व भूमि' के रूप में उपयोग किया जा रहा है।

परिणामस्वरूप, प्रभावी रूप से शेष 73.07 वर्ग किमी क्षेत्र को परियोजना के उद्देश्यों हेतु डी-नोटिफाई किया जा रहा है। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए, 76.98 वर्ग किमी नई भूमि को पुनः 'जनजातीय आरक्षित क्षेत्र' के रूप में अधिसूचित किया जा रहा है। इस प्रकार, जनजातीय आरक्षित क्षेत्र में 3.912 वर्ग किमी की शुद्ध वृद्धि होगी। विशेष रूप से, पहले चरण में केवल 40.01 वर्ग किमी जनजातीय क्षेत्र परियोजना में शामिल है, जिसमें से 11.032 वर्ग किमी भूमि 1972 से ही राजस्व उपयोग के अधीन है।

भौगोलिक रूप से यह द्वीप भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील और चक्रवात संभावित क्षेत्र में स्थित है। इसे ध्यान में रखते हुए, एक व्यापक जोखिम आकलन अध्ययन किया गया है, जिसमें प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ मानव-जनित जोखिमों को भी शामिल किया गया है। आपात स्थितियों के लिए पूर्ण तैयारी सुनिश्चित करने हेतु एक संवेदनशीलता एवं आपदा प्रबंधन योजना तैयार की गई है। इसके अतिरिक्त, गैस और सौर ऊर्जा पर आधारित एक हाइब्रिड पावर प्लांट की स्थापना की जा रही है। यह न केवल कार्बन उत्सर्जन को कम करेगा, बल्कि किसी भी संकट की स्थिति में बिजली आपूर्ति की निरंतरता और आपदा-सक्षमता सुनिश्चित करेगा।

कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार परियोजना इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार समग्र विकास के माध्यम से आर्थिक प्रगति, पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक समावेश के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित किया जा सकता है। यह परियोजना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री उपस्थिति और रणनीतिक पहुंच को मजबूत करने के लिए ग्रेट निकोबार की महत्वपूर्ण स्थिति का लाभ उठाती है और साथ ही, इसमें पर्यावरण सुरक्षा और जनजातीय कल्याण के प्रभावी सुरक्षा तंत्र को भी समाहित किया गया है। वन्यजीव संरक्षण, वन क्षेत्र को होने वाली क्षति की भरपाई, आपदा आपदा की तैयारी और सामाजिक समावेश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के माध्यम से, सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि विकास का मार्ग पर्यावरण की कीमत पर नहीं, बल्कि उसके साथ समन्वय बिठाकर प्रशस्त किया जा सकता है।

अंततः, यह परियोजना पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भविष्य की बड़े स्तर की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करती है। यह सिद्ध करती है कि अर्थव्यवस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं, ताकि राष्ट्रीय और वैश्विक हितों की सर्वोत्तम सेवा की जा सके।



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