मथुरा। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के संयुक्त निदेशक डाॅं0 जेपी शर्मा ने यहां कहा कि किसानों को खरीफ की फसलों, उनकी किस्मों तथा बुवाई के समय आदि का निर्धारण मानसूनी वर्षा में कमी के पूर्वानुमानों को देखते हुए करना चाहिए। उन्होंने कहाकि यदि किसानों ने खेती के पुराने ढर्रे छोड़कर खेती की आधुनिक तकनीकि अपनाई तो वे अल्पसिंचित एवं वर्षा आधारित क्षेत्रों में अक्सर होने वाली कम पानी की समस्या से भी आसानी से निपट सकते हैं। लेकिन इसके लिए किसानों को उन्नतशील तरीके अपनाने होंगे। उन्होंने बताया कि आइएआरआई ने अब तक कई फसलों की ऐसी किस्में विकसित कर ली हैं जिनका उपयोग विषम परिस्थितियों में आसानी से किया जा सकता है। इसीलिए किसानों को विशेष शिविर लगाकर इन किस्मों की जानकारी दी जा रही है। वे उत्तर प्रदेश बीज उत्पादक संघ के सहयोग से मथुरा के एक सीमावर्ती गांव भूरेका में आयोजित एक विशेष किसान गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उनके साथ आइएआरआइ के अलग अलग विभागों के विशेषज्ञों का एक दल भी किसानों को जानकारी देने के लिए यहां पहंुचा था। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उसके आसपास के इलाकों में शिविर लगाकर किसानों को सूखे की स्थिति से निपटने की तकनीकि का प्रशिक्षण दिए जाने की जिम्मेदारी दी गई है। जिसके तहत सोमवार को मथुरा के भूरेका गांव में पहला शिविर लगाकर शुरूआत की गई। डाॅ0 शर्मा ने बताया कि मंगलवार को पलवल, बुधवार को अलवर तथा गुरूवार को मुजफ्फर नगर में शिविर लगाए जांएगे। मेवात व पटौदी में भी स्थानीय कृषि विकास कंेद्रों के माध्यम से ऐेसे शिविर लगाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसके अलावा डीडी किसान चैनल, अनुसंधान संस्थान की वेबसाइट, किसान पोर्टल आदि अन्य अनेक माध्यमों से भी किसानों को संबंधित जानकारी मुहैया कराई जा रही है। फिर भी कोई किसान चाहे तो निःशुल्क टोल नंबरों पर फोन कर अपने सवाल का जवाब प्राप्त कर सकता है। उन्होंने बताया कि भले ही मौसम विभाग के प्रारंभिक आंकलन मंे 10 से 12 प्रतिशत कम वर्षा होने का अनुमान लगाया गया हो, फिर भी कृषि वैज्ञानिक सभी प्रकार की संभावनाओं का आंकलन कर आगे बढ़ रहे हैं। किसानों को भी लगातार उसी के अनुसार सूचनाएं देने का कार्यक्रम तय किया गया है। संयुक्त निदेशक ने बताया कि आइएआरआइ जून में इस प्रकार के 7-8 शिविर आयोजित करने के पश्चात जुलाई में भी ऐसे शिविर आयोजित करेगी। वैज्ञानिकों के दल में आए संस्थान के आनुवांशिकी विभाग के प्रभारी एवं धान की कई उन्नतशील किस्में विकसित करने वाले डाॅ. एके सिंह ने कम पानी में होने वाली खरीफ की फसलों तथा उनकी किस्में की जानकारी दी।





