दो हारने वालों की कहानी : एक ने हार पचाई, दूसरे ने हार से की लड़ाई


हार भी अजीब चीज़ होती है। किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल। कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियां देता रहता है।

हालिया चुनावों ने भारत को दो ऐसे “हारने वाले” दिखाए, जिनकी हार से ज्यादा दिलचस्प उनका बर्ताव था। एक तरफ तमिलनाडु में एमके स्टालिन। दूसरी तरफ बंगाल में ममता बनर्जी। दोनों सत्ता से बाहर हुए। दोनों को जनता ने झटका दिया। लेकिन दोनों ने हार का मतलब अलग-अलग समझा।

स्टालिन ने कहा, “जनादेश (लोकमत) स्वीकार है।” ममता बोलीं, “जनादेश नहीं, साज़िश हुई है।” बस, यहीं से दो रास्ते अलग हो गए।

तमिल राजनीति का पुराना उसूल है, “सत्ता आती-जाती है, संगठन बचा रहना चाहिए।” द्रविड़ राजनीति केवल तमिल अस्मिता का नारा नहीं रही। यह सामाजिक न्याय, भाषा के सम्मान और केंद्र के अति नियंत्रण के खिलाफ एक लंबा आंदोलन रहा है। स्टालिन उसी परंपरा के वारिस हैं। इसलिए हार के बाद भी उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर रोने नहीं भेजा। उन्होंने उन्हें अगले चुनाव की तैयारी में लगा दिया।

यह राजनीति कम और शतरंज का खेल ज्यादा लगता है। राजा गिरा है, खेल खत्म नहीं हुआ। स्टालिन जानते हैं कि जनता कभी-कभी गुस्से में सरकार बदल देती है, लेकिन वह स्थिर और गंभीर विपक्ष को पूरी तरह खारिज नहीं करती। हार को गरिमा  से स्वीकार करना भी एक राजनीतिक पूंजी होती है।

उधर, बंगाल में ममता बनर्जी का अंदाज़ बिल्कुल अलग रहा। उन्होंने हार को फैसला नहीं माना, बल्कि लड़ाई का अगला दौर समझ लिया। चुनाव आयोग पर सवाल। संस्थाओं पर आरोप। साज़िश की बातें। समर्थकों को जोश में रखने की कोशिश।

यह रणनीति भी नई नहीं है। भारतीय राजनीति में कई नेता हार के बाद “शहीद” बनने की कोशिश करते हैं। क्योंकि कभी-कभी पीड़ित दिखना, पराजित दिखने से आसान होता है। लेकिन, इसमें खतरा बड़ा है।

अगर हर हार मशीन, संस्था, आयोग और दुश्मनों की चाल बन जाए, तो फिर आत्ममंथन  कौन करेगा? राजनीति में आईना सबसे खतरनाक चीज़ होता है। बहुत से नेता आईना तोड़ देना पसंद करते हैं।

ममता की राजनीति लंबे समय तक संघर्ष और सड़क की राजनीति पर टिकी रही। उन्होंने वामपंथ को हराया। भाजपा को चुनौती दी। खुद को “दीदी” बनाकर जनता से भावनात्मक रिश्ता जोड़ा। लेकिन, हर आंदोलनकारी नेता की सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि वह सत्ता में रहते हुए भी आंदोलनकारी मुद्रा छोड़ नहीं पाता। यही बंगाल की मौजूदा त्रासदी है। हार के बाद भी तलवार म्यान में नहीं गई।

स्टालिन की राजनीति संस्था बचाने वाली दिखती है। ममता की राजनीति व्यक्तित्व बचाने वाली। फर्क छोटा लगता है, लेकिन लोकतंत्र की दिशा तय करता है। 

तमिलनाडु की राजनीति दशकों से विचारधारा के सहारे चलती रही है। वहां पार्टियां केवल चेहरे पर नहीं टिकतीं। द्रविड़ आंदोलन ने संगठन को व्यक्ति से ऊपर रखा। शायद यही कारण है कि डीएमके हारकर भी बिखरी हुई नहीं दिखती।

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का चेहरा ही पार्टी बन गया। जब चेहरा घायल होता है, पूरी पार्टी बेचैन दिखने लगती है।

यह केवल दो राज्यों की कहानी नहीं है। यह भारतीय क्षेत्रीय राजनीति का आईना है। दिल्ली से लड़ना आसान है। खुद से लड़ना मुश्किल है।

स्टालिन अभी विपक्ष में रहकर अगली सरकार बनने की तैयारी कर रहे हैं। ममता अभी भी पिछली हार से मुकदमा लड़ रही हैं। जनता दोनों को देख रही है।

एक नेता कह रहा है, “हम लौटेंगे।” दूसरा कह रहा है, “हमें हराया ही नहीं गया।” लोकतंत्र में शोर हमेशा ताकत नहीं होता। कई बार खामोशी ज्यादा खतरनाक तैयारी होती है।

भारतीय राजनीति का पुराना मुहावरा है, “हारने वाला वही नहीं जो चुनाव हार जाए, हारने वाला वह है जो सीखना छोड़ दे।” 2026 की राजनीति में दोनों हार गए। लेकिन, शायद असली सवाल यह नहीं कि कौन हारा। असल सवाल यह है कि कौन हार से बड़ा निकला।



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