पांचवें दिन सत्संग मेला के अंतिम दिन उपदेश देते सतीश चन्द्र
मथुरा। जयगुरुदेव आश्रम में पाँच दिवसीय वार्षिक भण्डारा सत्संग-मेला के अन्तिम दिन राष्ट्रीय उपदेशक सतीश चन्द्र ने कहा जीवात्मा अजर-अमर है। ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन सहस सुखराशी। यहाँ सभी वस्तुओं का विनाश होना निश्चित ह,ै केवल सूरत अविनाशी है। यहाँ जो जन्म-मरण देखते हैं वह शरीर से सम्बन्धित है। ये शरीर की परिस्थितियाँ है जो बदलती रहती है। जीवात्मा को एक शरीर से निकालकर दूसरे में बन्द कर दिया जाता है। सुरतों का घर सतलोक है, वहाँ कोई न कर्म है और न कोई शरीर है। वहाँ सुरतें चेतन और प्रकाश रूप में है। आत्मा-परमात्मा का विषय नैतिक मूल्यों पर आधारित आध्यात्मिक विषय है, जो शुद्ध वैज्ञानिक तथ्य है। महापुरुषों ने बताया है कि मनुष्य शरीर से साधना कर अपने सच्चे घर सतलोक को जा सकते हैं। अन्य किसी भी शरीर में साधना नहीं किया जा सकता है। इसलिए इस अवसर को बेगार के कामों में खत्म न करें। सन्तों को इस बात की जानकारी होती है कि काल प्रभु संचित कर्मों को कहाँ छिपा कर रखते हैं। जिस दिन सन्त जीव को नामदान देते हैं, नामदान लेने के बाद यदि जीव अपने घर जाने का संकल्प बना लेता है तो गुरु कृपा से वह जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाता है। इसलिये मनुष्य को सतगुरु की खोजकर उनकी शरण लेकर अपना कार्य कर लेना चाहिये।





