जब राजस्थान में चली स्वाधीनता आन्दोलन की बयार...

राजस्थान में 1857 की लड़ाई  हालांकि राजस्थान के कई राजाओं ने 1857 की क्रान्ति में अंग्रेजों की मदद की थी लेकिन कुछ क्षेत्रों में बगावत भी हुई। 21 अगस्त, 1857 में जोधपुर राज्य में स्थित एरिनपुरा छावनी में ब्रिटिश फौज के कुछ भारतीयों ने बगावत कर दिल्ली की ओर कूच किया। रास्ते में वे बागी सैनिक आउवा पर ठहरे जहां के ठाकुर कुशलसिंह चापावत उनके नेता बने। आसपास के अन्य ठाकुर भी अपनी सेना लेकर उनके साथ हो गए।  अजमेर के चीफ कमिश्‍नर पैट्रिक लारेन्स ने जोधपुर के महाराजा से सेना भेजने की प्रार्थना की। उन्होंने जो सेना भेजी वह बागी सैनिकों से हार गई। उसके बाद पैट्रिक लारेन्स और जोधपुर का राजनीतिक एजेंट मेसन सशैत्‍य आउवा पहुंचे। दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजी सेना हार गई।  गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग को जब पता चला तो उसने जनवरी 1858 को पालनपुर और नसीराबाद से एक बड़ी सेना आउवा भेजी। क्रांतिकारी इस सेना का सामना नहीं कर पाए और उन्हें जानमाल की भारी क्षति हुई।  इस प्रकार कोटा एवं अजमेर-मेरवाडा की नसीराबाद स्थित सेना के सैनिकों ने भी मेरठ में सैनिक विद्रोह के समाचार सुनकर विद्रोह कर दिया।  राजस्थान में सशस्‍त्र क्रान्ति का प्रारम्भ शाहपुरा के सरी सिंह बारहठ ने किया। उन्होंने अर्जुनलाल सेठी एवं खरवा राव गोपालसिंह के साथ एक क्रान्तिकारी संगठन ”अभिनव भारत समिति” की स्थापना की। उन्होंने एक विद्यालय भी खोला जहां युवकों को प्रशिक्षण दिया जाता था। इनमें से कुछ युवकों को प्रशिक्षण के लिए रास बिहारी बोस के साथी मास्टर अमीचन्द के पास दिल्ली भेजा जाता था। दिल्ली में के सरी सिंह बारहठ के भाई जोरावरसिंह एवं पुत्र प्रतापसिंह रास बिहारी बोस के नेतृत्व में गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिग्स पर फैंके गए बम की घटना में सम्मिलित हुए।सम्पूर्ण भारत वर्ष की तरह राजस्थान में भी दासता से मुक्ति के प्रयास 19वीं शताब्दी से ही प्रारम्भ हो गए थे। यहां की जनता पर अंग्रेजों की हुकूमत की बेड़ियां तो थी ही, साथ ही उन्हें यहां के शासकों एवं जागीरदारों के दमनकारी कृत्यों से भी जूझना पड़ता था। इस दोहरी मार के परिणामस्वरूप ऐसे अनेक आंदोलन हुए जिनका प्रभाव स्वतंत्रता की अंतिम लड़ाई पर भी स्पष्ट दिखाई दिया।

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