बात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया ही था और जन सेवा का काम बड़ी रुचि के साथ करने लगे थे। वह एक कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवक थे। अखबारी प्रचार-प्रसार में उनका ज्यादा विश्वास नहीं था।
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