इस्लामाबाद । पिछले दो सालों से पाकिस्तान में नवाज शरीफ शासन की छवि एक निस्सहाय सरकार की बनी है। पनामा पेपर्स में नवाज शरीफ के नाम आने के बाद स्थिति और बिगड़ी। सर्जरी के कारण भी नवाज शरीफ अहम कामकाज से दूर हैं। इन सब वाकयों के बीच पाकिस्तानी पीएम शरीफ बुरी तरह से आलोचना की चपेट में हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान की नीतियों से नाखुश पाक सेना ने सेना मुख्यालय में पूरी नवाज कैबिनेट की मीटिंग की है। इसमें विदेश और सुरक्षा से संबंधित नीतियों पर चर्चा हुई। माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की विदेशी दौरों से पाकिस्तान परेशान है।
भारत से संबंधों में ठहराव, अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्ते, अफगानिस्तान से बढ़ते तनाव और ईरान के साथ भरोसे में आई कमी नवाज शरीफ पर भारी पड़ी है। पिछले हफ्ते रावलपिंडी की गैरिसन सिटी स्थित मिलीटरी जनरल हेडक्वॉटर में गृह मंत्री को छोडक़र पाकिस्तान की पूरी कैबिनेट रालवलपिंडी में मिलीटरी जनरल मीटिंग के लिए पहुंची थी।
मीटिंग में सेना के अफसर भी मौजूद थे। कहा जा रहा है कि मीटिंग का मकसद सरकारी फैसलों में मिलिट्री के दबदबे को दिखाना था। पूरी कैबिनेट को सेना की तरफ से आने के लिए कहा गया था। इससे साबित होता है कि पाकिस्तान में अहम फैसले सेना ले रही है न कि चुनी हुई सरकार।
सेना का प्रभुत्व साफ दिख रहा है। इस मीटिंग में देश की बाहरी सुरक्षा और सिक्यॉरिटी से जुड़ी नीति निर्माण पर बात हुई। पठानकोट हमले के बाद से भारत के साथ उसके कूटनीतिक रिश्तों में तनाव चल रहा है। परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) सदस्यता को लेकर अमेरिका भी खुले तौर पर भारते के समर्थन में है, जबकि पाक की सदस्यता को लेकर अमेरिका का कोई सकारात्मक रुख देखने को नहीं मिला। अफगानिस्तान-ईरान की तरफ से भी पाकिस्तान का टेंशन बढ़ा है। इस इलाके में भारतीय प्रधानमंत्री की सक्रियता के साथ अमेरिका और पश्चिम एशिया में बढ़ती उनकी दिलचस्पी के बीच पाकिस्तान के भीतर नवाज सरकार की विदेश नीति पर कई सवाल उठे। पाकिस्तान में कहा जाने लगा कि नवाज शरीफ की विदेश नीति फेल हो गई है। ऐसी आवाज आर्मी के भीतर से भी आने लगी है।
हाल ही में नरेंद्र मोदी ने अमेरिका सहित पांच देशों की यात्रा की थी। पाकिस्तान में भारत और उसकी विदेश नीति के बढ़ते उसर को लेकर काफी चर्चा है। वहीं सेना के अफसर पाकिस्तान की विदेश नीति को विफल बता रहे हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के दिग्गज नेताओं ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि जब नवाज शरीफ ने सत्ता संभाली थी तो वह पाकिस्तान के नीति निर्माण में आर्मी की भूमिका को कम करना चाहते थे लेकिन उन्हें हर कदम पर दवाब का सामना करना पड़ रहा है।
पीएमएल के वरिष्ठ नेता के मुताबिक, शरीफ ने हमेशा विदेश नीति में सेना की दखलअंदाजी को कम करने की कोशिश की है, लेकिन उल्टे उन पर प्रेशर बढ़ता चला गया।
रावलपिंडी में सेना के साथ पाकिस्तानी कैबिनेट की मीटिंग के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि विदेश मंत्रालय को सेना खुद संभाल सकती है। सेना के बढ़ते प्रभुत्व के मद्देनजर सरकार की हो रही आलोचनाओं के बीच नवाज शरीफ के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने सांसदों के समाने सफाई दी कि देश की विदेश नीति में सेना का कोई हस्तक्षेप नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसा कहना पूरी तरह से गलत है। उन्होंने कहा, ‘पिछले कुछ वर्षों में हमने मिलिटरी से पड़ोसी भारत से कई मसलों पर कलह के कारण पर्याप्त इनपुट्स लिए हैं। इसी वजह से हमें सेना की कठपुतली बताया जा रहा है।’ विपक्षी दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के सांसद अली मोहम्मद खान ने नेशनल असेंबली में कहा, ‘राजनेता जनता के प्रति जवाबदेह हैं लेकिन कोई आर्मी जनरल की सरकार में एंट्री होती है, किसी को भी सवाल पूछने का हक नहीं रह जाएगा। मैं सभी राजनेताओं से अपील करता हूं कि वे लोगों का भरोसा कायम रखें, क्योंकि उन्होंने ही हमें नीतियां बनाने के लिए चुना है। पाकिस्तान में लोकतंत्र समर्थकों का कहना है कि सेना की दखलअंदाजी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
एक पाकिस्तानी विश्लेषक आमिर मतीन ने कहा, ‘मिलिटरी को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर संपर्क करना चाहिए लेकिन विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर फैसला इस्लामाबाद में होना चाहिए न कि रावलपिंडी में।’
साभार-khaskhabar.com






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