अगर सियासत सिर्फ़ गिनती का खेल होती, तो भारत का विपक्ष आज सत्ता के क़िले पर चढ़ाई के लिए पूरी तरह तैयार नज़र आता। लेकिन, भारतीय लोकतंत्र के सख़्त मैदान में सिर्फ़ सीटों की संख्या काफ़ी नहीं होती। यहां ज़रूरत है एक पुख़्ता यक़ीन की, आपसी एकजुटता और सरकार के सामने रखने के लिए एक दमदार, भरोसेमंद कहानी की। और, इन्हीं अहम मोर्चों पर विपक्ष बुरी तरह पिछड़ा हुआ है।
18वीं लोकसभा एक अजीब विडंबना से ग्रसित है। इंडी गठबंधन के ज़रिये विपक्ष के पास 543 सदस्यीय सदन में 234 सीटें हैं, यानी क़रीब 43 फ़ीसदी। कुछ निर्दलीयों और अन्य दलों को जोड़ दें, तो गैर-एनडीए सांसदों की संख्या 250 के आसपास पहुंच जाती है। यह कोई मामूली मौजूदगी नहीं है। यह संख्या उस बिखरे विपक्ष से ज़्यादा मज़बूत है, जिसका सामना कभी जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री या इंदिरा गांधी को अपने लंबे कार्यकाल में करना पड़ा था, जब अक्सर किसी एक दल को आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष का दर्जा भी नहीं मिल पाता था और कुल विपक्ष सदन के एक चौथाई से कम रहता था।
Read in English: Why India's divided rivals can't craft a winning vision against Modi!
फिर भी इतना भारी-भरकम विपक्ष सिर्फ़ हल्की-सी परछाईं बनकर रह गया है। शोर है, नारे हैं, बहिष्कार हैं, वॉकआउट हैं, लेकिन न तो वह आम जनता को क़ायल कर पाता है और न ही सरकार को ऐसे तर्कों से घेर पाता है जिनका जवाब न हो। संसद में शोर बहुत है, मगर दिशा ग़ायब। जहां ठोस नीति-पत्र होने चाहिए, वहां तख़्तियां लहराती हैं। जहां गहरी तैयारी चाहिए, वहां हैशटैग ट्रेंड करते हैं और संसद की लाइब्रेरी की पुस्तकों पर धूल जमती रहती है।
असली विपक्ष सिर्फ़ सीटों से नहीं बनता है। उसके लिए तैयारी, सिद्धांत और लगातार जमे रहने का जज़्बा चाहिए। नेहरू के दौर को याद कीजिए। तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी, एचवी कामथ और एके गोपालन जैसे नेता संख्या में कम थे, लेकिन नियमों की गहरी समझ, ठोस रिसर्च और नैतिक वज़न के दम पर कई बार भारी पड़ जाते थे। मुखर्जी ने कश्मीर को सिर्फ़ नारेबाज़ी का मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर संवैधानिक सवाल के रूप में रखा। हरि विष्णु कामथ को नियम-क़ानून ज़ुबानी याद थे और हार में भी वह सम्मान पाते थे। गोपालन ने हाशिये पर खड़े लोगों की पीड़ा को बिना तमाशे के, ख़ामोश ताक़त के साथ उठाया।
शास्त्री जी के समय आचार्य कृपलानी की साख मिसाल थी। न जाति की फ़ौज, न सोशल मीडिया का तूफ़ान, बस अडिग मेहनत और लगातार दबाव, जिसने सत्ता को थकाकर रख दिया। इंदिरा गांधी के उथल-पुथल भरे दौर में तो और भी तेवरदार योद्धा उभरे। मधु लिमये की पैनी नीतिगत पड़ताल, राज नारायण की अदालतों में लड़ी गई लड़ाइयां जिन्होंने तख़्त हिला दिए, नाथ पई की आज़ादी की बेबाक पैरवी, जॉर्ज फ़र्नांडिस का भूमिगत प्रतिरोध, अटल बिहारी वाजपेयी की शालीन आलोचना और काव्यात्मक वाणी, और राम मनोहर लोहिया की वैचारिक रीढ़, जो बिना अराजकता फैलाए गैर-कांग्रेस एकता की बात करते थे, और बिना गुटों में बंटे समाजवाद का सपना देखते थे। वे बेहद संजीदा थे। संसद उनके लिए सिर्फ़ मंच नहीं, बल्कि इबादतगाह थी। फ़ाइलें पढ़ी जाती थीं, मिसालें दी जाती थीं, और लोकतंत्र को रोज़ निभाई जाने वाली सख़्त ज़िम्मेदारी समझा जाता था।
आज के हालात से इसकी तुलना कीजिए। विपक्ष के पास संख्या है, लेकिन कोई साझा राष्ट्रीय कथ्य नहीं है। बेरोज़गारी, महंगाई और किसानों की परेशानियां जैसे ज्वलंत मुद्दे हैं, मगर बदले में हमें तमाशे दिखते हैं। बहस की जगह सामूहिक वॉकआउट, सोच-समझी राय की जगह वायरल ग़ुस्सा।
नेतृत्व की खाई साफ़ दिखती है। नरेंद्र मोदी सिर्फ़ सत्ता में होने की वजह से नहीं, बल्कि अपनी मज़बूत शख़्सियत और साफ़ मक़सद के कारण ऊंचे हैं। वह राष्ट्रवाद, बड़े पैमाने की कल्याण योजनाओं और निर्णायक शासन को जोड़कर भारत की तरक़्क़ी की एक असरदार कहानी लिख रहे हैं। आप उनसे इत्तेफ़ाक़ करें या नफ़रत, मगर उनका विज़न साफ़ है। विपक्ष की तरफ़ से जवाब बिखरे टुकड़ों में आता है। राहुल गांधी में अखिल भारतीय स्तर पर प्रभावी नेतृत्व अब भी चुनौती बना हुआ है। ताक़तवर क्षेत्रीय नेता अपने-अपने इलाक़ों के बादशाह हैं, मगर जयप्रकाश नारायण जैसी नैतिक ऊंचाई, जो पूरे देश को जोड़ सके, नज़र नहीं आती।
टूट-फूट ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। 2023-24 में मोदी के ख़िलाफ़ मजबूरी में बना इंडी गठबंधन 234 सीटें तो ले आया, लेकिन बाद में बुरी तरह बिखर गया। दलबदल, पलायन और राज्यों के चुनावों में आपसी टकराव ने इसकी पकड़ ढीली कर दी। सिर्फ़ विरोध में एकजुट होना आसान है, लेकिन किसी सकारात्मक साझा एजेंडे पर एक होना बेहद मुश्किल।
संगठन के मोर्चे पर फ़ासला और चौड़ा है। भाजपा एक ऐसी मशीन की तरह काम करती है जिसमें आत्मा भी है। आरएसएस के ज़मीनी कार्यकर्ता, डेटा एनालिटिक्स से चलती रणनीति, बूथ स्तर तक की बारीक तैयारी। इसके मुक़ाबले विपक्ष की कोशिशें बेतरतीब लगती हैं, पैसों की कमी, कमज़ोर कैडर और जुगाड़ू अभियानों के कारण वे आधुनिक चुनावी जंग में हमेशा कमज़ोर पड़ जाते हैं।
कहानी गढ़ने की जंग में भी पलड़ा सत्ता के पक्ष में है। समय, दृश्य और भाषा पर उसकी मज़बूत पकड़ है। वही देशभक्ति की परिभाषा तय करता है, असहमति की सीमाएं खींचता है और मीडिया चक्र को लगातार घुमाता है। विपक्ष अक्सर देर से और लड़खड़ाते हुए जवाब देता है, ‘पक्षपात’ का रोना तो रोता है, लेकिन भरोसेमंद वैकल्पिक मंच खड़ा नहीं कर पाता।
कल्याण योजनाओं के मोर्चे पर भी, जो वोटरों को सीधे छूता है, विपक्ष पीछे छूट गया है। उज्ज्वला गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत स्वास्थ्य कवरेज और डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र जैसी योजनाओं ने लाभार्थियों में गहरी वफ़ादारी बनाई है। विपक्ष इनके क्रियान्वयन की कमियां तो गिनाता है, मगर ज़्यादा साहसी, ज़्यादा समावेशी और ज़्यादा भरोसेमंद विकल्प सामने नहीं रख पाता है।
असल में समस्या धैर्य और लगन के टूटने की है। पुराने दौर के विपक्षी नेता संसद में जीते थे, दस्तावेज़ खंगालते थे, एक-एक ईंट जोड़कर केस बनाते थे, और निगरानी को पवित्र फ़र्ज़ मानते थे। आज कई नेता प्राइम टाइम की सुर्ख़ियों, सनसनीख़ेज़ क्लिप और पहचान की सियासत को वैचारिक गहराई से ऊपर रख देते हैं।
कमज़ोर विपक्ष सिर्फ़ सरकार को ताक़तवर नहीं बनाता बल्कि वह गणराज्य को भी ख़तरे में डालता है। बेकाबू सत्ता आख़िरकार हदें लांघती है और संस्थागत संतुलन टूटने लगता है। भारत को ऐसे विपक्ष की दरकार है जो सिर्फ़ “न” कहने तक सीमित न रहे, बल्कि बड़े बदलाव के विचार पेश करे, उन्हें असरदार ढंग से रखे और नाकामियों के बावजूद डटा रहे। एक ऐसा विपक्ष जिसमें लोहिया का बेख़ौफ़ साहस, वाजपेयी की शालीनता, लिमये की विश्लेषणात्मक धार और फ़र्नांडिस की अडिग हिम्मत एक साथ हों।
जब तक ऐसा नवीनीकरण नहीं होता, विपक्ष के सामने ख़तरा यही है कि वह बिना दिशा के एक बड़ी भीड़ बनकर रह जाए , शोरगुल भरा कोरस, मगर सुर के बिना।






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