बाबा जयगुरूदेव का वार्षिक भंडारें में उमड़ रहा है भक्तों का सैलाव

गुरू महाराज ने 20 करोड़ लोगों का नाम देकर स्वर्ग का मार्ग दिखाया-सतीषचन्द्र

मथुरा। जयगुरुदेव वार्षिक भण्डारा मेला के दूसरे दिन संस्था के राष्ट्रीय उपदेशक सतीष चन्द्र और डा- करुणा कान्त ने श्रद्वालुओं को सम्बोध्ति करते हुये कहा कि इतिहास में इस बात का प्रमाण मिलता है कि जितने भी संत पफकीर इस धरा पर आये दुनिया के लोगों ने उनका विरोध् किया, उनको यातनायें दी। बाबा जयगुरुदेव महाराज का भी लोगों ने विरोध् किया और भ्रामक प्रचार कराया गया जिससे लोग इनके पास न आयें। लेकिन, सारे रिकार्ड को तोड़ते हुये बाबा जी ने बीस करोड़ से ऊपर लोगों को नामदान दिया। विद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया के समान ही संतमत में प्रवेश के लिये नामदान प्राप्त करना होता है, जिस प्रकार नाम लिख जाने के बाद बच्चे को प्रतिदिन पढ़ाई करने के लिये विद्यालय जाना पड़ता है और साल के अन्त में परीक्षा होती है, उसमें उसके ज्ञान का पता चलता है। इसी प्रकार सन्तमत में नामदान लेने के बाद नित्य प्रति दुनियां के सभी काम को मेहनत-ईमानदारी से करने के बाद, शाम और सुबह नाम का अभ्यास यानी रूहानी कसरत करनी पड़ती है। इससे सुरत और मन की श्रेष्ंठ खुलने लगती है। ,ऐसे लोगों को गुुरुमुख कहा जाता है। सच्चे साध् और सत्संगी की पहचान बोलने के ढगÛ से होती है। यदि बोलने के बाद पश्चाताप् करना पडे़ तो समझना चाहिये कि हमारे अन्दर मनमुखता है, मन ने हमको बहका दिया। जब इन्द्रियों से सेवा कार्य किया जाता है तो ध्ीरे-ध्ीरे इन्द्रियां पविध् हो जाती हैं और ये ध्ीरे-ध्ीरे पूर्ण शाकाहारी हो जायेगी यानी गलत चीजों को सुनना, देखना, बोलना छूट जायेगा। उन्होंने कहा कि सन्तमत में भजन एक मौत की प्रक्रिया है। भजन में जीते जी मरना होता है। भजन का तात्पर्य भागना अर्थात् शरीर से निकलना और उसमें पुनः प्रवेश करना है। मर करके जिन्दा होना और जिन्दा होकर मरने वाले को ही मुरीद कहा जाता है। इस तरह का अभ्यास गुरु की दया और कृपा से किया जाता है। यह बहुत ही आसान है। काल, माया के देश में पफंसी हुई जीवात्मा को अमरलोक पहुंचा देने वाले को संत कहा जाता है। सन्तमत में अमर लोक को सतलोक, बेगमपुरा आदि नामों से महापुरुशों ने सम्बोध्ति किया है। दाढ़ी वेश-भूषा, काला-द्वोरा, अन्ध्े को आंख और मुर्दे को जिन्दा कर देने वाले का नाम सन्त नहीं होता है।  उपदेशक ने आगेे बताया कि मृत्युलोक शब्द में मृत्यु का अर्थ बाहर करना और लोक का अर्थ स्थान होता है। इस लोक में जीवों को एक ‘शरीर से निकालकर दूसरी जगह डाल दिया जाता है। इसके ऊपर अ.डीलोक है, जिसमें सत्तरह तत्वों का शरीर होता है। इसी को चैदह तबक कहते हैं। इसी में नौ करोड़ - दस करोड़ शम्भू आदि देवी-देवताओं का स्थान है। अ.डीलोक के ऊपर सूक्ष्मलोक है, इसके मालिक को ईश्वर, खुदा, तीर्थंकर, जड कहते हैं। हिन्दू लोग इन्हीं को सत्यनारायण स्वामी कहते हैं। इन्हीं को व्यापक ब्रह्म निरंजन कहते हैं। सूक्ष्मलोक से ओर सुन्न और महासुन्न है। इसके बहुत ऊपर सत्तलोक देश है। जहां काल नहीं जा सकता है, वहां जन्म-मरगे नहीं होता है। इसी को सिक्ख Ûुरुसाहबों ने अकाल लोक कहा है। सभी जीवात्माओं का यही सच्चा द्वार है। सन्त रविदास ने इसको बेÛगमपुरा कहा है। मेले में श्रद्वालुओं के आने का क्रम जारी है।

 


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