बाबा जयगुरू आश्रम में वार्षिक भंडारा

मनुष्य शरीर पानी के बुलवुले के समान- सतीश चन्द्र

मथुरा। जयगुरूदेव आश्रम में आयोजित छः दिवसीय वार्षिक भडारा-सत्संग मेले के पहले दिन संस्था के राष्ट्रीय उपदेशक सतीष चन्द एवं डा- करुणाकान्त ने श्रद्वालुओं को सम्बोाित किया। सतीष चन्द ने महापुरुषों के सत्सग बचनों को याद कराते हुये कहा कि ‘‘सत्संग महिमा है अतिभारी, पर कोई जीव मिलै अािकारी। सत्सगं  जल जो कोई पावै, मैलाई सब कट-कट जावे। ’’ सन्त महापुरुषों के सत्संग बचन की महिमा अपार है, यह अपना काम करता है। जब जीव के पूर्व जन्मों के पुण्य उदय होते हैं तो मिलता है। जिस प्रकार संसार में शरीर और कपड़े को सापफ करने के लिये जल का उपयोग होता है उसी प्रकार मन की मलीनता की सपफाई सत्संग रूपी जल से होती है। जब जीव सत्संग को सुनता है तो शनैः-’शनैः मन के साथ लेगे हुये काम, क्रोा, लोभ, मोह व अहंकार का प्रभाव ाीरे-ाीरे कम हो जाता है और मन में निर्मलता व पवित्रता आ जाती है और विवेक जगृत होता है। इसी से सााना के समय शट में मन सुरत का साथ देने लगता है और इसकी चढ़ाई होने लगती है, रोशनी-प्रकाश दिखाई देता है। संसार के मान और सम्मान रूपी मैल ;काईद्ध की सपफाई हो जाती है और जीव अपने आत्मकल्याण के बारे में सोचने लगता है। सत्सगं और सेवा ही सााना अर्थात नाम-कमाई का आाार है। मानव जीवन में सबसे कठिन और महत्वपूर्ण कार्य अपने ख्याल को दसवें द्वार पर चढ़ाना है। जिनको संत मिल गये और नाम का भेद दिया है उनको संकल्प के साथ कमाई करनी चाहिये। जब कमाई करेंगेे तो गुरु की दया हागी। गुुरु की दया और करनी ये दोनों ,क-दूसरे के पूरक हैं। ,क तरपफ बगैर गुुरु दया के करनी नहीं होगी तो दूसरी तरपफ करनी के बगैर गुुरु की दया नहीं होगी। ये दोनों चीजें परमार्थ के रास्ते में बहुत सहायक होती हैं। यथा शक्ति परमार्थ के रास्ते पर लेगे रहने से मौत के पहले काम बन जायेगा। संसार में समय खराब चल रहा है लेकिन परमार्थ की दृष्टि से यह अच्छा है। डा-करुणाकान्त  ने कहा कि यह जीवन पानी के बुलबुले के समान है जैसे पानी का बुलबुला पानी में बना और पफूट कर पानी में समा जाता है। इसी प्रकार जब इस पंच भौतिक ‘शरीर से जीवात्मा के निकल जाने पर पांचो तत्व अपने-अपने में समा जाते हैं और इन आंखों से दिखाई देने वाला शरीर व्यक्ति के सामने से ओझल हो जाता है। जीवात्मा को कर्मानुसार सजा मिल जाती है। जिन्हें सन्त सत्गुुरु मिल गये हैं उनकी जीवात्मा की सम्हाल मौत के वक्त गुरूु करते हैं। गुुरु ही जीवों के सच्चे साथी हैं बाकी सब झूठ और भ्रम हैं। मेले में दो दर्जन से अािक स्थानों पर ‘शर्बत प्याऊ का स्टाल लगाकर पिलाया जा रहा है। लागों के आने का क्रम जारी है। मन्दिर की सजावट दर्शनीय है। 


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