मथुरा। जयगुरुदेव मन्दिर के गुरुपूर्णिमा महापर्व का सत्संग-मेला आज तीसरे दिन गहमा गहमी का रहा। महापर्व का मुख्य आकर्षक ‘‘पूजन’’ आज प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त की अमृत बेला में शुरु हुआ। पूजन प्रारम्भ हो जाने से सत्संग व पूजन में भीड़ बँट गई। सत्संग में संस्थाध्यक्ष पंकज महाराज ने मार्मिक, सारगर्भित, भावात्मक सत्संग सुनाकर सबको खूब झकझोरा। ‘‘गुरु का ध्यान कर प्यारे, बिना इसके नहीं छुटना’’ गुरु वन्दना से अपना सत्संग प्रारम्भ करते हुये उन्होंने कहा कि हम सब लोग भाग्यषाली हैं, जो गुरु दरबार में गुरुपूजा के अवसर पर आयें हैं। हमें ऐसे स्थानों पर जाकर यह जानना चाहिये कि हम कौन हैं? जीवात्मा क्या है? कहाँ से आई हैं? मरने के बाद कहाँ जायेगी? किस काम के लिये मानव तन में भेजी गई? हमने इसको जानने की कोशिश नहीं की। दुनियाँ के रगड़े-झगड़ों और धन्धों में इस तरह मस्त और मशगूल हैं कि हमें अपने मानव तन की सार्थकता का होष ही नहीं। उन्होंने सृष्टि की रचना का तरतीबवार वर्णन किया और अनामी पुरुष को आदि प्रभु, चैतन्य सत्ता करार देते हुये कहा कि ‘‘एक अनीह, अनामा! अज सच्चिदानन्द प्रभु धामा!!’’ ने अपनी मौज मर्जी से चैतन्य शब्दों द्वारा अगम, अलख, सत्तलोक तीन अपरिवर्तनशील लोकों की रचना की। नीचे का विस्तार सत्तपुरुष के द्वारा हुआ। सबसे छोटे पुत्र त्रिलोकीनाथ निरंजन जिन्हें काल भगवान भी कहा जाता है, ने अखण्ड तपस्या करके जीवों का भण्डार मांगा। बिना जीवात्मा के रचना नहीं हो सकती, मालिक ने खुश होकर जीवात्माओं (सुरतों) को यह कहकर भेजा कि जब हमारी याद आने लगे तो हम सन्तों को भेज रहे हैं इनका साथ करके, हाथ पकड़कर वापस चली आना। अनेक युग बीत गये जीवात्मायें अपने निर्मल चैतन्य देश वापिस नहीं जा पाई। महात्मा सुरतों को निजधाम ले जाने के लिये आते हैं। मौत के वक्त असहनीय पीड़ा होती हें उसी दुःख दर्द से बचने और अपने प्रभु को पाने के लिये भजन कराया जाता है।






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