सांवरिया सेठ मंदिर में मौजूद हैं मीरा के मोहन


सांवरिया सेठ मन्दिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। किंवदंती यह है कि वर्ष 1840 में, भोलाराम गुर्जर नाम के एक दूधवाले ने बागुंड गांव के छापर में तीन दिव्य मूर्तियों के भूमिगत होने का सपना देखा था। उस स्थान को खोदने पर वहां भगवान कृष्ण की तीन सुंदर मूर्तियां मिलीं, जैसा कि सपने में देखा गया था।

इन मूर्तियों में से एक को मंडफिया, एक को भादसोड़ा और तीसरी को बागुंड गांव के छापर में ले जाया गया। तीनों स्थान मंदिर बन गए। ये तीनों मंदिर पांच किमी के क्षेत्र में स्थित हैं। सांवरिया के इन तीन मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्त दर्शन करने आते हैं। इन तीन मंदिरों में मंडफिया मंदिर को सांवरिया धाम के रूप में मान्यता प्राप्त है।

माना जाता है कि भगवान श्री सांवरिया सेठ का संबंध मीरा बाई से है। किंवदंतियों के अनुसार सांवरिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है, जिनकी वह पूजा किया करती थी। मीरा बाई संत महात्माओं की जमात में इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी।

एक बार जब औरंगजेब की मुग़ल सेना मंदिरों को तोड़ रही थी। मेवाड़ राज्य में पंहुचने पर मुग़ल सैनिकों को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा। तब संत दयाराम ने प्रभु प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा के खुले मैदान में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर दबा दिया और फिर समय बीतने के साथ संत दयाराम का देवलोकगमन हो गया।

कालान्तर में सन 1840 में  मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नाम के ग्वाले को एक सपना आया कि भादसोड़ा-बागूंड के छापर में मूर्तियां ज़मीन में दबी हुई है। जब उस जगह पर खुदाई की गई तो भोलाराम का सपना सही निकला और वहां से एक जैसी तीन मूर्तियां प्रकट हुईं। सभी मूर्तियां बहुत ही मनोहारी थी।

इसे लेकर प्रचलित पौराणिक कहानी के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु! आपने त्रेता युग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वह मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं?

द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरुड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है। इधर, सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वह भी कह उठे कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है। क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है?

भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। वह जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरुड़ से कहा कि हे गरुड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए। इधर, श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे। भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए।

गरुड़ ने हनुमान के पास पहुंच कर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।

हनुमान ने विनयपूर्वक गरुड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं। गरुड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा। खैर, मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरुड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़े। पर यह क्या, महल में पहुंचकर गरुड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया। तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवन पुत्र! तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं?

हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकाल कर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु, आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था, इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे। हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया हे प्रभु! आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है।

अब रानी सत्यभामा के अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरुड़ तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। और वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए।

भगवान श्रीकृष्ण के सांवरिया सेठ के स्वरूप से जुड़ी एक अन्य दिलचस्प कहानी के अनुसार, श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा काफी निर्धनता से जूझ रहे थे। बड़ी मुश्किल से उनका और उनके बच्चों का भरण-पोषण हो पाता था। इसलिए, उनकी पत्नी ने उन्हें श्रीकृष्ण से मदद मांगने को कहा, लेकिन सुदामा ऐसा करने से झिझक रहे थे। जब उनकी पत्नी ने बहुत दबाव डाला। तो वह कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। वहां श्रीकृष्ण ने अपने मित्र का खुले दिल से स्वागत किया। जब सुदामा को भोजन के रूप में छप्पन भोग परोसे गए, तो सुदामा ने यह कहकर भोजन करने से इनकार कर दिया कि उनकी पत्नी वसुंधरा और बच्चे भूखे होंगे। यह सुनकर उसी वक्त श्रीकृष्ण दूसरा रूप धारण करके सुदामा के गांव पहुंच जाते हैं और वहां जाकर वह सांवले शाह बन जाते हैं।

अचानक सुदामा के घर के बाहर एक बच्चा दौड़ते हुए आकर कहता है कि पास के गांव के सांवरिया सेठ के घर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसके लिए दस दिनों तक महायज्ञ किया जा रहा है। साथ ही दस दिनों तक आसपास के सभी नगरों में भंडारा किया जा रहा है। उसके बाद सुदामा के बच्चे भी वहां गए और सांवले सेठ के यहां जाकर भोजन ले आए। जब सुदामा द्वारका से वापस लौट रहे थे, तो उन्हें भी पता चला कि कोई सांवरिया सेठ भंडारा करा रहे हैं। सुदामा जब एक व्यक्ति को रोककर अपने गांव में भी होने वाले भंडारा के बारे में पूछते हैं कि क्या वहां सच में भंडारा हो रहा है, तो वो व्यक्ति 'हां' में जवाब देता है। यह जवाब सुनकर सुदामा की आत्मा तृप्त हो गई। उन्हें अपने भूखे बच्चे और पत्नी की चिंता ख़त्म हो गई। श्रीकृष्ण की इस उदारता और मदद करने के तरीके के कारण ही तब से उन्हें ‘सांवरिया सेठ’ कहा जाता है।

सांवरिया सेठ मंदिर की महिमा इतनी फैली के उनके भक्त वेतन से लेकर व्यापार तक में उन्हें अपना हिस्सेदार बनाते हैं। मान्यता है कि जो भक्त खजाने में जितना देते हैं सांवरिया सेठ उससे कई गुना ज्यादा भक्तों को वापस लौटाते हैं। व्यापार जगत में उनकी ख्याति इतनी है कि लोग अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए उन्हें अपना ‘बिजनेस पार्टनर’ बनाते हैं।

श्री सांवरिया जी मंदिर का दानपात्र माह में एक बार खोला जाता है। सांवरिया सेठ मंदिर में कई एनआरआई भक्त भी आते हैं। ये विदेशों में अर्जित आय में से सांवरिया सेठ का हिस्सा चढ़ाते हैं। दानपात्र से डॉलर, पाउंड, दिनार, रियॉल आदि के साथ कई देशों की मुद्रा निकलती है।

मुख्य मंदिर के दोनों ओर बरामदों में दीवारों पर बेहद आकर्षक चित्रकारी की गई है। यहां विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत के राज्य जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। साल 1961 से ही इस प्रसिद्ध स्थान पर देवझूलनी एकादशी पर विशाल मेले का आयोजन हो रहा है।

सांवरिया मंदिर परिसर एक भव्य सुंदर संरचना है, जो गुलाबी बलुआ पत्थर में निर्मित है। मंदिर के गर्भगृह में सेठ सांवरिया की काले पत्थर की बनी मूर्ति स्थापित है, जो भगवान कृष्ण के रंग को दर्शाती है। सांवरिया सेठ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन हिंदू मंदिरों से प्रेरित है। मंदिर की दीवारों और खम्भों पर सुंदर नक्काशी की गई है जबकि, फर्श गुलाबी, शुद्ध सफेद और पीले रंग के बेदाग रंगों से बना है।

सांवरिया सेठ मंदिर सुबह पांच बजे खुलता है और दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। इसके बाद मंदिर को पुनः दो बजे खोला जाता है, जिसके बाद मंदिर रात 11 बजे तक खुला रहता है।

सांवरिया सेठ मंदिर चित्तौड़गढ़ सॆ उदयपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 28 किमी दूरी पर भादसोड़ा ग्राम में स्थित है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से 41 किमी एवं डबोक एयरपोर्ट से 65 किमी की दूरी पर है।



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