मथुरा। हमारे महान भारत देश का प्राचीन योग विश्व-प्रसिद्व हैं। इस देश में योगियों और योग से प्राप्त सिद्धियों की महिमा भी विश्व प्रसिद्व हैं। आज भी देश देशांतर से योग सीखने के अभिलाशी, सच्चे योग की खोज में भारत आते रहते है। परन्तु अब वास्तविक योग का तो केवल नाम ही रह गया है, उस योग के अनमोल रहस्य तो अतीत की ओर मेें ओझल हो गये है। आज उस सर्व प्राचीन, सर्वोत्तम योग के स्थान पर, शारीरिक योग ‘क्रिया योग, हठ योग, तत्व योग इत्यादि प्रचलित है। अनेक प्रकार के योगों में शारीरिक आसन या क्रियाओं को महत्व दिया जाता हैै। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट् की सर्व साधारण सभा में एक प्रस्ताव रखा था कि अंतराष्ट्ीय योग दिवस हर साल मनाया जायंे। बाद में यही बात उन्होंनें विश्व के 20 बड़े देशों की शिखर परिषद में भी कही। संयुक्त राष्ट् ने भारत की इस बात को उठाया और सभी देशों ने अपनी सहमति दी। इस प्रकार 21 जून को अन्तराष्ट्ीय योग दिवस के रुप में मनाने का निश्चित हुआ। यह हमारे लिए गर्व व खुशी की बात है। परन्तु हमें समझना है कि योग मात्र यही नहीं है क्योकि प्रणायाम या आसन से शारीरिक लाभ तो मिल जाता है लेकिन मानसिक एकाग्रता विचारों की स्पष्टता, व्यवहार में संतुलन, तनाव मुक्ति, आत्म अनुशासन, दिव्य गुणों की धारणा जैसी उपलब्लियों से वंचित रह जाते है। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मे सब लाभ हमें जिस योग से प्राप्त होते है वह है राजयोग। राजयोग में दो शब्द है, राज और योग। राज का अर्थ है राजा। आत्मा कर्मेन्द्रियों की राजा है। योग का अर्थ है जुड़ाव। आत्मा राजा जब भ्रकृटि सिंहासन पर विराजमान होकर पिता परमात्मा से कनेक्शन जोड़ती है तो परमात्मा पिता से सर्व शक्तियों का करंट उसमें प्रवाहित होने लगता है। उस करंट से उसके कमजोर और नकरात्मक संस्कार जल जाते है और परमपिता के शान्ति, आनन्द, प्रेम, पवित्रता, शक्ति के संस्कार उसमें भरने लगते है। जैसे शरीर में फैले कीटाणुओं के नष्ट होने से शरीर चुस्त औैर फुर्तीला हो जाता है उसी प्रकार नकरात्मक और दुःखदाई संस्कार रुपी कीटाणुओं के जलने से आत्मा भी सुखदाई और कल्याणकारी बन जाती है। राजयोग के निरन्तर अभ्यास से आत्मा पर चढ़े कई जन्मों के पाप धुल जाते है। पवित्रता सुख शान्ति, जो आत्मा के मूल संस्कार है वे पुनः जागृत होने लगते है।





