मथुरा स्थित राजकीय जैन संग्रहालय मेें मौजूद हैं जैन तीर्थकरों की मूर्ति

मथुरा। चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर पर मूर्तिकला के लिए मथुरा कभी प्रसिद्ध रहा था और इस काल में यहां जैन धर्म भी खासा फला-फूला। इसका प्रमाण यहां जैन संग्रहालय में सहेजकर रखी गई जैन तीर्थकरों की प्रतिमाओं सहित मूर्तियों एवं अन्य मांगलिक चिन्हों से युक्त जैन आयागपट्ट हैं। मध्यकाल से लेकर 13वीं और 14वीं शती तक जैन धर्म की विभिन्न तीर्थकरों सहित इस धर्म से सम्बन्धित अनेक शिलालेख जिनमें कुल 737 कलाकृति प्राप्त हुई जो लखनऊ में राजकीय सग्रहालय में लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। इनमें से 66 मूर्ति जैन सग्रहालय मथुरा में सुरक्षित हैं।इसमें प्रथम तीर्थकर ऋषभनाथ की विशालकाय मूर्ति प्रमुख है। मथुरा जिला मुख्यालय से 200 मीटर की दूरी एवं सदर तहसील के बराबर स्थित इस पुराने राजकीय संग्राहलय भवन को राजकीय जैन संग्रहालय के रुप में स्थापित कर दिया गया है। तत्कालीन अग्रज कलेक्टर एफएस ग्राउस ने इस म्यूजियम की स्थापना की थी जिसमें मथुरा से खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों को सहेजकर रखा गया था। बाद में डैम्पियर नगर में बने नए भवन में बुद्घ एवं अन्य मूर्तियों को शिफ्ट कर दिया गया यहां केवल जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियां ही रखी गई। राजकीय जैन संग्रहालय में बलभद्र कुण्ड, कंकाली टीला, मथुरा सिटी, चैबिया पाड़ा एवं गोविन्द नगर सहित यमुनापार स्थित गांव ईसापुर की बगीची बीरबल सहित विभिन्न स्थानों से वर्ष 1988 से लेकर 1991 तक कराई गई खुदाई में मिली करीब 803 प्रतिमाओं में अधिकांश जैनधर्म से सम्बन्धित प्रतिमाएं हैं। जिनमें 737 कलाकृति लखनऊ के राजकीय संग्रहालय भेज दी गई जबकि 66 प्रतिमाएं मथुरा स्थित राजकीय जैन संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही हैं। इन प्रतिमाओं में मध्यकाल में मिली जैन तीर्थकर की आसनस्थ मुद्रा है वहीं एक युगल प्रतिमा भी तत्कालीन संस्कृति को दर्शाती नजर आ रही है साथ में अजमुखी जैन मातृदेवी की प्रतिमा भी यहां पर्यटकों एवं जैन धर्म अनुयायियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। 22 वें तीर्थकर नैमिनाथ की प्रतिमा भी यहां सुरक्षित है। तीसरी शती में कंकाली टीला से मिली प्रथम तीर्थकर ऋषभनाथकी विशालकाय 12 फुट ऊंची कुषाण कालीन प्रतिमा जो संग्रहालय के बीचों-बीच स्थित है यहां आने वाले पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। जैन धर्म के 24 तीर्थकरों सहित शासन देवताओं की मूर्ति एवं आयागपट्ट जैन धर्म की हर जानकारी देने में सहायक सिद्घ हो रहे हैं। संग्रहालय के विथिका सहायक गफ्फार अहमद बताते हैं कि मथुरा कई प्रमुख जैन तीर्थकरों की तपस्थली रही है। जैन धर्म की मूर्तियों का सबसे सबसे बड़ा केन्द्र कंकाली टीला था यहीं से बड़ी संख्या में जैन तीर्थकरों की प्रतिमाएं खुदाई के दौरान मिली थीं। शुंगकाल से लेकर मध्यकाल तक मिली तीर्थकर प्रतिमाओं में ऋषभनाथ, नैमिनाथ, महावीर, पार्श्वनाथ आदि की पद्मासन मुद्रा में प्रतिमाएं हैं एवं जैन तीर्थकरों के मस्तक एवं आसनस्थ प्रतिमाएं भी इसमें शामिल हैं।


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