
यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला।
आज जहां से यमुना का प्रवाह है, वहा वह सदा से प्रवाहित नहीं होती रही है। पौराणिक अनुश्रुतियों और ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है, कि यमुना नदी ने समय के साथ साथ अपना स्थान भी बदला है। जबकि यमुना पिछले हजारों वर्षो से हमारे जीवन की धारा के रूप में विधमान है, तथापि इसका प्रवाह समय समय पर परिवर्तित होता रहा है। महाभारत काल से वर्तमान तक यमुना की बदलती धारा के विषय में ज्ञात होता है कि यमुना कभी नन्दगांव, बरसाना गोर्वधन के निकट से होकर बहती थी। यमुना ने अपने दीर्घ जीवन काल में इसने कितने स्थान वदले है, उनमें से बहुत कम की ही जानकारी हो सकी है। मगर एक प्राचीन महाभारत काल के एक मानचित्र के अनुसार यह अवश्य ज्ञात होता है कि यमुना की धारा गोर्वधन के निकट से बहती थी।
प्राचीन काल में यमुना मधुबन के समीप से बहती थी, जहां उसके तट पर शत्रुध्न जी ने सर्वप्रथम मथुरा नगरी की स्थापना की थी वाल्मीकि रामायण और विष्णु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के निकट था । सत्रहवीं शताबदी में भारत आने वाले यूरोपीय विद्वान टेवर्नियर ने कटरा के समीप की भूमि को देख कर यह अनुमानित किया था कि वहां किसी समय यमुना की धारा थी।
इस संदर्भ में मथुरा के तत्कालीन जिला कलेक्टर मथुरा के अजायब घर के संस्थापक ग्राउज का मत है कि ऐतिहासिक काल में कटरा के समीप यमुना के प्रवाहित होने की संभावना कम है, किन्तु अत्यन्त प्राचीन काल में वहाँ यमुना का प्रवाह अवश्य था। इस बात से यह सिद्ध होता है कि कृष्ण काल में यमुना का प्रवाह कटरा केशव देव के समीप ही था।
कनिधंम का अनुमान है, यूनानी लेखकों के समय में यमुना नदी की एक मुख्य धारा या उसकी एक बड़ी शाखा कटरा केशव देव की पूर्वी दीवाल के नीचे से बहती होगी। जव मथुरा में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हो गया और यहाँ यमुना के दोंनों ओर अनेक संधाराम बनाये गये, तव यमुना की मुख्य धारा कटरा से हटकर प्रायः उसी स्थान पर बहती होगी, जहाँ वह अब है, किन्तु उसकी कोई शाखा अथवा सहायक नही कटरा के निकट भी विधमान रही होगी। ऐसा अनुमान है, यमुना की वह शाखा बौद्ध काल के बहुत बाद तक संभवतः सोलहवीं शताब्दी तक केशव देव मन्दिर के नीचे बहती रही थी। पहिले दो वरसाती नदियाँ ‘‘सरस्वती’’ और ‘‘कृष्ण गंगा’’ मथुरा के पश्चिमी भाग में प्रवाहित होकर यमुना में गिरती थीं, जिनकी स्मृति में यमुना के सरस्वती संगम और कृष्ण गंगा नामक धाट आज भी इतिहास के गबाह वने हुए हैं। संभव है यमुना की उन सहायक नादियों में से ही कोई कटरा केशव देव के पास से होकर बहती रही हो।
प्राचीन ग्रन्थों से ज्ञात होता है, प्राचीन वृन्दाबन में यमुना गोबर्धन के निकट प्रवाहित होती थी। जवकि वर्तमान में वह गोबर्धन से लगभग कई मील दूर हो गई है। गोवर्धन के निकटवर्ती दो छोटे ग्राम ‘‘जमुनावती’’ और परसौली है। वहाँ किसी काल में यमुना के प्रवाहित होने के उल्लेख मिलते हैं।
बल्लभ कुल सम्प्रदाय के वार्ता साहित्य से ज्ञात होता है कि सारस्वत कल्प में यमुना नदी जमुनावती ग्राम के समीप बहती थी। उस काल में यमुना नदी की दो धाराऐं थी, एक धारा नंदगाँव, वरसाना, संकेत के निकट वहती हुई गोबर्धन में जमुनावती पर आती थी और दूसरी धारा पीरधाट से होती हुई गोकुल की ओर चली जाती थी। आगे दानों धाराएँ एक होकर वर्तमान आगरा की ओर बढ़ जाती थी।
परासौली में यमुना नदी की धारा प्रवाहित होने का प्रमाण स. १७१७ तक मिलता है। यद्यपि इस पर विश्वास करना कठिन है। श्री गंगाप्रसाद कमठान ने ब्रजभाषा के एक मुसलमान भक्तकवि कारबेग उपमान कारे का वृतांत प्रकाशित किया है। काबेग के कथनानुसार जमुना के तटवर्ती परासौली गाँव का निवासी था और उसने अपनी रचना सं १७१७ में श्रजित की थी।






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