भारत में हर 20 मिनट में एक महिला के साथ यौन हिंसा रिपोर्ट की जाती है। इसी भयावह आंकड़े को याद दिलाने के लिए फिल्म ‘अस्सी’ में हर 20 मिनट बाद लाल स्क्रीन पर ‘20 मिनट’ लिखा आता है, मानो दर्शकों को झकझोर कर यह बताने के लिए कि वे जिस कहानी को देख रहे हैं, उसका आधार यह वास्तविकता है। शायद, यही शीर्षक फिल्म के लिए अधिक सार्थक भी होता।
फिल्म में पांच बलात्कारी हैं, जिनमें से दो को एक ‘छतरीधारी’ व्यक्ति गोली मारकर 'न्याय' कर देता है। लेकिन, शेष तीन को मारने से पहले ही उसे यह 'ज्ञान' प्राप्त हो जाता है कि यह 'सही' नहीं है और वह खुद को कानून के हवाले कर देता है। बाकी तीन अपराधियों का क्या होता है, यह नहीं बताया गया है। यह दर्शकों पर छोड़ दिया गया है कि उनका क्या होना चाहिए। हालांकि, वकील बनी तापसी पन्नू जज साहिबा से उनके लिए आजीवन कारावास की मांग करती हैं।
अंग्रेजी में पढ़ें : ‘Assi’, A film that reminds us every ‘20 Minutes’
अस्सी और नब्बे के दशक में चार-पांच बलात्कारियों को फिल्म के अंत में नायक या नायिका द्वारा ठिकाने लगा दिए जाने को लेकर ढेरों फिल्में बनी हैं। ऐसी फिल्मों में ‘मसाले’ का पूरा छोंक लगता था, और उन्हें ‘बी’ या ‘सी’ ग्रेड की फिल्म कहा जाता था। ‘अस्सी’ की शुरुआत में भी ऐसा ही आभास होता है। लेकिन, जब कभी लगता है कि फिल्म 'मसाला' बनने की ओर है, अनुभव सिन्हा 'ठहर' जाते हैं और इसे 'मसाला' नहीं बनने देते हैं। और, यही ‘संयम’ फिल्म को गंभीर और देखने लायक बनाए रखता है।
फिल्म कई जगह दर्शकों को उद्वेलित करती है और कई बार लाचारी का अहसास कराती है। हमारे अपने बनाए सामाजिक-न्यायिक तंत्र से सामना कराने में फिल्म सफल दिखती है। जीशान अयूब ‘लाचार पति’ और ‘जिम्मेदार पिता’ के रूप में प्रभावशाली दिखते हैं।
अपनी पिछली कुछ फिल्मों में किसी विशेष ‘एजेंडा’ को चलाने का आरोप झेलने वाले अनुभव सिन्हा इस बार किसी झमेले में नहीं पड़े हैं। बिना दाएं-बाएं हुए, सीधा चलकर, फिल्म के ‘केवट’ बने रहते हैं। यह अच्छी बात है। उम्र के साथ अनुभवी हो रहे हैं। हालांकि, फिल्म पब्लिसिटी के दौरान कुछ टिप्पणीकारों की ‘गैरजरूरी’ टिप्पणियों के चलते ऐसा संदेश जा रहा था कि यह फिल्म भी अपने पीछे कोई छुपा हुआ एजेंडा लिए हुए है। इसका नुकसान फिल्म के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों को जरूर होगा। लेकिन, फिल्म देखकर ऐसा लगता नहीं है। गंभीर विषय को बिना किसी पक्षपात के सही-सही सामने रखा गया है।
फिल्म के प्रचार से लगता है कि मुख्य नायिका तापसी पन्नू हैं। लेकिन, सबसे अहम भूमिका कनी कुसरुति की है। तापसी पन्नू वकील जैसी बिल्कुल नहीं दिखती हैं। कुमुद मिश्रा अब तक की सभी फिल्मों से ज्यादा ‘जवान’ नज़र आए हैं। वकालत करने में सत्यजीत शर्मा बेहतर वकील लगते हैं। जतिन गोस्वामी और मनोज पाहवा बेहतरीन हैं। देर तक याद रहते हैं। सीमा पहवा, नसीरुद्दीन शाह और सुप्रिया पाठक फिल्म में क्यों हैं, पता नहीं। शायद आपसदारी की वजह से कोई भी रोल करवाना था, सो करा लिया होगा।
फिल्म में दो गाने हैं जो याद नहीं रहते हैं। वैसे, स्वानंद किरकिरे का 'माई तेरी याद' एक बढ़िया गाना हो सकता था। उनके सभी गाने एक जैसे होते जा रहे हैं।
कुल मिलाकर, ‘अस्सी’ एक गंभीर विषय को बिना अतिशयोक्ति और बिना ‘मसाला’ बनाए प्रस्तुत करती है। इसे एक बार जरूर देखा जा सकता है, लेकिन दोबारा देखने की कोई वजह नहीं मिलती है।






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