बुद्धिधर्मी यूं ही न पड़ें इन राजनीतिकों के फेर में...!


राजनीतिक दलों और राजनीतिकों के फेर में ‘बुद्धिधर्मी’ न पड़ें! ‘फेर’ का मतलब उनका ‘पिछलग्गू’ न होने की बात हो रही है।

रिपोर्टिंग, लेखन, विश्लेषण तथा समालोचना की बात नहीं कर रहा हूं। राजनीतिक प्रतिबद्धता की भी बात नहीं हो रही है। वह करते रहिए, जो आपकी वैचारिक ज़मीन है, वहां बने रहिए।

यह सच है कि लोकतंत्र में बिना राजनीति के फेर में पड़े काम नहीं चल सकता! लेकिन, उनकी ईमानदारी,  वैचारिकता, 'पार्टी विद डिफरेंस' - घोषित करने के सन्दर्भ में ‘रिस्क’ मत लीजिए। नहीं तो फिर, आपको उनके अनुसार ही बार-बार बदलते और पलटते रहना पड़ेगा! बिना पेंदी के लोटे की तरह। कभी कुछ तो कभी और कुछ।

राजनीतिक नेता और दल समय-परिस्थिति, मौसम, समीकरण व हित के अनुसार अपनी राजनीति और रणनीति तय करते हैं। कभी एक कदम आगे, तो कभी दो कदम पीछे भी।

न जाने कितने उदाहरण हैं!

जैसे, नरेश अग्रवाल अब प्रखर 'राष्ट्रवादी' हैं! बतौर 'सामना' संपादक और शिवसेना नेता संजय निरुपम कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर जो-जो बोल और लिख चुके हैं, वह सामना की फाइलों में मिल जाएगा।

संजय राउत से बड़ा घनघोर 'सेकुलर' भला आज के युग में कौन होगा? कभी बसपा के ‘फायरब्रांड’ रहे स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा के नेता और मंत्री थे। फिर अलग हो गए।

भाजपा विपक्ष में रहते हुए किसानों के प्रति कितनी उदार थी, तमाम मुद्दों पर इनके क्या स्टैंड थे और अब सत्ता में रहते हुए, उन्हीं तमाम मुद्दों पर इनके क्या ‘स्टैंड’ हैं?

महंगाई, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दे हैं।

शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे शरद पवार को 'आटे की बोरी' कहते थे और शाम को सपरिवार पवार साहब उनके यहां भोजन पर आमंत्रित होते थे। निजी घनिष्ठता व राजनीतिक दुश्मनी, साथ-साथ...?

नीतीश कुमार और शरद यादव अलग-अलग हैं।

कभी ये सभी लोग लालू यादव के साथ थे। एकसाथ थे। और, फिर, अलग हो चले।

नीतीश कुमार 17 साल तक भाजपा के साथ रहे। फिर, अलग हो गए। जिनसे अलग हुए थे, फिर उनके साथ जुड़ गए। यानी, लालू से अलग हुए, फिर करीब 20 साल बाद मिलकर 'महागठबंधन' बना लिए। हां, जिनसे 17 साल की दोस्ती तोड़कर अलग हुए, फिर उनसे मिल गए 'बिहार की ख़ातिर'!  बिहार की जनता के हित में!

फिर कल क्या होगा? - यह उन्हें आज पता नहीं है!

उन्हें क्या, किसी को भी नहीं पता!

आज फिर महागठबंधन से जुड़ गए। बिहार की ख़ातिर ही न!

स्व. रामविलास पासवान अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल से अलग हुए 'गुजरात' मुद्दे पर। मंत्री पद स्वाहा कर दिए, 'सेकुलरिज्म' के नाम पर। बाद में, मोदी के बहुत ख़ास मित्र और सहयोगी बने। जब मुलायम सिंह के नेतृत्व में पुराने वाले 'जनता परिवार' के लिए प्रयास किए जा रहे थे, तब लालू ने बहन मायावती से अपील की थी कि आप मुलायम सिंह के साथ बिहार की तरह गठबंधन कीजिए। बहनजी ने तल्ख़ी के साथ जवाब दिया था कि 'हमारे लिए सत्ता से बढ़कर सम्मान है।'

खैर, बाद में अखिलेश यादव की सपा के साथ बसपा के गठबंधन हुए।

फिर, अब सब अलग हैं।

ये तो चंद नमूने हैं।

आपको प्रायः सभी राज्यों और दलों, वैचारिक धाराओं में बड़े नायाब उदाहरण मिल जाएंगे।

एक ही टोले-मोहल्लों में रहने वाले दलीय कार्यकर्ता बूथों पर, ज़मीन पर पार्टी, विचार के लिए मर-खप जाते हैं। उनके नेता पटना, लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और भोपाल में प्यार से रहते हैं। मिलते हैं। टैम टू टैम एक-दूसरे के काम आते हैं।

यह अच्छी बात है। कार्यकर्ताओं को भी इससे प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। लोकतंत्र में वाद-विवाद और संवाद जरूरी है। यह लोकतंत्र में ही तो संभव है।

संविधान और कानून का ख्याल रखिए। मार-पीट, हिंसा यह लोकतंत्र के खिलाफ जाता है।

इसलिए वैचारिकता, ईमानदारी, सरोकार और मूल्य वगैरह आप निजी स्तर पर लेकर चलते रहिए।

चट्टानी दलीय प्रतिबद्धता और अपने नेता की राजनीति-रणनीति का ‘पिछलग्गू’ बनकर आप बुद्धिधर्मी तो नहीं ही हो सकते।

मुंह मत ताकिये कि आपका नेता इस और उस मामले में क्या ‘स्टैंड’ लेता है - फिर उनके अनुसार आप मुंह खोलेंगे?

आप दल विशेष के कार्यकर्ता हैं, नेता हैं, रणनीतिकार हैं चलेगा। पर,  पत्रकार, बुद्धिधर्मी व विश्लेषक के रूप में नहीं फबेगा जी!



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