चैतन्य महाप्रभु यदि वृन्दावन न आये होते तो शायद ही कोई पहचान पाता कान्हा की लीला स्थली को, क्यों कि उस समय वैष्णव आन्दोलन जन-जीवन के अति करीब था। यह केवल पंण्डितों तक सीमित नहीं था यह समस्त जीव मात्र के लिए था। सिद्धान्तों का मनन चिन्तन सबके लिए था। यह वैष्णव आन्दोलन एक नैतिक और सामाजिक आन्दोलन के रूप में सामने आया, जिसमें समाज में व्याप्त कुरितियों छुआछूत और जाति-पाँति का कोई विचार न था। ईश्वर भक्ति में सबका समान रूप से अधिकार था। ईश्वर भक्ति ही महत्वपूर्ण है भक्तिपरक सिद्धान्त एवं भक्ति सभी के लिए था।
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