सर्द प्रदूषण के आगोश में आया समूचा उत्तर भारत


ज़रा जाड़े की उस सुबह की कल्पना कीजिए, धुंध इतनी गाढ़ी कि ताज महल का सफ़ेद संगमरमर भी भूत-सा दिखने लगे। हवा में ऐसी सड़ांध कि सांस लेते ही सीने में जलन हो और ठीक ताज के पीछ, यमुना नदी, जिसने कभी मुग़लों का इतिहास देखा, आज ज़हरीले झाग का उबलता कब्रिस्तान बन चुकी है। ऐसा लगता है मानो ताज महल अपनी ही धीमी मौत का मातम मना रहा हो।

आगरा आज कोई साधारण शहर नहीं है बल्कि यह उत्तर भारत के पर्यावरणीय पतन का जीता-जागता आईना है। नवंबर में आगरा का औसत एक्यूआई 350-450 के बीच रहा, कई दिन 500 पार पहुंचा। यमुना में ऑक्सीजन लेवल 0-2 mg/L तक गिर चुका है। जबकि, न्यूनतम जरूरी 5 mg/L), बीओडी 40-80 mg/L और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया लाखों/100 एमएल में। यही पानी ताज महल के पीछे सफ़ेद जहरीली झाग की चादर बनाता है।

Read in English: North India in the grip of ‘Cold Pollution’

25-26 नवंबर को दिल्ली का एक्यूआई कई इलाकों में 480-550 तक पहुंचा। पीएम2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ मानक से 30-40 गुना ज्यादा रहा। पिछले 10 दिन में दिल्ली-एनसीआर में अस्थमा के मरीजों में 40-50 फीसदी इजाफा दर्ज हुआ। स्कूल बंद, निर्माण कार्य रुके, लेकिन पराली जलाने का योगदान इस बार 30-35 फीसदी तक पहुंचा। पंजाब में मौजूदा फसल सीजन में अब तक 8,000+ पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हुई हैं।

दिल्ली से आगरा पहुंचते-पहुंचते यमुना में 80 फीसदी पानी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट होता है। दिल्ली रोज 3,800 एमएलडी सीवेज पैदा करती है, जिसमें से केवल 2,200 एमएलडी की ट्रीटमेंट क्षमता है। 35 फीसदी सीवेज अनट्रीटेड नदी में जाता है। आगरा में 22 में से सिर्फ नौ एसटीपी कार्यरत हैं, बाकी या तो बंद या आंशिक रूप से चालू हैं। नमामि गंगे के तहत यमुना के लिए 2014 से अब तक ₹8,500 करोड़ से ज्यादा खर्च, लेकिन साल 2025 में भी यमुना दिल्ली से आगरा तक “क्लास ई” (केवल सिंचाई योग्य) ही बनी हुई है।

साल 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज ट्रेपेजियम जोन में 292 प्रदूषणकारी उद्योग बंद करने का आदेश दिया था।  2015-2023 के बीच कई उद्योगों को ‘अस्थायी अनुमति’ मिली, जो अब स्थायी हो गईं। एनजीटी ने 2023-24 में आगरा-मथुरा क्षेत्र में 500+ अवैध इकाइयों पर जुर्माना लगाया, लेकिन 70 फीसदी से ज्यादा अभी भी चल रही हैं। साल 2025 में यमुना घाटी से 1.5 लाख टन से ज्यादा अवैध रेत खनन के मामले दर्ज किए गए।

साल 1985 में ताज का पीला पड़ना शुरू हुआ था। साल 1993 में ताज ट्रेपेजियम जोन बना। साल 2014 में नमामि गंगे शुरू हुई।  साल 2017 में ग्रैप लागू हुआ। फिर भी, साल 2025 में भी हम वहीं खड़े हैं, बल्कि और पीछे हैं।

ताज महल, जिसे इंसान ने प्यार की निशानी बनाया था, आज उसी इंसान के लालच और लापरवाही से घुट रहा है। यह सिर्फ एक स्मारक का संकट नहीं है बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों की सांसों का संकट है। यमुना सिर्फ नदी नहीं, उत्तर भारत के पर्यावरणीय स्वास्थ्य की धड़कन है और यह धड़कन अब रुकने की कगार पर है।

अगर सरकार बहाने छोड़कर वास्तविक कदम उठाए, सख्त नियम, कड़ाई से अमल, भ्रष्टाचार पर लगाम, प्रदूषण करने वालों पर बिना राजनीतिक दबाव के कार्रवाई, और अदालतें अपने संवैधानिक दायित्व को याद रखें, तभी कुछ उम्मीद बचेगी। वरना, ताज महल की यह धीमी मौत, एक दिन पूरे उत्तर भारत की मौत का आईना बन जाएगी।



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