नेतृत्व ‘विहीन’ होती जा रही है दलित राजनीति…!


साल 1984 में 14 अप्रैल को दलितों के हितों के रक्षार्थ कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। उनसे पहले, संभवत: दलित समाज के हितों के लिए विशेष समर्पित कोई भी पार्टी अस्तित्व में नहीं थी। इस पार्टी के गठन के पश्चात दलितों को कांशीराम के रूप में एक ‘मसीहा’ प्राप्त हुआ। अति वयोवृद्ध हो जाने के बाद कांशीराम ने एक शिक्षित, परिश्रमी एवं युवा मायावती को पार्टी के दायित्व स्थानान्तरित कर दिए।

मूलतः गौतम बुद्ध नगर की निवासी मायावती ने नए दायित्व को पूर्ण निष्ठा से ग्रहण किया और वर्ष 1990 के दशक में दलितों ने उन्हें देवी सदृश स्थान प्रदान कर दिया। उनके समाज के सभी लोग, उनके एक संकेत मात्र पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर रहने लगे। इस प्रकार उनकी लोकप्रियता में तीव्र गति से वृद्धि हुई और वह उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनने में सफल हुई। परिणामस्वरूप, एक समय उनको प्रधानमंत्री पद का प्रबल उम्मीदवार माना जाने लगा।

मायावती की निरन्तर लोकप्रियता में वृद्धि को देखकर एक समय विपक्षियों में निराशा गहराने लगी थी। लेकिन, शीघ्र ही उन पर पार्टी के टिकट बेचने व भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के आरोप लगने लगे। उनके साथ-साथ उनके भाई आनन्द एवं उनके अधीनस्थ कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के नाम भी उनके लिए धन एकत्रित करने के रूप में उजागर होने लगे। इस तथ्य में कितनी सत्यता है, यह पूर्ण साक्ष्यों के अभाव में सिद्ध नहीं किया जा सकता, परन्तु इस प्रकार के आरोपों से मायावती की शीर्ष लोकप्रियता साल 2000 के आते-आते निरन्तर घटती चली गई। मायावती का रौद्र रूप शिथिल होना शुरू हो गया और बसपा पार्टी पतन की ओर अग्रसर होने लगी। अगले दो दशकों तक बसपा लोकसभा में सम्मानजनक स्थान पाने के लिए लगातार संघर्ष करती रही।

बसपा को पुनर्जीवित करने के लिए मौजूदा दौर में साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान मायावती ने ‘एकला चलों‘ सिद्धान्त पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसी क्रम में, उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपने प्रत्याशी घोषित किए और अपने भतीजे आकाश को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया। युवा दलितों ने आकाश को अपने नेता के रूप में उन्मुक्त हृदय से स्वीकार करना शुरू ही किया था कि तभी अचानक उन्होंने अपने इस निर्णय को वापस ले लिया और आकाश को पार्टी के समस्त दायित्वों से मुक्त कर दिया। इस निर्णय से दलितों में अत्यधिक निराशा उत्पन्न हो गई और वे स्वयं को नेतृत्व विहीन समझने लगे। वे असमंजस में थे कि इस स्थिति में अब वे मोदी अथवा कांग्रेस में से किसको अपना समर्थन दें। यद्यपि दलित का एक बड़ा समूह मोदी का पक्षधर था, इसीलिए उन्होंने उनके 400 पार सीट के नारे का समर्थन किया परन्तु भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा अपने चुनावी भाषणों में 400 सीटों की आवश्यकता को संविधान संशोधन के साथ जोड़कर जनता के समक्ष कह देने से दलितों को उनके आरक्षण पर आंच आने का संशय होने लगा। संभवतः उन्होंने निर्णय लिया कि वे डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा निर्मित संविधान में आरक्षण से संबंधित किसी भी परिवर्तन को किसी भी तरह स्वीकार नहीं करेंगे और उन्होंने चुनावी प्रक्रिया के मध्य ही अपना मन बदलने का फैसला कर लिया।

शायद, उपरोक्त दोनों घटनाओं के बाद दलित समाज का विश्वास मायावती और मोदी से हट गया। राजनैतिक विशेषज्ञों की मानें तो साल 2024 के चुनावों में यदि मायावती अपने उम्मीदवारों को एक अथवा दो सीटो पर भी विजयी बनाने में सफल हो जाती हैं तो उनके लिए यह एक विशेष उपलब्धि होगी। देश की दिशा व दशा को चुनावी परिणाम किस ओर ले जाएगे, इसका निर्णय तो 4 जून को ही होगा, परन्तु वर्तमान स्थिति यह है कि दलित स्वयं को नेतृत्व विहीन समझ रहे हैं।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। यहां व्यक्त विचार स्वयं उनके हैं)



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