“पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है, कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या...”


क्या ऐसा भी कोई होगा जो गालिब को न जानता हो...! खैर, जो नहीं जानते हैं, उनके लिए स्वयं गालिब का यह जवाब हाजिर है... “पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है, कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या”...

गालिब, जिन्होंने जीवनपर्यंत शेर औ’ शायरी को समृद्ध किया, विडम्बना देखिए, अपने अंतिम दिनों में कर्जदार होकर इस दुनिया से रुखसत हुए। एक समाज के तौर पर यह बात आज भी दिल को लगती है कि जिसकी शायरी ने हमारे दिलों को ठंडक पहुंचाई, हम उसके पेट को ठंडक न पहुंचा सके।

गालिब, जिसकी जिंदगी 27 दिसंबर 1797 को मिर्जा नौशा नाम पाकर आगरा से चली, तो अपनी लेखनी को उर्दू के फलक पर हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज कराकर, 15 फरवरी 1869 को ‘मिर्जा गालिब’ नाम से होकर दिल्ली मे थमी।

जब गालिब ने होश संभाला तब भारत में मुगलिया सल्तनत का सूर्यास्त और ब्रितानी हुकूमत का सूर्योदय हो रहा था। तब, आगरा को अकबराबाद और शायरी को मीर तकी मीर से पहचाना जाता था। ऐसे में गालिब का सफर शुरू होता है।

जन्म के समय परिवार आर्थिक रूप से सशक्त था। पांच वर्ष की उम्र में उनके वालिद का इंतकाल हो गया, जो किसी नवाब के यहां नौकर थे। नवाबी के दिन ढले तो परिवार की हैसियत ढलनी ही थी। आठ वर्ष की उम्र में चाचा को भी अपने पास बुला लिया, जो पिता के बाद गालिब के सिर पर एकमात्र साया थे। इस सब के चलते गालिब को स्कूली शिक्षा नसीब न हुई।

गालिब कहते थे कि ऊपरवाला बहुत कुछ लेता है तो देता भी। संभवत: गालिब को प्रतिभा बक्शी, जिसके बूते 11 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने गद्य और पद्य लिखना शुरू कर दिया था। तेरह साल की उम्र मे निकाह के बाद, जिंदगी की बाकी पारी दिल्ली मे खेली।

गालिब ने सोचा दिल्ली, जहां शायरी की कदर होती है वहां जाकर वह अपने जीवन को अर्थ दे पाएंगे। गालिब ने उसी दिल्ली के बारे में ख्वाब पाले थे, जिसके बारे में मीर तकी मीर ने कभी कहा था - “दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं, उन्हें था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का”...

दिल्ली किस मिजाज का शहर है, यह समझना हर किसी के बस की बात नहीं थी। जो भी हो, गालिब दिल्ली में बस गए, और दिल्ली उनके रोम रोम में। बाद में वही दिल्ली गालिब के नाम से जानी जाने लगी।

गालिब, जो हमारी पीढ़ी से जगजीत सिंह, मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज में रूबरू हुए, उसी थोड़े से गालिब को हमने सुना, गाया और गुनगुनाया। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी सामूहिक बौद्धिकता उतने ही गालिब को समझने लायक विकसित हो पाई है। 25 वर्ष तक होते होते ही गालिब ने दो हजार से ज्यादा शेर लिख लिए थे।

मीर तकी मीर ने गालिब को देखकर कहा था कि - कोई ढंग का उस्ताद मिल गया तो आगे चलकर यह लाजबाव शायर बनेगा। मीर तकी मीर से बड़ा शायर उस समय कौन था। गालिब ने उन्ही को अपनी प्रेरणा माना और दुनिया को लाजवाब कर दिया। उर्दू में शायद ही कोई हुआ हो जो खुद को गालिब से बड़ा समझता हो। गालिब किंवदंती बन गए।

गालिब, जिसकी जिंदादिली और हाजिरजवाबी के अनेक किस्से इस बात के प्रमाण हैं की वह कितने अद्भुत और अप्रतिम शायर रहे होंगे। जवानी से लेकर बुड़पे तक उनके मस्तमौलापन के तमाम सबूत मिलते हैं।

अपने अंतिम समय में जब वह बीमार थे तो मजरूह उनके पैर दबाने लगे। गालिब ने उन्हें रोका। इस पर मजरूह बोले, “मजदूरी दे दीजिए…”। पैर दबाने के बाद जब मजरूह ने पैसा मांगा तो गालिब बोले कि तुमने मेरे पैर दबाए मैंने तुम्हारा पैसा...। सब हंस दिए।

कमाल देखिए गालिब जिसे पढ़ना नसीब नहीं हुआ, उसे इतिहास में सर्वाधिक पढ़ा गया। गालिब के बिना उर्दू अधूरी है। जब गालिब ने दुनिया छोड़ी तो बरबस सबके मुंह से निकला की उर्दू ही अनाथ हो गई। किसी साहित्यकार के लिए शायद ही इससे बड़ा कोई ईनाम हो।






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