बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

हाल ही में गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस ने ग्रीन कॉरिडोर की मदद से जीवित हृदय समय पर पहुंचाकर इतिहास रचा। एक परिवार अपने प्रियजन को हमेशा के लिए विदा कर रहा था। उसी समय, किसी दूसरे अस्पताल में एक मरीज नई जिंदगी की उम्मीद से ऑपरेशन थिएटर में ले जाया जा रहा था। एक घर का ग़म, दूसरे घर की खुशी बन गया। अंगदान की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इंसान इस दुनिया से जाने के बाद भी कई लोगों की धड़कनों में ज़िंदा रह सकता है।

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क्रिकेट मैच देखने के लिए टिकट खरीदने से आप क्रिकेटर नहीं बन सकते, वोट डालने से नेताजी नहीं बन सकते, लाल टोपी पहनने से क्रांतिकारी नहीं हो सकते, सिर्फ शादी होने से बाप नहीं कहलाए जा सकते, तो फिर पासपोर्ट बनवाने से भारतीय नागरिक कैसे?

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​नदियां कभी सरहदें नहीं मानतीं। वे जीवन, संस्कृति और सभ्यता को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। लेकिन, जब कोई शहर या राज्य अपनी गंदगी नदी में उड़ेल देता है, तो वह ज़हर भी सीमाएं नहीं मानता। वह भी बहते-बहते दूर तक पहुंचता है। आज यमुना इसी राष्ट्रीय शर्म की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है।

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क्या हम ताज महल को बचा रहे हैं, या धीरे-धीरे उसे धूल, धुंध और धुएं में दफ़न कर रहे हैं? आगरा की हवा साल के अधिकांश दिनों में ज़हरीली रहती है...

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ज़रा सोचिए। अगर कल सुबह कोई सरकार कह दे कि अब नमक खरीदना भी अमीरों का शौक़ होगा, तो क्या होगा? दाल बेस्वाद हो जाएगी। रोटी गले से नहीं उतरेगी। गरीब की थाली और भी सूनी हो जाएगी...

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नई दिल्ली का जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।

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