अग्निदेव और उनकी ‘स्वाहा’ के साथ विवाह की कहानी


आग के देवता अग्निदेव का हिंदू धर्म ग्रथों में विशेष स्थान है। अग्निदेव को उच्च कोटि का देवता माना गया है। मनुष्यों का सारा काम ही अग्नि पर निर्भर करता है। अग्निदेव को भगवान इंद्र का जुड़वां भाई माना जाता है। वह उन्हीं की तरह विशाल और शक्तिशाली हैं। अग्निदेव के माता-पिता के बारे में काफी मतभेद हैं।

अग्निदेव मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक साथ रहते हैं। कोई भी शुभ कार्य अग्निदेव के रूप में हवन कर किया जाता है। शादी विवाह में अग्नि के ही समक्ष सात फेरे लिए जाते हैं। हिन्दू मान्यता में बिना अग्नि में चिता के जले हुए मुक्ति प्राप्त नहीं होती।

एक अन्य रोचक कहानी ‘स्वाहा’ की उत्पत्ति से जुड़ी हुई है। इसके अनुसार, स्वाहा प्रकृति की ही एक कला थी, जिसका विवाह अग्नि के साथ देवताओं के आग्रह पर सम्पन्न हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं स्वाहा को यह वरदान दिया था कि केवल उसी के माध्यम से देवता हवन सामग्री को ग्रहण कर पाएंगे। स्वाहा का अर्थ है सही रीति से पहुंचाना। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ होता है भौगिक पदार्थ को उसके प्रिय तक पहुंचाना।

हिन्दू पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार सभी देवता, एकसाथ ब्रह्मा की सभा में पहुंचे। एकसाथ सभी देवताओं को देखकर ब्रह्मा चौंक गए। पता चला सभी देवताओं का एक ही दुःख है कि उन तक आहुति पूरी तरह से नहीं पहुंचती है। जब ब्रह्मा ने देवताओं की परेशानी सुनी तो वे ख़ुद सोच में पड़ गए। जब कुछ नहीं सूझा तो विष्णु को याद करने लगे। ब्रह्मा के बुलाने पर, भगवान विष्णु यज्ञ के रूप में प्रकट हुए। जब उस यज्ञ में हवन की सामग्री की आहुति दी गई तो वह सब ब्रह्मा ने देवताओं को दे दी। लेकिन, ऋषि, मुनि, ब्राह्मण और क्षत्रिय या अन्य वर्ण के मानव जो हवन कर रहे थे, वह देवताओं तक नहीं पहुंची। देवता दोबारा परेशान हुए और ब्रह्मसभा में गए और वहां जाकर घटना का हू-ब-हू वर्णन कर दिया। ब्रह्मा फिर चिंतित हो गए फिर वे कृष्ण के पास गए और कृष्ण के बताए अनुसार उन्होंने प्रकृति का ध्यान किया।

प्रकृति प्रकट हुईं और ब्रह्मा से कहा, “हे पद्मयोने, वर मांगो।” ब्रह्मा बोले, “प्रकृति तुम अग्नि देव की दाहिका शक्ति बन जाओ। उनसे विवाह कर लो क्योंकि, अग्नि देव अकेले आहुतियों को भस्म करने में असमर्थ हैं। तुम्हारी उपस्थिति के बाद जो मानव, मंत्र के अन्त में तुम्हारे नाम का उच्चारण करके देवताओं के लिए हवनीय पदार्थ अर्पण करेगा, उनका ही हविष्य यानी हवन में देने वाली सामग्री देवताओं को सहज रूप में उपलब्ध हो सकेगी। तुम्हारा यह उपकार देवता और मनुष्य कभी नहीं भूलेंगे।“

ब्रह्मा की बात सुनकर प्रकृति उदास हो गई। उन्होंने ब्रह्मा से कहा, “ब्रह्म! मैं कृष्ण की सेवा करना चाहती हूं। मैं नहीं जानती कब तक उनकी तपस्या करती रहूंगी। मेरे लिए कृष्ण के अलावा जो कुछ भी है वह एक सपने की तरह है, केवल भ्रम है। आप जगत के सृष्टिकर्ता हो, आप जानते हो - शिव ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की, शेषनाग पूरे विश्व को धारण किए हैं, धर्म समस्त देहधारियों का साक्षी है, गणेश सबसे पहले पूजे जाते हैं और जगदम्बा जो सब तरफ़ पूजनीय हैं– यह सब कृष्ण की वजह से ही हुआ है। इसलिए पद्मज! मैं इस बारे में कोई भी वचन नहीं दे सकती हूं।”

यह कहकर प्रकृति कृष्ण की तपस्या करने के लिए चल दीं। एक पैर पर खड़ी होकर वर्षों उन्होंने कृष्ण का ध्यान-तप किया। आख़िरकार, कृष्ण प्रकट हुए। लेकिन, ज्यों ही प्रकृति ने कृष्ण को देखा वे बेहोश हो गईं। वह लम्बे समय तक तपस्या के कारण कमज़ोर हो गई थीं। कृष्ण प्रकृति के मन की बात समझ गए। उन्होंने प्रकृति को उठाया और कहा -“प्रिय! तुम वाराहकल्प में अपने अंश से मेरी प्रेमिका बनोगी। तुम्हारा नाम ‘नाग्नजिती’ होगा। राजा नग्नजित तुम्हारे पिता होंगे। लेकिन, इस समय तुम दाहिकाशक्ति के रूप में अग्नि देव का हाथ थामना होगा। तुम ‘स्वाहा’ कहलाओगी। तुम मन्त्रों की अंगभूता होओगी। तुम्हारे बिना कोई भी मंत्र, हवन पूरा नहीं माना जाएगा। तुम्हारे ही ज़रिए देवताओं तक आहुति पहुंचेगी और उनका मन शांत हो सकेगा।“

कृष्ण अपनी बात कहकर चले गए। इसके बाद प्रकृति ने दक्ष प्रजापति के यहां स्वाहा के रूप में जन्म लिया। ब्रह्मा के कहने पर अग्निदेव डरते-डरते वहां पहुंचे और सामवेद में लिखे अनुसार प्रकृति का ध्यान किया, अच्छी तरह से पूजा की। उसके बाद अग्निदेव ने स्वाहा का पत्नी के रूप में हाथ थामा। तब ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सभी ने ‘स्वाहान्त’ के साथ मंत्रोच्चार कर हवन करने लगे और वह देवताओं को भोजन के रूप में मिलने लगा। यह देखकर देवता, ब्राह्मण, क्षत्रिय यज्ञ करते सभी ख़ुश हो गए। देवताओं को आहुतियां मिलने लगीं और देखते ही देखते पृथ्वी लोक पर सभी काम सफल होने लगे।

पांच तत्वों में से एक, अग्नि का एक विशेष गुण है कि वह अंगीकार करते हुए यह नहीं देखती कि वह किसी राजमहल की महंगी छत को राख कर रही है या किसी तिनके से बनी हुई छप्पर को। किसी भी वस्तु को जलाकर राख कर देने की अग्निदेव की यह शक्ति किसी वरदान की वजह से नहीं अपितु एक श्राप की वजह से है।

ब्रह्मा के पुत्र कहे जाने वाले महर्षि भृगु एक दिन संध्या उपासना करने के लिए अपने आश्रम से गंगा तट की ओर जाने लगे। रास्ते में पुलोमन नाम के एक राक्षस ने उन्हें जाते हुए देखा तो वह एक साधु का भेष बनाकर उनके आश्रम गया। वहां उसने ‘भिक्षाम देहि!’ की आवाज़ लगाई, जिसे सुनकर भृगु की गर्भवती पत्नी पुलोमा बाहर आईं और उन्होंने साधु के रूप में आए राक्षस को प्रणाम किया और भोजन का न्योता देकर अंदर बुलाकर भोजन परोसा।

वह राक्षस पुलोमा को देखने आया था क्योंकि बचपन में ही पुलोमा का वाग्दान संस्कार उनके पिता ने पुलोमन के साथ कर दिया था। पुलोमा की खुबसूरती देखकर पुलोमन को दुख हुआ परंतु उसने कुछ भी अनुचित नहीं किया, बस भोजन ग्रहण किया और कुटिया से बाहर निकल आया। कुटिया के बाहर ही हवन कुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित थी, जिसे प्रणाम करके पुलोमन ने कहा, “हे अग्निदेव! आपको आपके धर्म की सौगंध है, कृपया मेरे प्रश्नों का सत्य-सत्य उत्तर दें।” अग्निदेव बोले, “पूछो वत्स!”इस पर पुलोमन ने प्रश्न किया, “पुलोमा के पिता इसका विवाह बचपन में ही मेरे साथ कर चुके थे पर युवा होने पर इसका विवाह भृगु ऋषि के साथ करा दिया गया, तो अब आप ही बताइए यह किसकी पत्नी है?” यह सुनकर अग्निदेव हिचकिचाए तो पुलोमन बोला, “देखिये प्रभु! अगर आप कहते हैं कि यह मेरी ही पत्नी है तो मैं अभी इसे लेकर यहां से चला जाऊंगा और यदि आपने झूठ बोला तो मैं आपको श्राप दे दूंगा।”

अब अग्निदेव असमंजस में पड़ गए और कुछ देर रुककर बोले, “सुनो पुलोमन! यह सत्य है कि पुलोमा का विवाह पहले तुम्हारे साथ ही हुआ था परंतु तुम्हारे साथ हुआ विवाह केवल वाणी के आधार पर था परंतु महर्षि भृगु के साथ हुआ विवाह समस्त रीति-रिवाज को पूर्ण करते हुए हुआ था।”

यह सुन पुलोमन क्रोधित हो उठा और जबरदस्ती पुलोमा को उठाकर ले जाने लगा, जिसके कारण उसी समय पुलोमा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसके तेज से पुलोमन जल गया, यह सब देख पुलोमा डरकर रोने लगीं। तभी महर्षि भृगु आए और उन्हें समस्त घटना का पता लगा, जिससे क्रोधित हो उन्होंने अपने हाथ में जल लेकर अग्निदेव को श्राप दिया कि अगर तटस्थता ही तुम्हारा स्वभाव है तो आज मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि अब से तुम सही गलत के चुनाव किए बिना हर वस्तु का भक्षण करोगे।”

यह सुन अग्निदेव अंतर्ध्यान हो गए, जिसके कारण समस्त सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई और सभी देवता अपनी इस विपत्ति को लेकर ब्रह्मा के पास पहुंचे। सभी की बात सुन ब्रह्मा ने अग्निदेव को बुलाकर उन्हें वरदान दिया कि आपके स्पर्श मात्र से ही सब कुछ शुद्ध हो जाएगा और आज से समस्त देवताओं को अर्पित किए गए भोग में से एक हिस्सा आपका होगा। ब्रह्मा से यह वरदान पाकर अग्निदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और पृथ्वी पर वापस लौट आए और सबका जीवन पहले की ही तरह सुचारू रूप से चलने लगा।

हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि यज्ञ का प्रयोजन तभी पूरा होता है, जबकि आह्वान किए गए देवता को उनका पसंदीदा भोग पहुंचा दिया जाए। हवन सामग्री में मीठे पदार्थ का शामिल होना भी आवश्यक है, तभी देवता संतुष्ट होते हैं। सभी वैदिक व पौराणिक विधान अग्नि को समर्पित मंत्रोच्चार और स्वाहा के द्वारा हवन सामग्री को देवताओं तक पहुंचने की पुष्टि करते हैं।

अग्निदेव यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

पुराणों के अनुसार अग्निदेव की दो बहनें हैं दिन और रात। अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए।इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या 49 है। भगवान कार्तिकेय को अग्निदेव का भी पुत्र माना गया है। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।

वैदिक ग्रंथों में भगवान अग्नि को अग्निमय लाल रंग के शरीर के रूप में वर्णित किया गया है, जिसके तीन पैर, सात भुजाएं, सात जीभ, तेज सुनहरे दांत होते हैं। अग्निदेव दो चेहरे, काली आंखें और काले बाल के साथ घी के साथ घिरे होते हैं। अग्निदेव के दोनों चेहरे उनके फायदेमंद और विनाशकारी गुणों का संकेत करते हैं। उनकी सात जीभें काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि उनके शरीर से विकिरित प्रकाश की सात किरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। भेड़ उनका वाहन है। कुछ छवियों में अग्निदेव को एक रथ पर सवार दिखलाया गया है जिसे बकरियों और तोतों द्वारा खींचा जा रहा होता है। अग्निदेव की दिशा दक्षिण है। वैदिक देवता, अग्नि देवताओं के संदेशवाहक और बलिदान कर्ता हैं। अग्नि जीवन की चमक है जो हर जीवित चीज में है।

माना जाता है कि अग्निदेव बहुत जल्दी क्रोधित हो जाते हैं। उनमें भूख बर्दाश्त करने की शक्ति नहीं है। जन्म लेते ही उन्हें भूख लग गई थी किन्तु भोजन न होने के कारण वह अपने माता-पिता को ही खा गए थे। इसलिए अग्निदेव को बलि या आहुति देना आवश्यक होता है। अग्नि अमीर-गरीब सभी के देवता हैं। वह किसी के साथ दो व्यवहार नहीं करते। विनम्रता से उनसे प्रार्थना करने पर वह धन, बल एवं समृद्धि प्रदान करते हैं।

अग्निदेव यज्ञ के प्रधान अंग हैं। यह सर्वत्र प्रकाश एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द ‘अग्नि’ ही प्राप्त होता है। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द ‘अग्नि’ ही है।

आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बताते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं और इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।

इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियां प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेव की स्तुति करता हूं, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गए हैं। पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से एक के अनुसार महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा मांगने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल मांगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुंचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइएगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया।

अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दोबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरुपत्नी को प्रदान कर पाए थे। अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था। अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है।



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