जब रुपहले पर्दे पर गूंज उठा 'हनुमान चालीसा'...

भारतीय सिनेमा में कुछ रचनाएं इस तरह प्रयोग में लाई जाती हैं कि इनके पर्दे पर आते ही किसी दृश्य का प्रभाव पूरी तरह बदल जाता है। 'हनुमान चालीसा' भी उनमें से एक है। इस रचना का हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल कभी भय और संकट के बीच आस्था जगाने के लिए हुआ, तो कभी किसी पात्र की भीतरी शक्ति को जाग्रत होते दिखाने के लिए...। कुछ फिल्मों में इसका पाठ कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बना तो कहीं इसकी धुन ने सामान्य से दिखने वाले दृश्य को भी यादगार बना दिया।

फिल्मकारों ने 'हनुमान चालीसा' को अलग-अलग परिस्थितियों में कई तरह से इस्तेमाल किया है। फिल्म ‘वाह! लाइफ हो तो ऐसी!’ (2005) में हनुमान चालीसा का पाठ शंकर महादेवन और अजय की आवाज में है और इसे अरशद वारसी और शाहिद कपूर पर फिल्माया गया था। जब सिनेमाघरों में यह दृश्य आता था तो एक अलग ही समां बंध जाता था। अजय-अतुल ने इसे संगीत से संवारा था।


साल 2008 में विक्रम भट्ट के निर्देशन में बनी ‘1920’ इस संदर्भ में सबसे उल्लेखनीय फिल्मों में से एक है। रजनीश दुग्गल और अदा शर्मा अभिनीत इस हॉरर फिल्म में जब अर्जुन सिंह राठौड़ का चरित्र असाधारण और भयावह परिस्थितियों से गुजरता है तो एक महत्वपूर्ण दृश्य में वह हनुमान चालीसा का पूरा पाठ करता है। यहां चालीसा का इस्तेमाल केवल धार्मिक वातावरण बनाने के लिए नहीं किया गया, बल्कि यह नायक के विश्वास और विपरीत परिस्थितियों में उसके प्रतिरोध का प्रतीक बनता है। फिल्म के शुरुआती क्रेडिट में भी फिल्म का नायक हनुमान चालीसा का पाठ करता नजर आता है।

डरावनी फिल्मों में अक्सर दर्शकों के मन में भय पैदा करने के लिए अंधेरे, रहस्यमय आवाजों और अनदेखी शक्तियों का सहारा लिया जाता है। ‘1920’ में 'हनुमान चालीसा' इस भय के सामने आस्था की उपस्थिति दर्ज कराता है। पाठ का परिचित स्वर दर्शकों को एक ऐसा सांस्कृतिक संदर्भ देता है, जिसमें संकट के बीच साहस और सुरक्षा की उम्मीद जुड़ी हुई है। फिल्म में इसका इस्तेमाल पूरी तरह कहानी के वातावरण से मेल खाता है और इसे यादगार दृश्य बनाता है।

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साल 2014 में आई एकता कपूर की 'रागिनी एमएमएस 2' के शुरुआती क्रेडिट में भी पृष्ठभूमि से 'हनुमान चालीसा' गायन की ध्वनियां आती है। शुरुआत में ही इसके गायन से फिल्म एक अतिरिक्त उत्सुकता जगा देती है।


फिल्म ‘लंदन ड्रीम्स’ (2009) में मध्यांतर से ठीक पहले 'हनुमान चालीसा' आता है। इसे सलमान खान का चरित्र मंच पर उसके द्वारा दी जा रही प्रस्तुति के दौरान गाता है। मध्यांतर से ठीक पहले हनुमान चालीसा का गायन फिल्म की कहानी को एकदम से ऊपर ले जाता है। अजय देवगन और सलमान खान अभिनीत इस फिल्म का मुख्य विषय संगीत, महत्वाकांक्षा और दो मित्रों के बीच बदलते संबंध हैं।

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कबीर खान की ‘बजरंगी भाईजान’ (2015) में 'हनुमान चालीसा' का प्रयोग एक अलग ही प्रभाव पैदा करता है। सलमान खान द्वारा अभिनीत पवन कुमार चतुर्वेदी का चरित्र हनुमान का अनन्य भक्त है। उसकी धार्मिक आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती है, बल्कि उसके व्यवहार, ईमानदारी और कठिन परिस्थितियों में लिए गए फैसलों में भी दिखाई देती है।

फिल्म के एक चर्चित एक्शन दृश्य में पवन एक बच्ची को बचाने के लिए मानव तस्करों से भिड़ जाता है। इस दौरान 'हनुमान चालीसा' की तेज और जोशीली प्रस्तुति दृश्य की ऊर्जा को बढ़ा देती है। सलमान खान का आक्रामक रूप, संकट में फंसी बच्ची को सुरक्षित निकालने का प्रयास और पृष्ठभूमि में बजता 'हनुमान चालीसा' मिलकर ऐसा प्रभाव पैदा करते हैं, जिसमें धार्मिक आस्, साहस और शारीरिक शक्ति एक साथ दिखाई देते हैं।

इस फिल्म में 'हनुमान चालीसा' का दूसरा महत्व उसके मुख्य पात्र के चरित्र-चित्रण में है। पवन की भक्ति उसके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा है। वह अपने विश्वास को दूसरों पर थोपने के बजाय एक बच्ची को उसके परिवार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाता है। इस तरह फिल्म में धार्मिक पहचान और मानवीय संवेदना एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि साथ-साथ चलती हैं। 'हनुमान चालीसा' का इस्तेमाल इस चरित्र की पहचान को मजबूत करता है और दर्शकों को उसके भावनात्मक संसार से जोड़ता है।


साल 2024 में आई मूल रूप से तेलुगू फिल्म 'हनु-मैन' में 'हनुमान चालीसा' अभिनेता तेजा सज्जा पर फिल्माया गया। गौरा हरि के संगीत में इसे साईचरन ने गाया था। फिल्म में नायक को हनुमान की शक्तियां मिल जाती हैं तो पृष्ठभूमि में 'हनुमान चालीसा' इस भाव को एक नई ऊंचाई देता है।


फिल्म ‘1920’, ‘बजरंगी भाईजान’ और 'हनु-मैन' में हनुमान चालीसा का संबंध पात्र की आस्था और कहानी की निर्णायक परिस्थितियों से स्पष्ट रूप से जुड़ता है। '1920' में यह भय के बीच प्रतिरोध और विश्वास का प्रतीक बनती है, जबकि 'बजरंगी भाईजान' में साहस, संरक्षण और एक बच्ची को बचाने के संकल्प को प्रभावी बनाता है। 'हनु-मैन' में यह मुख्य चरित्र को सीधे हनुमान की ताकत से जोड़ता है। ‘बजरंगी भाईजान’ के एक्शन दृश्य को इसकी प्रस्तुति के लिए विशेष सराहना मिली, जबकि ‘1920’ में इसका इस्तेमाल डरावने वातावरण और नायक के विश्वास के मेल के कारण याद रखा जाता है।

'हनुमान चालीसा' की सिनेमाई शक्ति का एक कारण यह भी है कि बहुत से भारतीय दर्शकों के लिए इसकी पंक्तियां पहले से परिचित हैं। फिल्मकार जब किसी संकटपूर्ण दृश्य में इसका पाठ या संगीत रखते हैं, तो दर्शक उसके अर्थ और भाव से तुरंत जुड़ जाते हैं। इस परिचित सांस्कृतिक अनुभव के कारण बिना लंबे संवादों के भी किसी पात्र का विश्वास, भय या साहस व्यक्त किया जा सकता है।

हनुमान चालीसा धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति का भी हिस्सा है। पर्दे पर कभी यह भय का सामना करने का संबल बनता है, कभी किसी पात्र के साहस को स्वर देता है और कभी दर्शकों को याद दिलाता है कि सिनेमा में किसी धार्मिक रचना का सबसे प्रभावशाली इस्तेमाल वही है, जो कहानी के भाव से सहज रूप से जुड़ जाए।