स्वच्छता के सफर में बदलाव की कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें जानना बेहद ज़रूरी है। ये उन महिलाओं की कहानियां हैं, जो कचरे से रोज़गार पैदा कर रही हैं, अपने समुदायों में साफ-सफाई के कामों की अगुवाई कर रही हैं और रोज़मर्रा की चुनौतियों को अवसरों में बदल रही हैं। उनके साथ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी हैं, जो साफ-सफाई की सेवाओं में पेशेवर भूमिकाएं और पहचान पा रहे हैं।
सामान्यत: गौशालाओं और डेयरियों के आस-पास गाय का गोबर कचरा प्रबंधन की एक बड़ी चुनौती बन जाता है, क्योंकि यह नालियों और सीवेज चैनलों को जाम कर देता है। लेकिन, लोनी की कृष्णा विहार कॉलोनी में महिलाओं के एक समूह ने आगे बढ़ने का एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने गाय के गोबर से अगरबत्ती और लोबान के कप बनाना शुरू किया।
जो काम सिर्फ 8-10 महिलाओं के साथ शुरू हुआ था, वह जल्द ही कई और महिलाओं के लिए रोज़गार का ज़रिया बन गया। लोनी नगर पालिका परिषद की एक महिला अधिकारी ने उनके काम में संभावना देखी और गोबर की लगातार आपूर्ति और इस्तेमाल के लिए बनाने वालों को गौशाला मालिकों से जोड़ने में मदद की। एक साधारण सा विचार आकार लेने लगा कि क्या हो अगर ऐसी चीज़ को, जिसे कचरा समझा जाता है, एक नई ज़िंदगी दे दी जाए?
गर्मियों के महीनों में, जब अगरबत्ती का उत्पादन सबसे ज़्यादा होता है, तो इस पहल से एक इकाई में लगभग 40-50 महिलाओं को रोज़गार मिलता है। इन महिलाओं के लिए, यह काम सिर्फ कोई उत्पाद बनाने से कहीं ज़्यादा है। यह रोज़गार, सम्मान और कचरे को किसी उपयोगी चीज़ में बदलने की संतुष्टि को एक साथ लाता है। नगर पालिका परिषद भी इन उत्पादों की बिक्री से 25 प्रतिशत तक की कमाई करती है। इससे कचरा प्रबंधन, स्थानीय उद्यम और नगरपालिका की कमाई के बीच एक कड़ी बनती है।
इन उत्पादों में ही दोबारा इस्तेमाल की कहानी छिपी है। आम तौर पर, अगरबत्ती जैसे उत्पादों को बनाने के लिए लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल बेस मटीरियल के तौर पर किया जाता है। इसमें लगभग 30-35 प्रतिशत सूखे गोबर का पाउडर मिलाने से लकड़ी के बुरादे की ज़रूरत कम हो जाती है। यह पर्यावरण के लिहाज़ से एक टिकाऊ समाधान बनकर उभरा है, जिससे स्वच्छता भी सुनिश्चित होती है।
जो काम एक कॉलोनी से शुरू हुआ था, वह अब बहुत आगे बढ़ चुका है। ये उत्पाद देश के कई हिस्सों में सप्लाई किए जाते हैं, जिनमें दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात और हैदराबाद शामिल हैं। कोविड के दौरान, बड़े ब्रांड के लिए भी इनका उत्पादन किया गया और इनके ऑर्डर मॉरिशस और दक्षिण अफ्रीका तक पहुंचे।
और, ये महिलाएं यहीं नहीं रुक रही हैं। गोबर से ईंधन के तौर पर जलने वाली लकड़ी बनाने की योजना पर भी काम हो रहा है, जिसका इस्तेमाल श्मशान घाटों, हवन और दूसरे कामों में किया जा सके। इस पहल के तहत गोबर से बने फूलों के गमलों पर भी विचार किया जा रहा है, जो बाद में खाद बनकर मिट्टी में मिल सकते हैं। यहां, स्वच्छता का मतलब सिर्फ कचरा हटाना नहीं है। इसका मतलब यह सोचना भी है कि उस कचरे से और क्या-क्या बनाया जा सकता है।
बिहार के पटना में भी ऐसी ही सोच देखने को मिलती है, जहां महिलाएं पुरानी परंपराओं को तोड़ रही हैं और स्वच्छता को एक नया, समावेशी रूप दे रही हैं। शहर की पिंक मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी में कचरा प्रबंधन की प्रक्रिया में महिलाएं मुख्य भूमिका निभाती हैं। मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा संचालित और एक महिला सुपरवाइज़र के नेतृत्व वाली यह फैसिलिटी सूखे और गीले कचरे को प्रोसेस करती है। यह हर दिन दो टन सूखा कचरा और 1.5 टन गीला कचरा प्रबंधित कर सकती है।
पिंक एमआरएफ का विचार वेस्ट-मैनेजमेंट क्षेत्र में महिलाओं के लिए अवसर बनाने की कोशिश से आया। प्रोजेक्ट टीम ने पिंक एमआरएफ बनाने के विचार के साथ पटना नगर निगम से संपर्क किया। पीएमसी ने इस विचार का समर्थन किया और यह सुविधा सिर्फ तीन महीनों में तैयार हो गई। इसके खास रंग और डिज़ाइन ने स्थानीय लोगों का ध्यान भी खींचा, जिससे इस पहल के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद मिली।
यह विचार 'कैश फॉर वेस्ट' पहल के ज़रिए समुदाय तक पहुंचता है। नागरिक सूखा कचरा ला सकते हैं और तय दरों पर भुगतान पा सकते हैं। कचरे की कीमत बढ़ती है, नागरिकों को भाग लेने के लिए प्रोत्साहन मिलता है और शहर को स्वच्छता के सफर में मदद के लिए और हाथ मिलते हैं।
इसके बाद पटना की स्वच्छता यात्रा एक दिलचस्प मोड़ लेती है। पुरानी, बेकार गाड़ियों को मोबाइल पिंक टॉयलेट के रूप में नई ज़िंदगी दी गई। जो चीज़ कभी कबाड़ थी, वह अब स्वच्छता की एक ज़रूरी ज़रूरत पूरी करती है।
पिंक एमआरएफ और मोबाइल पिंक टॉयलेट मिलकर सामाजिक न्याय, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और आर्थिक अवसर को दर्शाते हैं। सबसे बड़ी बात, वे एक सरल संदेश देते हैं कि जब महिलाओं को स्वच्छता के काम में जगह दी जाती है, तो वे सिर्फ व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनतीं, बल्कि इसे नया रूप देने में मदद करती हैं।
महिलाओं और स्वच्छता की कहानी सिर्फ कचरा संभालने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों तक भी पहुंचती है, जिनसे वे जुड़ी हैं। भोपाल में, 250 महिला ब्रांड एंबेसडर के एक समूह ने नगर निगम के साथ मिलकर सफाई और कचरा प्रबंधन पर काम किया है। इस समूह की सदस्यों ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म करने के लिए 25 वार्डों में 'बर्तन बैंक' भी शुरू किए हैं। सामुदायिक कार्यक्रमों और आयोजनों के लिए दोबारा इस्तेमाल होने वाले बर्तनों के सेट उपलब्ध कराकर, ये बैंक यह सुनिश्चित करते हैं कि स्थानीय कार्यक्रम कचरा पैदा किए बगैर आयोजित हों।
60 सदस्यों वाले 'स्वच्छता किटी ग्रुप' ने एकजुटता को काम में बदलने का एक और तरीका खोजा है। हर महिला हर महीने ₹100 का योगदान देती है, जिससे सामुदायिक सफाई गतिविधियों के लिए एक साझा फंड बनता है। कई लोगों द्वारा किए गए छोटे-छोटे योगदान, एक साफ-सुथरे मोहल्ले के लिए सामूहिक संकल्प बन जाते हैं।
उत्तराखंड में, इस भावना को 'बैनी सेना' यानी 'बहनों की सेना' का नाम दिया गया है। 57 समूहों में बंटी 570 महिलाएं अपने-अपने वार्डों में सफाई गतिविधियों पर नज़र रखती हैं। वे नागरिकों से बातचीत करती हैं, शिकायतों को पहुंचाने में मदद करती हैं, जागरूकता कार्यक्रम चलाती हैं और नगर प्रशासन तथा सफाई कर्मचारियों के बीच तालमेल बिठाने में सहयोग करती हैं। उनका काम वहां होता है, जहां वास्तव में किसी शहर की सफाई तय होती है।
शिलांग में, इन्नेहस्खेम सेल्फ-हेल्प ग्रुप ने कचरे के ज़रिए रोज़ी-रोटी का एक नया ज़रिया खोजा है। ये महिलाएं घरों से गीला कचरा इकट्ठा करती हैं और बायोडिग्रेडेबल कचरे को खाद में बदलती हैं। पहले कचरा बीनने का काम करने वाली इन महिलाओं ने एक पुनर्वास पहल के तहत प्रशिक्षण लिया और खाद बनाने के काम को अपनी आजीविका का साधन बनाया। उनकी एकता की वजह से उन्हें प्यार से 'मेरी मेडन्स ऑफ मार्टन' नाम दिया गया।
अपनी रोज़मर्रा की कोशिशों से, ये महिलाएं स्वच्छता को सिर्फ एक ज़िम्मेदारी के बजाय देखभाल की एक साझा संस्कृति में बदल रही हैं।
ओडिशा में, ट्रांसजेंडर लोग ऐसी भूमिकाएं निभा रहे हैं, जो उन्हें शहरी स्वच्छता व्यवस्था के केंद्र में लाती हैं। यह बदलाव कटक से शुरू हुआ, जहां म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने ट्रांसजेंडर लोगों को एक सेल्फ-हेल्प ग्रुप में संगठित किया। उन्हें प्रशिक्षण दिया गया और सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन और रखरखाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
यह एक बड़ा बदलाव था। एक ऐसा समुदाय जिसे अक्सर औपचारिक अवसरों से दूर रखा जाता था, अब स्वच्छता से जुड़ी एक तकनीकी सुविधा की ज़िम्मेदारी संभाल रहा था। बाद में यह मॉडल पूरे ओडिशा में फैल गया। शहरी स्थानीय निकायों ने मल-कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन और ठोस कचरा प्रबंधन के कामों में स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया।
भुवनेश्वर में, स्वयं सहायता समूह ‘स्वीकृति’ ने बसुआघाई में 75-केएलडी वाले फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट को चलाने और उसकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी ली। अपनी ज़िम्मेदारियां संभालने से पहले सदस्यों को ओरिएंटेशन और तकनीकी तथा प्रबंधन से जुड़ी ट्रेनिंग दी गई।
भुवनेश्वर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने सात सेसपूल वाहनों के संचालन और रखरखाव में भी ट्रांसजेंडर समूहों को शामिल किया है। ड्राइवरों और हेल्पर्स को कम से कम लागू मजदूरी पर काम पर रखा जाएगा। उन्हें स्वास्थ्य, साफ-सफाई, निजी सुरक्षा से जुड़े उपकरण और स्लज हटाने के तरीकों के बारे में प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। ट्रांसजेंडरों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ाने की ओडिशा की इस नई पहल की काफा तारीफ हुई है। इसने दूसरों के लिए भी एक मिसाल कायम की है, जिससे साफ होता है कि कैसे सबकी भागीदारी बेहतर साफ-सफाई का रास्ता बना सकती है।
ये कहानियां दिखाती हैं कि स्वच्छता से न केवल आस-पास का माहौल साफ-सुथरा होता है, बल्कि यह आजीविका, भागीदारी और पहचान के नए रास्ते भी खोल सकती है। असली बदलाव सिर्फ कचरे के निपटान में नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में आने वाले बदलावों में है, जो इसे संभालते हैं। जब समाज में हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों को स्वच्छता अभियान में मुख्य भूमिका मिलती है, तो स्वच्छता का अर्थ और भी गहरा हो जाता है। यह सम्मान, अवसर और अपनेपन की भावना से जुड़ी एक सामूहिक कोशिश बन जाती है।

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