कर्नाटक के आसमान में बादल तो नहीं थे, पर सरकार की तैयारी पूरी थी। एक टीम ने विमान और मौसम विज्ञान की तरफ देखा; दूसरी टीम ने मंदिर, पवित्र अग्नि और मंत्रों की ओर। अजीब! पर दोनों सरकारी जवाब थे।
राज्य ने सूखे से निपटने के लिए 28.52 करोड़ रुपये के आपात क्लाउड-सीडिंग अभियान की घोषणा की। 31 जिलों में से 29 बारिश की कमी से जूझ रहे थे। विमान बादल ढूंढेंगे, वैज्ञानिक हालात पर निगरानी रखेंगे, सैकड़ों उड़ान घंटे तय किए गए।
उसी सुबह कोडागु के पाडी इग्गुथप्पा मंदिर में रुद्र होम होना था; कृषि मंत्री पीएम नरेंद्रस्वामी शामिल होने वाले थे। बताया गया कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह अनुष्ठान रखा गया, उम्मीद यही थी कि देवता कर्नाटक पर मेहरबान होंगे। Read in English: India’s Curious Double Life; Clouds, Computers and the Sacred Fire…
एक तस्वीर की कल्पना कीजिए। एक तरफ वैज्ञानिक क्लाउड-इंजीनियरिंग, दूसरी तरफ हवनों का धुआं; दोनों का मकसद समान है, बारिश। यह भारत की दोहरी ज़िंदगी है। हम रॉकेट बनाते हैं, पर अहम काम से पहले मुहूर्त पूछते हैं। उपग्रह भेजते हैं, पर नए व्यापार के लिए सितारों की सलाह लेते हैं। हम दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करते हैं, पर कई बार दफ्तरों का नक्शा वास्तु और अंकशास्त्र तय करते हैं। विज्ञान और अंधविश्वास यहां सिर्फ पड़ोसी नहीं, कभी-कभी वे एक ही बेडरूम शेयर करते हैं।
इसरो की सफलताएं और वैज्ञानिक क्षमता बहुमूल्य हैं। फिर भी बड़े कार्यक्रमों से पहले “मुहूर्त शुभ है या नहीं” जैसे सवाल उठते हैं। गणित रॉकेट को चलाता है; इंसान अक्सर ग्रह-नक्षत्रों पर भरोसा कर लेता है।
यह विरोधाभास शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में भी दिखता है। हमारे पास विश्वस्तरीय मेडिकल संस्थान हैं, पर डिजिटल बाजार पर वही फोन चमत्कारी दवाइयां, कुंडली-वाले ऐप और तांत्रिक इलाज भी बेचते हैं। इतिहास पर गर्व करना ठीक है, लेकिन पुरानी कथाओं से आधुनिक आविष्कार निकालना सबूत नहीं है।
पर्यावरण की भी यही कहानी है। वैज्ञानिक नदियों की सफाई, जलवायु परिवर्तन और भूजल घटने की चेतावनी दे रहे हैं; अदालतें आदेश दे रही हैं; पर त्यौहारों में टनों सामग्री उन्हीं नदियों में विसर्जित कर दी जाती है। आस्था कहती है नदी पवित्र है; नदी के पास पीआर टीम नहीं है, वह कचरा ढोती आगे बढ़ जाती है।
हमारा संविधान वैज्ञानिक सोच की बात करता है, पर सामाजिक फैसलों में जाति, कुंडली और परंपरा का प्रभाव आज भी दिखता है। एक हाथ में आधुनिक डिग्री हो सकती है; दूसरे हाथ में जन्मपत्री मजबूती से थमी रहती है।
कर्नाटक का मामला इसलिए आंख खोलने वाला है क्योंकि विज्ञान और आस्था एक साथ सामने आए। क्लाउड-सीडिंग कोई जादू नहीं; यह सही परिस्थितियों पर निर्भर एक तकनीक है। रुद्र होम आस्था और परंपरा का मामला है। प्रार्थना उम्मीद देती है; पर उम्मीद हाइड्रोलॉजी की जगह नहीं ले सकती है। हवन सूखी नहर की मरम्मत नहीं कर सकता; मंत्र खाली जलाशय भर नहीं देते।
प्राचीन ज्ञान का अध्ययन ज़रूरी है; पर पुराने किस्सों को साक्ष्य मान लेना खतरे की घंटी है। अखबार हो या टीवी, डिजिटल मीडिया, ज्योतिषियों की भरमार है। तमाम लोग राशिफल पढ़कर ही दिन शुरू करते हैं। सुबह प्रार्थना कीजिए; दोपहर तक जलाशय बना लीजिए। यही मिश्रित तर्कहीनता से निकलने की असली चुनौती है।
भारत ज्ञान, तकनीक और नेतृत्व बनने का सपना देखता है। सपने अच्छे हैं। पर पहले फर्क सीखिए। ज्ञान और विश्वास, सबूत और भावना, शोध और आत्म–प्रशंसा के बीच। वरना हम दो दुनियाओं में यूं ही जीते रहेंगे: एक हाथ उपग्रह छोड़ेगा, दूसरा शुभ मुहूर्त खोजेगा; एक विमान बादल में बीज डालेगा, दूसरा सरकारी दल पवित्र अग्नि में आहुति देगा, और विरोधाभास धुएं और बादलों के बीच नाचता रहेगा।

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