भारतीय इतिहास में संत सुधारकों ने गहन और जटिल आध्यात्मिक ज्ञान को जनसाधारण की भाषा में अनुवादित कर जनसंचार का एक अनोखा माध्यम विकसित किया। यह प्रक्रिया न केवल ज्ञान को सुलभ बनाती थी, बल्कि उसे लोकप्रिय बनाकर समाज में गहराई से स्थापित करती थी।
उदाहरणस्वरूप, तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण की संस्कृत-आधारित जटिल कथा को अवधी भाषा में रामचरितमानस के रूप में सरल छंदों, दोहों और चौपाइयों के माध्यम से प्रस्तुत किया। इससे रामकथा घर-घर पहुंची, भक्ति भावना का प्रसार हुआ और लाखों अनपढ़ों ने आध्यात्मिकता को आत्मसात किया। देश के विभिन्न भागों में संतों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
अंग्रेजी में पढ़ें : Saint tradition that wove India into one soul…
कबीर ने दोहों में ब्रह्म ज्ञान को सरल भाषा में बुनकर जाति-धर्म की दीवारें तोड़ीं। सूरदास ने कृष्ण भक्ति को पदों और गीतों से जीवंत बनाया, जबकि मीरा बाई के भजन भावनात्मक सरलता से स्त्री-मुक्ति का संदेश देते हैं। रैदास, और नामदेव जैसे संतों ने लोकभाषा में गीत रचे, जो मौखिक परंपरा से फैले।
इसी प्रकार, मौजूदा दौर में, बाबा रामदेव ने पतंजलि के योगसूत्रों की प्राचीन, गूढ़ विद्या को सरल व्यायाम और जीवनशैली के रूप में परिवर्तित कर एक जनआंदोलन बना दिया। आज योग लाखों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा है, जो पहले केवल विद्वानों तक सीमित था। यह संत साहित्य परंपरा जनसंचार का जीवंत उदाहरण है, जहां गूढ़ दर्शन को काव्य, संगीत और कथाओं से जोड़कर समाज को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया गया।
भारत की सांस्कृतिक यात्रा में सदियों से यह परंपरा बहती आई है, जिसने जितना समाज को बदला, उतना ही दिलों को जोड़ा। संत साहित्य की इस परंपरा, एक ऐसी जीवित विरासत, जिसे सुधारवादी संतों ने अपनी लोकप्रिय भाषाओं, गीतों, पदों और दोहों में पिरोकर आम जनता के लिए उपलब्ध कराया है। पूरे देश में फैली इस धारा का सार एक ही पंक्ति में समाया है, “वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे।” यानी सच्चा इंसान वही है जो दूसरे की पीड़ा को अपना दर्द समझे। संत नरसिंह मेहता का यह भजन न केवल भक्ति का सार है, बल्कि भारत के संतों की जीवन-दृष्टि का सबसे परिष्कृत रूप भी है।
पिछले हजार वर्षों में संतों की यह परंपरा भारत के उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम सभी हिस्सों में फली-फूली। ज्ञान, भक्ति और करुणा का यह प्रवाह किसी एक वर्ग, जाति या भाषा तक सीमित नहीं रहा। ज्ञानेश्वर, चैतन्य, कबीर, गुरु नानक, रैदास, तुकाराम, नामदेव, सूरदास, नरसिंह मेहता, इन सबने भक्ति को मंदिरों और ग्रंथों से निकालकर मनुष्य के हृदय तक पहुंचाया। संत ज्ञानेश्वर की ‘ज्ञानेश्वरी’ वह ऐतिहासिक मोड़ थी जब भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान पहली बार सरल मराठी में आम लोगों तक पहुंचा। वही क्षण था जब भक्ति सचमुच गांव-गांव में फैलने लगी और लोग समझने लगे कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए संस्कृत, कर्मकांड या ऊंची जाति की जरूरत नहीं, सिर्फ मन की सच्चाई चाहिए।
भारतीय संत परंपरा दो अलग-अलग लेकिन पूरक मार्गों में विकसित हुई। एक ओर आचार्य परंपरा थी, जो संस्कृत और शास्त्रीय विमर्श पर आधारित थी; दूसरी ओर संत-कवि परंपरा, जो लोकभाषाओं में सरल गीतों और पदों के माध्यम से सीधे जनता के दिल तक पहुंचती थी। समाज को बराबरी, करुणा और भेदभाव से मुक्ति का संदेश मुख्यतः संत-कवियों ने दिया, क्योंकि वे स्वयं जनता की मिट्टी से पैदा हुए थे, कोई जुलाहा, कोई लोहार, कोई साधारण किसान, कोई स्त्री, कोई दलित। उन्होंने कठिन दार्शनिक भाषा को छोड़कर अपनी मातृभाषाओं में वह साहित्य रचा, जिसमें जनता का दर्द भी था और उसकी आशा भी।
भक्ति का पहला बड़ा प्रवाह दक्षिण में उठा। तमिलनाडु में अलवार और नयनार संतों ने दिव्य प्रेम को व्यक्तिगत अनुभूति से जोड़कर लोकभाषा में उतारा। ‘दिव्य प्रबंधम’ और ‘तेवरम’ के भजनों ने जाति-व्यवस्था को चुनौती दी और भक्ति को नया मानवीय स्वर दिया। केरल में भट्टथिरी के ‘नारायणीयम’ ने कला, दर्शन और भक्तिरस को एक सूत्र में बांधा। आंध्र के अन्नमाचार्य के हजारों कीर्तन आज भी तिरुपति में गूंजते हैं, जिनमें नैतिकता, समर्पण और समानता की सीख मिलती है।
परंतु, सबसे विशाल जन-लहर महाराष्ट्र में उठी। वारकरी परंपरा के ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम ने भक्ति को गांव के लोगों की भाषा में ढाला। नामदेव पूरे भारत में घूमते हुए बराबरी का संदेश फैलाते रहे। एकनाथ ने रामायण जैसे ग्रंथों को लोकभाषा में उतारा। तुकाराम ने पाखंड और दिखावे पर तीखी चोट कर करुणा और मानवता को भक्ति का केंद्र बनाया। उनका भावपूर्ण संदेश “जे का रंजले गांजले, त्यासी म्हणे जो आपुले…” आज भी बताता है कि सच्ची साधुता वही है जो पीड़ितों को अपनाती है। इस परंपरा ने भक्ति को सामूहिक अनुष्ठान बनाया, वारी की पदयात्राएं आज भी समाज को जोड़ने की जिंदा मिसाल हैं।
पूर्व भारत में जयदेव का ‘गीत गोविंद’ संगीत, नृत्य और अध्यात्म की त्रिवेणी है, जिसने ओडिशा से लेकर राजस्थान तक एक सांस्कृतिक पुल बनाया। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु ने नाम-संकीर्तन को सामूहिक उत्सव का रूप देकर जाति और धर्म की दीवारें गिरा दीं। असम में शंकरदेव ने एकेश्वरवाद पर फोकस्ड धर्म का प्रसार किया, जिसमें सभी समान थे और किसी प्रकार का सामाजिक भेद स्वीकार नहीं था।
उत्तर भारत में भक्ति ने एक निर्भीक, मानवीय और कभी-कभी विद्रोही रूप लिया। कबीर ने मंदिर-मस्जिद की बहस से ऊपर उठकर मन की शुद्धता को प्रमाण माना और कहा, “बुरा जो देखन मैं चला…”, पहले अपने मन को देखो, फिर दुनिया को सुधारो। गुरु नानक ने पूरे संसार को एक मानव परिवार माना और गुरबाणी में स्पष्ट कहा कि “एक नूर ते सब जग उपजिया, कौन भले को मंदे”, यही विचार भारत की सांस्कृतिक एकता का आधार बना।
रैदास ने दलित समाज को सम्मान और आत्मविश्वास की नई पहचान दी, उनका दोहा “जाति-पाति पूछे न काई…” सदियों से सामाजिक सुधार का सबसे मजबूत आधार है। मीरा बाई, और सूरदास ने बाल-लीला के माध्यम से निष्कपट भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया, जबकि गुजरात के नरसिंह मेहता ने प्रेम और करुणा को भक्ति की धड़कन बनाया। उनका “वैष्णव जन” आज भी भारत की मानवतावादी विरासत का वैश्विक प्रतीक है।
भारत की संत परंपरा सिर्फ धार्मिक उपदेशों का संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सबसे शक्तिशाली धारा है। इन संतों ने जाति, पंथ, भाषा, लिंग और क्षेत्रीयता, सभी भेद मिटाकर यह सिखाया कि भक्ति का केंद्र ईश्वर नहीं, इंसान का दिल है। उनकी वाणी ने गरीब, दलित, स्त्री, किसान और समाज के अंतिम व्यक्ति को सम्मान दिया। उन्होंने भक्ति को सत्ता या संस्थानों के बजाय जनता के हाथ में सौंपा।
आज जब समाज छोटे-छोटे खांचों में बंटता जा रहा है, तब संत साहित्य का यह संदेश पहले से अधिक जरूरी हो गया है। जरूरत है कि इस धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, डिजिटलीकरण, पाठ्यक्रमों में स्थान, साहित्य महोत्सव, राज्यों के बीच सांस्कृतिक संवाद और संतों की यात्राओं एवं मार्गों के संरक्षण के माध्यम से। यह सिर्फ संस्कृति का संरक्षण नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को बचाए रखने का कार्य है।
सदियों पुरानी इस परंपरा का सार यही है कि भारत एक मिट्टी या भाषा का देश नहीं, बल्कि एक भावना है। और उस भावना का नाम है, भाईचारा, करुणा, प्रेम और मानवता। संत साहित्य हमें याद दिलाता है कि दूसरों के दुख को अपना समझने वाला ही सच्चा ‘वैष्णव जन’ है। यही भक्ति का मार्ग है, यही भारत की आत्मा, और यही हमारे भविष्य का सबसे मजबूती से पकड़ने योग्य सूत्र।






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