सावित्री देवी को वह शाम आज भी याद है जब उनकी बेटी ने किताब पढ़ते समय आंखें सिकोड़ना बंद कर दिया था। उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में वर्षों तक बारह साल की प्रिया मिट्टी के तेल की ढिबरी के सामने बैठकर पढ़ती थी। पीली, कांपती हुई लौ। धुएं से भरा कमरा। आंखों में जलन। कई बार तेल खत्म हो जाता है और पढ़ाई भी। फिर, पिछले साल उनकी छत पर एक सौर पैनल लग गया।
"पहली रात वह बल्ब को ही देखती रह गई," सावित्री हंसते हुए बताती हैं। "उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि रोशनी यूं ही बनी रहेगी।" रोशनी बनी रही। आज प्रिया अपनी कक्षा में अव्वल आई है और डॉक्टर बनने का सपना देख रही है।
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यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां कभी अंधेरा ही उसकी पहचान थी और अब उजाला बदलाव का प्रतीक बन रहा है। हिमालय की दुर्गम घाटियों से लेकर राजस्थान के तपते रेगिस्तान तक, गांवों की तस्वीर बदल रही है। छतों पर चमकते हुए सौर पैनल दिखाई देते हैं। पंचायत भवनों के बाहर सौर लाइटें जगमगाती हैं। स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, आंगनबाड़ी और सामुदायिक भवन सौर ऊर्जा से रोशन हो रहे हैं। घरों में इन्वर्टर, बैटरियां और सोलर लैम्प आम होते जा रहे हैं। जहां कभी शाम ढलते ही जिंदगी ठहर जाती थी, वहां अब रात भी काम और पढ़ाई का समय बन रही है।
कर्नाटक के नांजानगुड़ कस्बे के पास एक गांव में मीरा नाम की दर्जिन पहले सूर्यास्त के साथ अपना काम समेट देती थीं। बिजली का कोई भरोसा नहीं था। कभी आती, कभी नहीं। कई बार वोल्टेज इतना तेज होता कि मशीन खराब हो जाती। फिर सरकारी योजना के तहत उन्हें सोलर इन्वर्टर और बैटरी सिस्टम मिला। अब वह रात नौ-दस बजे तक सिलाई करती हैं। उनकी आमदनी लगभग दोगुनी हो गई है। उन्होंने अपनी भतीजी को भी काम पर रख लिया है। वह मुस्कुराकर कहती हैं, "पहले मैं सूरज के पीछे भागती थी, अब सूरज मेरे लिए काम करता है।" यह एक साधारण-सा मजाक है, लेकिन इसके पीछे भारत की बड़ी ऊर्जा कहानी छिपी है।
दशकों तक भारत की अर्थव्यवस्था आयातित तेल और गैस पर निर्भर रही। आज भी देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। दुनिया में कहीं युद्ध छिड़े या तेल उत्पादक देशों में संकट आए, असर भारत के पेट्रोल पंपों और रसोईघरों तक पहुंच जाता है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक गुजरात के कच्छ के रण में दिखाई देता है। जहां कभी केवल नमक, रेत और वीरानी थी, वहां आज दुनिया की सबसे बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में से एक आकार ले रही है। लगभग 72,600 हेक्टेयर में फैला खावड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क भविष्य में 30 गीगावाट बिजली उत्पादन करने की क्षमता रखेगा। यह इतनी बिजली होगी कि लगभग डेढ़ से दो करोड़ घर रोशन हो सकें।
सौर पैनलों की अंतहीन कतारें। दूर-दूर तक घूमती पवन चक्कियां। और, उनके बीच बहती रेगिस्तानी हवा। एक इंजीनियर ने वहां काम करते हुए कहा था, "ऐसा लगता है जैसे भविष्य यहां बाकी दुनिया से पहले आ गया हो।" लेकिन, इस क्रांति का असली अर्थ उन लोगों की जिंदगी में दिखाई देता है जिनके लिए बिजली कभी एक विलासिता थी।
बिहार के किसान मिथलेश की समस्या रोशनी नहीं, पानी थी। डीजल पंप चलाने में खर्च बहुत आता था। कभी सिंचाई करते, कभी खर्च बचाते। दोनों साथ संभव नहीं थे। सरकारी सहायता से उन्होंने अपने खेत में सोलर पंप लगवाया।
आज उनकी सिंचाई लगभग मुफ्त है। इस वर्ष उन्होंने दूसरी फसल भी उगाई है। हरे-भरे खेत को देखते हुए वह कहते हैं, "मुझे लगा था यह भी किसी सरकारी वादे जैसा होगा। लेकिन, यह चल रहा है, और अच्छी तरह चल रहा है।"
देशभर में ऐसी लाखों कहानियां जन्म ले रही हैं। आंध्र के रमेश रेड्डी जो एक इंजीनियर हैं, कहते हैं, "लद्दाख में विशाल सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं विकसित हो रही हैं। राजस्थान अपनी सौर क्षमता बढ़ा रहा है। तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क बन रहे हैं। गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री तटों पर अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं की तैयारी चल रही है।"
ऊर्जा विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत अब हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी बड़ा दांव लगा रहा है। 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। रिलायंस, अडानी, एनटीपीसी और ओएनजीसी जैसी कंपनियां इस दिशा में भारी निवेश कर रही हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 190 गीगावाट से आगे निकल चुकी है। पीएम सूर्य घर और पीएम-कुसुम जैसी योजनाएं लाखों परिवारों और किसानों तक सौर ऊर्जा पहुंचा रही हैं। चुनौतियां अभी भी हैं। भंडारण तकनीक महंगी है। कई क्षेत्रों में बिजली ग्रिड कमजोर है। हर गांव तक चौबीसों घंटे भरोसेमंद बिजली पहुंचाने का सफर अभी अधूरा है। लेकिन, बदलाव शुरू हो चुका है।
दूरस्थ स्वास्थ्य केंद्रों में अब टीके सुरक्षित रखे जा सकते हैं। दुकानदार देर तक दुकानें खोलते हैं। बच्चे रात में पढ़ते हैं। महिलाएं अतिरिक्त काम कर आय बढ़ा रही हैं। किसान कम लागत में अधिक उत्पादन कर रहे हैं।
और उत्तराखंड की वह लड़की, प्रिया? वह अब रात के खाने के बाद पढ़ती है। एक ऐसे बल्ब की रोशनी में जो कांपता नहीं। जो बुझता नहीं। जो हर शाम उसे यह भरोसा देता है कि उसके सपनों का रास्ता अब अंधेरे में नहीं खोएगा।
भारत की सौर क्रांति की असली कहानी शायद गीगावाट, निवेश और सरकारी योजनाओं में नहीं छिपी है। वह उस स्थिर रोशनी में दिखाई देती है जो पहली बार करोड़ों लोगों के घरों, खेतों और सपनों में टिक गई है।

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