जब इकबाल ने मौलवी को किया पानी-पानी


शायर इकबाल अपनी जिन्दगी में एक बहुत ही खुशमिजाज और जिंदादिल इनसान थे। हर महफिल में उनकी वाकपटुता और शायरी रंग ला देती थी।

एक बार उनसे मिलने एक मौलवी साहब पधारे। बातों के सिलसिले में संगीत की चर्चा छिड़ गई। वह हजरत औरतों के गाना गाने का बड़ा जबरदस्त विरोध कर रहे थे। कहने लगे कि औरतों का गाना सुनने से भावनाएं उत्तेजित हो जाती हैं। इतना ही नहीं, उनका चेहरा और हाव-भाव देखकर कामुकता तीव्र हो उठती है, मन काबू में नहीं रह जाता है।

इकबाल ने त्वरित जवाब देते हुए कहा कि ऐसी महफिलों में तब आप आंखों पर पट्टी बांधकर और लंगोट कसकर जाया कीजिए। ऐसी हालत में सिर्फ आपके कान खुले रहेंगे। इस तरह आप गाने का मजा भी ले सकेंगे और अपने चाल-चलन पर काबू भी कर सकेंगे।

मौलवी साहब शर्म से पानी-पानी होकर लौट गए।

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मशहूर उर्दू शायर इकबाल गजब की शायरी तो करते ही थे साथ ही वह आम खाने के भी बड़े शौकीन थे। अक्सर उनके जिगरी दोस्त और चाहने वाले उन्हें अपने यहां से अच्छे-अच्छे आमों का पार्सल भेजा करते थे।

एक किसी मुशायरे के सिलसिले में जब वह लाहौर गए हुए थे तो उन्हें प्रसिद्ध शायर और व्यंग्यकार अकबर इलाहाबादी का भेजा हुआ बनारस के लंगड़ा आमों का एक पार्सल मिला।

इकबाल को उन्हें आमों के पार्सल के लिए शुक्रिया करना था तो उन्होंने किया और वह भी एक मजेदार शेर के रूप में। आप भी उस शेर को मुलाहिजा फरमाइए। शेर कुछ उस प्रकार था-

तेरे फैज मसीहाई का है, यह सब असर अकबर

इलाहाबाद से लंगड़ा चला और लाहौर तक पहुंचा।

एक शायर को दूसरे शायर की ओर से इससे बढ़िया शुक्रिया कहने का तरीका और क्या हो सकता था।






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