सिर्फ आंकड़ों, डेटा और तुलनात्मक विश्लेषणों से अगर नरेंद्र मोदी सरकार का मूल्यांकन किया जाए तो पिछले 11 वर्ष भारत की विकास यात्रा के इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। हजारों वर्षों में ऐसी कोई राजनैतिक व्यवस्था नहीं आई जिसने इतनी बड़ी आबादी को जीने की उम्मीद दी, सहारा दिया और मुख्यधारा से जुड़ने के अवसर दिए।
... लेकिन, रुको जरा, करोड़ों लोगों को गरीबी की कलंक रेखा से बाहर निकाला। जन धन, आवास, उज्ज्वला और आयुष्मान जैसी जन-केंद्रित योजनाओं ने करोड़ों को गरीबी के कलंक से मुक्ति दिलाकर मुख्यधारा में जोड़ा।
Read in English: The journey stretches long, and the diversions are many...
इधर, सिक्के का दूसरा पहलू भी है, इस चकाचौंध के पीछे अंधेरे की दास्तां भी है...! आज बाकी शहरों को छोड़ो, राजधानी दिल्ली सांस लेने को मजबूर है। आसमान जहरीले धुएं की चादर ओढ़े है, यमुना नदी नाले में तब्दील हो चुकी है, सड़कों पर हर रोज़ मौत का मंजर है, और इंसाफ़ का निज़ाम मज़ाक बन गया है। अक्टूबर तक देश की राजधानी और मुल्क दोनों का हाल यह है कि पर्यावरण बर्बाद, शहर बेहाल, जुर्म बढ़ते हुए और संस्थाएं लाचार। यह वही पुराना भारत है, ज़हरीली हवा, टूटी-फूटी सड़कें, सालों तक खिंचते मुकदमे, बस नए पैकेज में सजाकर दुनिया के सामने रख दिया गया है।
दिल्ली की हवा भाजपा सरकार की नाकामी की सबसे बड़ी गवाह है। मई महीने में दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स 500 के पार चला गया, इतिहास में पहली बार...। यह ‘गंभीर प्लस’ कैटेगरी है, जहां हर सांस लेना जानलेवा है। पहले मई का औसत कभी 243 से ऊपर नहीं गया था।
नतीजा, दिल्ली में हर साल लगभग 17 हजार लोगों की मौत सिर्फ़ हवा के ज़हर से हो रही है। यमुना, जिसे कभी जीवनरेखा कहा जाता था, अब गटर बन चुकी है। 32 साल और आठ हजार करोड़ रुपये झोंकने के बाद भी हाल यह है कि इस साल अब तक सीपीसीबी के 33 मॉनिटरिंग पॉइंट में से 23 पानी की बुनियादी कसौटी पर भी नाकाम। यमुना अब ‘मृत नदी’ है, जिसमें मछलियां तक ज़िंदा नहीं रह सकतीं। गंगा के नाम पर भी यही फसाना है। साल 2015 में धूमधाम से शुरू हुई ‘नमामि गंगे’ योजना पर हज़ारों करोड़ खर्च हुए, लेकिन कैग और संसदीय रिपोर्टों ने साफ़ लिखा कि पानी की गुणवत्ता में ‘ना के बराबर’ सुधार है।
इस साल अप्रैल में द्वारका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी के अंदर सैकड़ों पेड़ ग़ैर-कानूनी तौर पर काट दिए गए। कुछ ही हफ्तों बाद दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के लिए 7,500 पेड़ उखाड़ दिए गए, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने रोक के आदेश दिए थे। हर कटे पेड़ के साथ दिल्ली-एनसीआर का ‘ग्रीन लंग’ और कमजोर होता जा रहा है।
शोर-शराबा भी कम कहर नहीं ढा रहा। दिल्ली की सड़कों पर इस साल अप्रैल तक डेढ़ करोड़ गाड़ियां दौड़ रही थीं। ट्रैफ़िक जाम, बस स्टॉप पर अतिक्रमण, और बिना सोच-समझ के बनाई गई फ्लाईओवर योजनाएं शहर को जिंदा नर्क बना चुकी हैं।
नतीजा, भारत अब ‘रोड डेथ कैपिटल’ बन गया है। साल 2023 में 4.8 लाख सड़क हादसों में 1.72 लाख लोगों की जान गई। साल 2024 में यह संख्या 1.80 लाख के करीब पहुंच गई, मतलब हर तीन मिनट में एक मौत। बीते जुलाई में सरकार ने 24,000 करोड़ रुपये के फ़्लाईओवर और सुरंगों की योजना पास की, लेकिन यह असल बीमारियों पर पट्टी बांधने जैसा है।
साल 2015 में शुरू हुई स्मार्ट सिटी योजना को इस साल तक ‘मॉडल अर्बन इंडिया’ बनाना था। लेकिन, 100 शहरों में से सिर्फ़ 18 ही प्रोजेक्ट पूरे हो पाए। कैग की रिपोर्ट में धांधली, देरी और फंड की बर्बादी की बातें दर्ज हैं। नतीजा, बारिश में डूबते महानगर, कूड़े के पहाड़ और बजबजाते नाले। सड़कों पर चलना भी अब ख़तरे से खाली नहीं।
एनसीआरबी के मुताबिक 2023 में 62.4 लाख अपराध दर्ज हुए—2022 से 7.2 फीसदी ज़्यादा। मतलब हर पांच सेकंड में एक जुर्म। साइबरक्राइम 31 फीसदी बढ़ा, बच्चों के खिलाफ़ अपराध 9.2 फीसदी। साल 2025 तक रेप और किडनैपिंग के केस पहले से ज्यादा बढ़ गए।
पुलिस वही पुरानी, ज़ालिम और जर्जर। नागरिकों का भरोसा टूट चुका है। उधर, अदालतें भी थकी और बेजान। पांच करोड़ से ज़्यादा मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से एक-तिहाई 30 साल से अटके हुए हैं।
‘आयुष्मान भारत’ योजना को दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ स्कीम कहा गया था। लेकिन, 2025 में ही 3,104 नकली या घटिया दवाइयां बाज़ार में पकड़ी गईं। अस्पतालों में लूट, धोखाधड़ी और मरीजों की उपेक्षा आम है।
तालीम का हाल और बदतर। सरकारी स्कूल खाली हो रहे हैं और बच्चे प्राइवेट ‘फैक्ट्री स्कूलों’ में धकेले जा रहे हैं। 2025 तक इनकी फीस 169 फीसदी बढ़ गई। पाठ्यक्रम पुराने, अध्यापक कम, और भाषा की सियासत ने शिक्षा को विभाजन का औज़ार बना दिया है।
आख़िरकार भाजपा वही कर रही है जो कभी कांग्रेस करती थी। दल-बदलुओं का स्वागत, विरोधियों से हाथ मिलाना, और सत्ता के लिए सिद्धांतों की कुर्बानी। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा के 441 उम्मीदवारों में से लगभग एक चौथाई दल-बदलू थे, 110 सीधे कांग्रेस से आए। भ्रष्टाचार और अवसरवाद की यह ‘रिवॉल्विंग डोर’ पॉलिटिक्स जनता को छोड़ कर सिर्फ़ हमारे राज नेताओं को फायदा देती है?






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