यदि नाना पाटेकर को सही में समझना हो तो शायद उनके पुरस्कारों, फिल्मों और यादगार संवादों की सूची से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। उन्हें समझने का बेहतर रास्ता उनके जीवन को देखने से निकलता है। एक ऐसा जीवन जिसमें गरीबी, संघर्ष, रंगमंच, अभिनय, प्रसिद्धि, सेना के साथ बिताए दिन, किसानों के लिए काम, कविता, हास्य, सादगी और विवाद, सब एक साथ दिखाई देते हैं। इन सबके बीच एक बात लगातार यह उभरती है कि उन्होंने अपने जीवन को किसी एक तय खांचे में नहीं जिया। जब उन्हें लगा कि कुछ करना चाहिए, उन्होंने किया; कई बार वह काम उनकी सार्वजनिक छवि से बिल्कुल अलग था।
महाराष्ट्र में रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में जन्मे, विश्वनाथ पाटेकर, यानी नाना पाटेकर, का बचपन आर्थिक रूप से सहज नहीं था। पिता गजानन पाटेकर कपड़े के कारोबार से जुड़े थे। कारोबार में एक बड़े नुकसान के बाद परिवार को कठिन दौर से गुजरना पड़ा। उस समय नाना लगभग 13 साल के थे। पढ़ाई के साथ परिवार की मदद के लिए उन्होंने फिल्मी पोस्टर रंगने का काम किया। स्कूल के बाद वह कई किलोमीटर पैदल जाकर पोस्टर बनाते थे और बदले में मामूली रकम तथा एक वक्त का भोजन पाते थे। जीवन का यह शुरुआती अनुभव आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की कठोरता और संवेदनशीलता, दोनों का आधार बना।
कला की ओर उनका झुकाव बचपन से था। मुंबई के सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाई के दौरान रंगमंच के प्रति उनकी रुचि बनी। मंच ने उन्हें केवल अभिनय का अवसर नहीं दिया, बल्कि भीतर की बेचैनी को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी दिया। स्मिता पाटिल से उनकी मित्रता और प्रोत्साहन ने भी उनके फिल्मी सफर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कला फिल्मों और रंगमंच की दुनिया में रमे हुए नाना को साल 1984 में आई फिल्म 'आज की आवाज' के लिए स्मिता पाटिल ही खींच-खांच कर बीआर चोपड़ा के पास लेकर गईं थी। अभिनय उनके लिए केवल रोजी-रोटी या प्रसिद्धि पाने का साधन नहीं रहा बल्कि वह धीरे-धीरे उनके अनुभवों को व्यक्त करने की भाषा बन गया।
साल 1978 में 'गमन' से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। शुरुआती दौर आसान नहीं था। वह पहचान तुरंत नहीं मिली जिसकी तलाश हर अभिनेता करता है। लेकिन, रंगमंच की साधना और जीवन के अनुभव उनके साथ थे। 'अंकुश', 'प्रतिघात', 'त्रिशाग्नि' और 'सलाम बॉम्बे!' जैसी फिल्मों ने धीरे-धीरे उनके लिए रास्ता बनाया। साल 1989 में 'परिंदा' ने उनके करियर को निर्णायक मोड़ दिया। इसमें उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा में एक ऐसी आवाज बन गए जिसे सुनते ही पर्दे पर किसी साधारण पात्र के आने की उम्मीद नहीं रहती थी।
'अंगार', 'तिरंगा' और फिर 'क्रांतिवीर' ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग सामने रखे। 'क्रांतिवीर' में उनका आक्रोश केवल संवाद नहीं था बल्कि वह सामाजिक व्यवस्था से असंतुष्ट एक व्यक्ति की बेचैनी बन गया। इस भूमिका के लिए भी उन्हें 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेता' का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 'अग्निसाक्षी' के लिए उन्हें फिर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। एक ओर वह हिंसक और कठोर पात्रों को विश्वसनीय बनाते थे, तो दूसरी ओर 'खामोशी : द म्यूजिकल' जैसी फिल्म में भावनाओं की महीन परतों को भी सहजता से निभाते थे। अपनी आवाज के जरिए फिल्मों में एक विशिष्ट स्थान बनाने वाला अभिनेता इस फिल्म में बोल नही सकता था।
नाना के अभिनय की खासियत यह थी कि वह किरदार को इतना भीतर तक पकड़ लेते थे कि 'नाना' दूर कहीं पीछे छूट जाता था। उनकी आवाज, विराम, चेहरे का तनाव, आंखों का इस्तेमाल और संवाद बोलने की असामान्य लय उन्हें अपने समकालीन अभिनेताओं से अलग करती रही।
'वजूद' का वह प्रसंग उनके अभिनय के एक बेहद संवेदनशील पक्ष को सामने लाता है। फिल्म में जावेद अख्तर की लिखी कविता 'कैसे बताऊं मैं तुम्हें...' को उन्होंने माधुरी दीक्षित के सामने जिस तरह प्रस्तुत किया, वह आज भी उनके यादगार फिल्मी क्षणों में गिना जाता है। कविता में प्रेम की बेचैनी थी, लेकिन नाना की प्रस्तुति में वह एक ऐसे व्यक्ति की आंतरिक व्यथा बन गई जो अपने मन की बात कहने के लिए शब्दों का सहारा ले रहा है। वर्षों बाद 'कौन बनेगा करोड़पति' में अमिताभ बच्चन के सामने भी नाना ने यही कविता सुनाई और बताया कि इतने समय बाद भी वह उन्हें पूरी तरह याद है। कुछ रचनाएं शायद इसी तरह अभिनेता के पेशे से निकलकर उसके निजी अनुभव का हिस्सा बन जाती हैं।
नाना का एक दूसरा चेहरा निर्देशक का भी है। साल 1991 में उन्होंने 'प्रहार : द फाइनल अटैक' का निर्देशन किया। फिल्म की तैयारी के दौरान उन्होंने सेना के साथ प्रशिक्षण लिया। सैन्य जीवन को करीब से समझने का यह अनुभव आगे चलकर उनके जीवन में एक असाधारण मोड़ लेकर आया।
साल 1999 में जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, तब नाना ने केवल दूर बैठकर सैनिकों के लिए सहानुभूति जताने या आर्थिक सहायता देने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क कर युद्ध क्षेत्र में जाने की इच्छा जताई। उन्हें शुरू में बताया गया कि एक नागरिक को इस तरह युद्ध क्षेत्र में शामिल नहीं किया जा सकता। तब उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से संपर्क किया। नाना ने उन्हें बताया कि 'प्रहार' की तैयारी के दौरान उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ लगभग तीन वर्ष का सैन्य प्रशिक्षण लिया था, कमांडो प्रशिक्षण किया था और वह राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज भी रह चुके हैं। पहले रक्षा मंत्री ने भी इस आग्रह को सहजता से स्वीकार नहीं किया, लेकिन नाना अपने आग्रह पर कायम रहे। अंततः उन्हें विशेष अनुमति मिली और वह सैनिकों के साथ कारगिल क्षेत्र में पहुंचे। वह लगभग 60 दिन सेना के साथ रहे और क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा भी बने।
इस घटना को नाना पाटेकर के जीवन में इसलिए अलग महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि उनके सामने सहायता करने के कई दूसरे रास्ते भी थे। एक सफल अभिनेता के लिए आर्थिक सहयोग देना अपेक्षाकृत आसान विकल्प था। वह एक बड़ी रकम सेना या सैनिक कल्याण से जुड़े किसी कोष में दे सकते थे और अपनी जिम्मेदारी पूरी मान सकते थे। लेकिन, नाना ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने अपनी सुविधा, फिल्मों की व्यस्तता और लोकप्रियता की सुरक्षा से बाहर निकलकर सैनिकों के बीच जाने को प्राथमिकता दी। उनके लिए यह केवल किसी संस्था को पैसा देने का प्रश्न नहीं था बल्कि वह स्वयं उस वातावरण को देखना और उन लोगों के साथ खड़ा होना चाहते थे जो वास्तविक युद्ध लड़ रहे थे। यही मानवीय पक्ष इस घटना को उनके जीवन की दूसरी उपलब्धियों से अलग बनाता है।
कारगिल के दौरान उनका सेना के साथ जुड़ाव केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति तक सीमित नहीं रहा। वह सैनिकों के बीच रहे, अलग-अलग स्थानों पर गए और कुछ समय बेस अस्पताल में भी बिताया। कारगिल की कठोर परिस्थितियों में उन्होंने अपना वजन भी काफी कम होने की बात बताई थी।
कारगिल का अनुभव नाना के व्यक्तित्व के उस पक्ष को समझने में मदद करता है जिसमें वह केवल शब्दों से नहीं बल्कि अपने व्यवहार से भी किसी बात को साबित करने में विश्वास रखते हैं। जिस अभिनेता ने पर्दे पर सैनिक, पुलिस अधिकारी और व्यवस्था से संघर्ष करने वाले पात्र निभाए, उसने वास्तविक जीवन में भी कठिन परिस्थिति में सैनिकों के बीच पहुंचने का निर्णय लिया। यह उनके अभिनय और जीवन के बीच एक असामान्य समानता भी है।
इसी तरह, महाराष्ट्र के किसानों की समस्याओं और ग्रामीण परिवारों की कठिनाइयों को देखकर उन्होंने सामाजिक काम को अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। 'नाम फाउंडेशन' के माध्यम से नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने किसानों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए काम किया। आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की सहायता, सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में सहयोग और किसानों को फिर से खड़ा करने के प्रयासों ने उनके सामाजिक सरोकार को एक संगठित रूप दिया।
उनके जीवन की यही प्रवृत्ति बाद में उनके अभिनय में भी दिखाई देती है। वह गंभीर फिल्मों के अभिनेता की सफल छवि तक सीमित रह सकते थे, लेकिन 'वेलकम' में उदय शेट्टी का किरदार स्वीकार कर उन्होंने अपनी ही छवि को चुनौती दी। निर्देशक अनीस बज्मी को विश्वास था कि नाना की गंभीरता ही कॉमेडी में उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। नाना को मनाना आसान नहीं था। बज्मी जब कहानी सुनाने पहुंचे तो नाना ने उनसे पहले यह तक कहा कि अपनी 'मां की कसम' खाकर कहो कि यह फिल्म मेरे लिए अच्छी है और मुझे करनी चाहिए। कहानी पूरी होने के बाद नाना ने उन्हें गले लगाया और कहा कि वह कच्ची मिट्टी की तरह सेट पर आएंगे और बज्मी जिस सांचे में ढालना चाहें, ढाल सकते हैं। इसके बाद 'उदय शेट्टी' का किरदार बना, जिसकी गंभीर आवाज, गुस्सैल अंदाज और हास्यास्पद परिस्थितियों में बेहद गंभीर प्रतिक्रियाओं ने दर्शकों को खूब हंसाया।
'वेलकम' इस बात का अच्छा उदाहरण है कि नाना अपनी स्थापित पहचान को लेकर कभी सतर्क नहीं रहे। उनके लिए भूमिका का महत्व अक्सर छवि से बड़ा रहा। इसी कारण एक ही करियर में 'क्रांतिवीर' का आक्रोश, 'वेलकम' का हास्य और 'नटसम्राट' की त्रासदी एक साथ दिखाई देती है।
'कौन बनेगा करोड़पति' में अमिताभ बच्चन के साथ उनकी बातचीत उनके निजी जीवन की सहजता का एक और पक्ष सामने लाती है। नाना ने अपने फार्म पर रहने वाले जीवन का वर्णन करते हुए बताया कि उन्हें गांव की शांति, पशुओं, किताबों, पहाड़ों और अपने हाथ से बनाए भोजन में सुख मिलता है। उन्होंने अपने फार्म पर अपना व्यायामघर बनाया है और वहां का जीवन शहर की भागदौड़ से बिल्कुल अलग है। बातचीत के दौरान उन्होंने बेहद सहजता से अमिताभ बच्चन को भी, सारी चकाचौंध पीछे छोड़कर, अपने फार्म पर आने का न्योता दिया। यह उस जीवन की तस्वीर है जिसमें स्टारडम और निजी सहजता के बीच बहुत ऊंची दीवार नहीं है।
उनका जीवन हालांकि केवल प्रशंसनीय प्रसंगों से नहीं बना है। साल 2018 में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों ने उनके सार्वजनिक जीवन में गंभीर विवाद को जन्म दिया। तनुश्री ने आरोप लगाया कि 2008 में 'हॉर्न ओके प्लीज' की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर ने उनके साथ अनुचित व्यवहार किया था। 2018 में आरोप फिर सार्वजनिक होने के बाद यह मामला भारत में उभरे #MeToo आंदोलन के शुरुआती और चर्चित मामलों में शामिल हुआ। नाना ने हमेशा इन आरोपों से इनकार किया। मामले की पुलिस जांच के बाद जून 2019 में मुंबई पुलिस ने अदालत में बी-समरी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और कहा कि आरोपों को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। तनुश्री दत्ता ने इस निष्कर्ष का विरोध किया और जांच पर सवाल उठाते हुए आगे कानूनी कार्रवाई की बात कही।
नाना के जीवन में निजी दुख भी कम नहीं रहे। उनके पिता का निधन तब हुआ जब वह अपेक्षाकृत युवा थे। अपने छोटे बेटे को खोने का दुख भी उन्हें झेलना पड़ा। ऐसे अनुभव किसी व्यक्ति की जीवन-दृष्टि बदल सकते हैं। शायद इसी कारण नाना की बातचीत में कई बार जीवन की अस्थायी प्रकृति और छोटी-छोटी चीजों में संतोष पाने की बात दिखाई देती है।
मराठी सिनेमा और रंगमंच से उनका संबंध कभी कमजोर नहीं हुआ। साल 2016 की मराठी फिल्म 'नटसम्राट' उनके अभिनय जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है। कुसुमाग्रज के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित इस फिल्म में उन्होंने रंगमंच से विदा ले चुके एक महान अभिनेता गणपत बेलवलकर की भूमिका निभाई। इस भूमिका में नाना ने उम्र, अकेलेपन, अहंकार, परिवार, स्मृति और कलाकार की पहचान के टूटने की पीड़ा को जिस तरह जिया, वह केवल अभिनय कौशल का प्रदर्शन नहीं था। यह ऐसा किरदार था जिसमें रंगमंच से उनका दशकों पुराना रिश्ता और जीवन के अनुभव एक साथ दिखाई दिए। नाना के लिए रंगमंच कभी अतीत नहीं हुआ। वह उनके अभिनय की मूल जमीन बना रहा।
उनके करियर में 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी : द म्यूजिकल', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण', 'राजनीति', 'द अटैक्स ऑफ 26/11', 'वेलकम', 'वेलकम बैक', 'नटसम्राट' और अनेक दूसरी फिल्मों ने अलग-अलग रंग जोड़े। उन्होंने खलनायक, नायक, पुलिस अधिकारी, राजनीतिक चरित्र, हास्य कलाकार और टूटते हुए रंगमंचीय कलाकार, सबको विश्वसनीय बनाया। यही विविधता उनके कृतित्व को केवल सफल फिल्मों की संख्या से कहीं बड़ा बनाती है। समय के साथ उन्होंने काम की रफ्तार जरूर बदली, लेकिन अभिनय से दूरी नहीं बनाई।
हाल के वर्षों में 'द वैक्सीन वॉर' और 'वनवास' जैसी फिल्मों में दिखाई देने के बाद 'गदर 2', 'ओ' रोमियो' और 'सुबेदार' जैसी परियोजनाओं में भी उनका काम सामने आया। भारत सरकार ने उन्हें साल 2013 में 'पद्मश्री' से सम्मानित किया। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उनके अभिनय की असाधारण उपलब्धियों के प्रमाण हैं।
नाना पाटेकर की जिंदगी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि उसमें कोई एकरंगी छवि नहीं है। 'क्रांतिवीर' का आक्रोश और 'वजूद' की कविता एक ही कलाकार के भीतर हैं। 'वेलकम' का हास्य और 'नटसम्राट' व 'वनवास' की त्रासदी उसी अभिनेता के हिस्से हैं। कारगिल में सैनिकों के बीच खड़ा व्यक्ति और अपने फार्म पर पशुओं के साथ रहने वाला इंसान भी वही है। किसानों की मदद करने वाला सामाजिक कार्यकर्ता और विवादों से घिरा सार्वजनिक व्यक्तित्व भी उसी जीवन का हिस्सा है।
इसलिए, नाना पाटेकर को केवल आदर्श बनाकर देखना उचित नहीं होगा। उनका जीवन कहीं अधिक जटिल और मानवीय है। उपलब्धियां हैं, दुख हैं, जोखिम हैं, विवाद हैं और ऐसे फैसले भी हैं जो उनकी सार्वजनिक छवि से मेल नहीं खाते। शायद इसी वजह से उनका जीवन किसी आदर्श कथा से अधिक एक वास्तविक मनुष्य की कहानी ज्यादा लगता है।
नाना के जीवन से शायद यही बात सबसे अधिक सीखी जा सकती है कि मनुष्य को अपनी ही बनाई हुई छवि का कैदी बनकर नहीं रह जाना चाहिए। समाज आपको अभिनेता, स्टार, निर्देशक या पुरस्कार विजेता के रूप में पहचान सकता है, लेकिन जीवन इन पहचानों से बड़ा है। जब अभिनय करना हो तो पूरी शिद्दत से करें, जब कविता भीतर से निकले तो उसे आवाज दें, जहां मदद की जरूरत हो वहां अपनी सुविधा से बाहर निकलें और परिस्थितियां बदलें तो खुद को बदलने से भी न डरें।
नाना पाटेकर की कहानी इसी स्वतंत्रता की कहानी है। कभी प्रेरक, कभी असहज, कभी विवादास्पद और हमेशा मानवीय। उन्होंने अभिनय को गंभीरता से लिया, लेकिन अपनी बनाई हुई छवि को खुद पर हावी नहीं होने दिया। शायद यही वजह है कि इतने वर्षों बाद भी उन्हें केवल एक अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि अपने ढंग से जीवन जीने वाले एक जटिल और दिलचस्प इंसान के रूप में याद किया जाना चाहिए।
नाना पाटेकर की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने सफलता को अपने अतीत को मिटाने नहीं दिया। मुरुड का वह लड़का, जिसने गरीबी को बहुत करीब से देखा था, मुंबई की चमक में भी नहीं बदला। शायद इसी कारण उनके अभिनय में आम आदमी की बेचैनी, व्यवस्था से टकराव, रिश्तों की कमजोरी और जीवन की अनिश्चितता बार-बार लौटती है। भारतीय सिनेमा में कई बड़े अभिनेता आए और गए, लेकिन नाना पाटेकर की पहचान इसलिए अलग बनी क्योंकि उन्होंने अभिनय को केवल पेशा नहीं रहने दिया बल्कि उसे अपने जीवन के अनुभवों की भाषा बना दिया।

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