क्या लंदन सिर्फ बिग बेन, बकिंघम पैलेस और टेम्स का नाम है? चंद रोज़ वहां बिताने के बाद लगा कि लंदन की असली कहानी पत्थरों की इमारतों में नहीं, उन लोगों में छिपी है जो इन इमारतों के बीच अपनी जिंदगी जी रहे हैं। और हमारी अपनी कहानी? वह तो ग्लोबल फैमिली की बस में लिखी जा रही थी। कभी गीतों के साथ, कभी ठहाकों के साथ और कभी इस गंभीर सवाल पर, आज खाना कहां मिलेगा?
हमारी यात्रा का नाम था, ग्लोबल फैमिली। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए भारतीय इस परिवार का हिस्सा थे। कुछ साथी ऑस्ट्रेलिया से आए थे, कुछ अमेरिका से। पते अलग थे, पासपोर्ट अलग थे, लेकिन दिल में भारत एक ही था। यही इस परिवार की खूबसूरती थी। कोई विदेश में वर्षों से रह रहा था, कोई भारत से आया था, लेकिन दो मिनट की बातचीत में ऐसा लगता जैसे बरसों से परिचित हों। भारतीयों की यह खासियत है कि पहचान बनाने में समय नहीं लगता है। बस एक बार पूछ लीजिए, “आप कहां के हैं?” उसके बाद रिश्तेदारी का इतिहास भी निकल सकता है!
हमारी युवा और उत्साही यात्रा-नेता थीं मार्था गोम्स। उनकी जिम्मेदारी केवल हमें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना नहीं था। असली चुनौती थी कि इतने सारे भारतीयों को समय पर एक जगह इकट्ठा करना! कौन बस में आ गया, कौन अभी फोटो खिंचा रहा है, कौन किसी दुकान में फंस गया और कौन भोजन की तलाश में दूसरी दिशा में निकल गया, मार्था सब पर नजर रखती थीं। उनकी मुस्कान हमेशा तैयार रहती थी। हम चाहे समय पर हों या भारतीय समय के अनुसार थोड़ा आगे-पीछे, मार्था का धैर्य कायम रहा। शायद यात्रा-नेता बनने की पहली योग्यता यही है कि आप दूसरों की देरी पर मुस्कुरा सकें।
उनकी सक्रियता और सहज व्यवहार ने पूरे समूह को जोड़े रखा। वह हमारी यात्रा की ऐसी कड़ी थीं, जिसके टूटने पर पूरा हार बिखर सकता था। और, फिर हमारे बस चालक रविंदर, लोग प्यार से उन्हें रॉबिन बुलाते हैं। उनकी आवाज में ऐसी खरखराहट थी कि लगता था रेडियो पर पुराने जमाने का कोई उद्घोषक बोल रहा हो। ऊपर से उनका देसी हास्य! बस सड़क पर चलती थी, लेकिन माहौल कभी-कभी कॉमेडी शो जैसा हो जाता था। लौटते में हिंदी फिल्मी गानों की धुन के साथ बस को भी ठुमके लगवा दिए। एक घंटे ट्रैफिक जाम में फंसे होने पर भी कतई बोर नहीं हुए।
लंदन की शानदार सड़कों पर बस दौड़ रही थी और रविंदर की टिप्पणियां भारतीय स्वाद देती थीं। उनकी आवाज सुनकर कई बार लगा कि अगर बस चलाना बंद भी कर दें तो उन्हें मंच पर भेजा जा सकता है। हमारे लिए वह केवल ड्राइवर नहीं थे। वह यात्रा के उन किरदारों में शामिल हो गए, जिनके बिना बाद में पूरी कहानी अधूरी लगती है।
लंबे सफर में अंताक्षरी शुरू हुई। बस में अचानक संगीत सम्मेलन जैसा माहौल बन गया। फर्क इतना था कि यहां कलाकारों से ज्यादा श्रोता भी गा रहे थे। एक टोली गाती, दूसरी जवाब देती। किसी का सुर आसमान छूता और किसी की ताल बीच रास्ते में उतर जाती। लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी। पद्मिनी ने ‘रिमझिम गिरे सावन’ गाया तो माहौल में रोमांस और बारिश दोनों आ गए। खिड़की के बाहर लंदन था और बस के अंदर मुंबई का मानसून! किसी ने सुर बिगाड़ा तो किसी ने ताल। मगर किसी ने उत्साह नहीं बिगाड़ा। यही ग्लोबल फैमिली की असली खूबी थी।
लंदन की राजनीति से भी बड़ा सवाल यह रहा कि खाना कहां है? अगला भोजन कहां होगा? क्या मिलेगा? शाकाहारी क्या है? दाल है या नहीं? रोटी मिलेगी या केवल सलाद से काम चलाना पड़ेगा? इन सवालों ने कई बार लंदन के इतिहास और राजनीति को भी पीछे छोड़ दिया। आखिर पेट भी लोकतंत्र मांगता है। उसे भी अपनी पसंद की सरकार, यानी दाल, सब्जी और रोटी, चाहिए। मुमताज और रसोई घर में शुद्ध शाकाहारी भोजन मिला तो कई चेहरों पर ऐसी राहत दिखाई दी जैसे किसी ने विदेश में अचानक घर का दरवाजा खोल दिया हो। दाल का एक चम्मच हजारों किलोमीटर की दूरी कम कर देता है। सब्जी में मसाले पड़ते ही भारत की यादें भी प्लेट में सज जाती हैं।
लंदन, एक शहर, कई दुनिया; हमने लंदन के कई चेहरे देखे। लंदन आई, बिग बेन, वेस्टमिंस्टर एबे, बकिंघम पैलेस, ट्राफलगर स्क्वायर, ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट, मैडम तुसाद, आर्ट गैलरी और हाइड पार्क। हर जगह कैमरे निकले। फोटो खिंचीं। फिर फोटो देखे गए। फिर वही फोटो किसी और को दिखाए गए।
टेम्स तो जैसे यात्रा की स्थायी साथी बन गई। क्रूज पर नदी को करीब से देखा। पुलों को नीचे से देखा। शहर को पानी की नजर से देखा। और फिर उसी टेम्स के किनारे गंगा आरती। लगा कि भारत की गंगा और ब्रिटेन की टेम्स हजारों किलोमीटर दूर होते हुए भी एक-दूसरे से परिचित हैं। एक ने सभ्यताओं को जन्म दिया, दूसरी ने साम्राज्य को देखा। दोनों ने इतिहास को बहते हुए देखा है।
इतिहास ने भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा। किला देखा और कोहिनूर की कहानी याद आई। वह हीरा आज भी चमकता है, लेकिन उसके पीछे का इतिहास सवाल भी पूछता है। हीरे की चमक आंखों को अच्छी लगती है। इतिहास की सच्चाई कभी-कभी आंखों में चुभती है। शायद इतिहास की यही विडंबना है कि विजेता ट्रॉफी संभालता है और पराजित उसकी कहानी।
लेकिन, सबसे ज्यादा ध्यान खींचा लंदन के आम लोगों ने। लोग तेज चलते हैं। बहुत तेज। ऐसा लगता है जैसे हर व्यक्ति की जेब में समय की कमी है। कोई दौड़ रहा था, कोई साइकिल चला रहा था, कोई पैदल जा रहा था। चौड़े फुटपाथों पर लोगों की अपनी दुनिया थी। यातायात व्यस्त था, मगर शोर कम था। सड़कें भरी थीं, मगर अफरातफरी कम थी।
हमारे लिए यह अनुभव खास था। हॉर्न की आवाज बहुत कम। सड़क पर अचानक कोई वाहन रोककर लंबी बहस करता दिखाई नहीं दिया। मन में आया, अगर भारतीय सड़कें भी इतनी शांत हो जाएं तो कई लोग अपना हॉर्न बेचकर तीर्थयात्रा पर निकल जाएं! हर तरफ एशियाई चेहरे भी दिखाई देते रहे। दुकान में, बस में, सड़क पर, काम करते हुए। लंदन सचमुच एक ऐसा शहर लगा जहां दुनिया के अलग-अलग हिस्से आकर एक ही पते पर रहने लगे हैं।
और, फिर आया हमारी यात्रा का सबसे रोमांचक पड़ाव, लॉर्ड्स ग्राउंड। क्रिकेट प्रेमियों के लिए लॉर्ड्स केवल मैदान नहीं। यह क्रिकेट की तीर्थभूमि है। यहां खड़े होकर लगा कि बल्ला और गेंद भी इतिहास लिख सकते हैं। फर्क केवल इतना है कि इतिहास की किताबें शांत रहती हैं और क्रिकेट की यादें हर भारतीय के भीतर शोर करती रहती हैं।
हमारे साथ अलिस्टेयर थे। उन्होंने लॉर्ड्स के कई पहलुओं से परिचित कराया और महान खिलाड़ियों के रोचक प्रसंग सुनाए। जब उन्होंने ‘गांगुली बालकनी’ दिखाई तो भारतीय क्रिकेट की अनेक यादें ताजा हो गईं। किसी को वह ऐतिहासिक क्षण याद आया, किसी को भारतीय टीम की जीतें और किसी को शायद गांगुली की वह प्रसिद्ध शर्ट! लॉर्ड्स में खड़े होकर लगा कि क्रिकेट केवल खेल नहीं है। यह भारत और इंग्लैंड के बीच ऐसी भाषा है जिसे दोनों देश बिना अनुवाद के समझते हैं।
बस में, भोजन की मेज पर, स्मारकों के बीच और चलते-चलते हमने खूब बातें कीं। भारत में रहने वालों और विदेशों में बसे भारतीयों के अनुभव सुने। किसकी संतान कहां पढ़ रही है, कौन किस शहर में रहता है, किसे भारत की कौन-सी चीज याद आती है, बातें चलती रहीं। अचानक महसूस हुआ कि दुनिया ने हमें अलग-अलग देशों में बांट दिया है, लेकिन भारतीय मन को अभी तक कोई सीमा नहीं बांट पाई है।
विदेश में रहने वाले भारतीयों को भारतीय भोजन की याद आती है। भारत में रहने वालों को विदेश में बसे अपनों की। कोई मौसम की शिकायत करता है, कोई महंगाई की, कोई राजनीति की। यानी, देश अलग हो सकते हैं, शिकायतों का सॉफ्टवेयर भारतीय ही रहता है।
लंदन ने हमें बहुत कुछ दिखाया। लेकिन, उससे ज्यादा सोचने का मौका दिया। एक उदार समाज कैसा होता है? अलग-अलग संस्कृतियां एक शहर में कैसे साथ रहती हैं? साफ सड़कें, चौड़े फुटपाथ और सुचारु यातायात आम आदमी की जिंदगी को कितना आसान बनाते हैं? और, सबसे बड़ा सवाल, क्या विकास का मतलब केवल बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, या वह रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा बेहतर बनाने का नाम भी है? लंदन की सड़कों ने इन सवालों के कुछ जवाब बिना भाषण दिए दे दिए।
हम लंदन से लौटे तो हमारे पास स्मृतियों का एक छोटा-सा खजाना था, टेम्स की लहरें, बिग बेन की घंटियां, लॉर्ड्स का इतिहास, गंगा आरती की गूंज, मार्था की मुस्कान, रविंदर की खरखराती आवाज और बस में गूंजती अंताक्षरी। और हां, भोजन की मेज पर हुई वे अंतहीन चर्चाएं भी। आखिर यात्रा में तस्वीरें मोबाइल में रहती हैं, लेकिन कहानियां पेट और दिल दोनों में रहती हैं।
ग्लोबल फैमिली ने हमें फिर याद दिलाया कि दुनिया कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, भारतीय दिल के लिए परिवार की दूरी हमेशा छोटी रहती है। लंदन की यात्रा खत्म हुई, लेकिन बातचीत अभी बाकी है।
अब अगला पड़ाव, पेरिस। और इस बार सफर भी कम दिलचस्प नहीं होगा। समुद्र के नीचे ट्रेन। यूरोस्टार। देखना है, पेरिस में एफिल टावर ज्यादा ऊंचा निकलता है या हमारी उम्मीदें!

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