भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में है पितरों को याद करने की परंपरा...

सुबह अभी पूरी तरह उतरी नहीं है। घाट की सीढ़ियां गीली हैं और पानी ठंडा। एक व्यक्ति कमर तक जल में खड़ा है। हथेलियों में जल, जल में काले तिल, उंगली में कुश की पवित्री और जनेऊ दाहिने कंधे पर पलटा हुआ है। वह जल छोड़ता है और नाम लेता है। पिता का। फिर पिता के पिता का। फिर उस तीसरे नाम का, जिसे उसने कभी देखा नहीं, बस दादी के कमरे में टंगी एक धुंधली तस्वीर में देखा था। यहां तक सब ठीक है।

फिर, वह रुकता है। और, एक नाम पुन: लेता है, किसी ऐसे का, जिससे उसका रक्त का रिश्ता भी नहीं है। यह वह जगह है जहां इस पखवाड़े का असली रहस्य छिपा हुआ है, और उस पर हम लौटेंगे। पहले एक और सवाल, जो हर साल इन्हीं दिनों पूछा जाता है। वह यह कि क्या दिवंगत तक चावल पहुंचता है। कौआ केवल कौआ है। पंडित जी भोजन कर लेते हैं और मोहल्ले का भूखा वहीं का वहीं रह जाता है। यह सब पुरानी आदत है, जिसे हमने श्रद्धा का नाम दे रखा है। आदि-आदि।

मान लिया कि यह आरोप पूरा का पूरा सही है। चलिए, अब एक काम कीजिए। अपनी नदी के किनारे से सिर उठाइए और देखिए कि इस समय दुनिया के दूसरे किनारों पर वह कौन खड़ा है। जो दिखेगा, वह इस बहस को उसी जगह मोड़ देगा जहां से वह शुरू हुई थी।

चलिए, मेक्सिको चलते हैं। अक्तूबर के आख़िरी दिन हैं। यहां के एक घर में एक स्त्री दरवाज़े पर गेंदे की पंखुड़ियां बिछा रही है। पूछने पर वह जो कारण बताती है, वह किसी भी भारतीय को अपना-सा लगेगा, “ताकि लौटने वाले को रास्ता न भूलना पड़े।“ भीतर मेज़ सजी है, जिसे वे ‘ओफ़्रेंदा’ कहते हैं। तस्वीरें, मोमबत्तियां, और पानी का एक गिलास। थका हुआ मुसाफ़िर आएगा तो उसे प्यास लगेगी। और वही व्यंजन, जो चले गए स्वजन को सबसे प्रिय था।

यूनेस्को ने इस रीत को मानवता की धरोहर माना है और इसे बहुत सीधे शब्दों में समझाया कि यह दिवंगत परिजनों की कुछ दिनों के लिए वापसी का पर्व है। वहां खोपड़ियां चीनी की बनती हैं, मिठाई पर उस व्यक्ति का नाम लिखा जाता है जो अब नहीं रहा, और माहौल बिलकुल उदास नहीं होता है।

एक नाम। एक तिथि। एक प्रिय व्यंजन। और एक घर, जो किसी के आने की तैयारी कर रहा है। व्याकरण वही है, जो हमारे घाट पर है। मगर यह सबसे चौंकाने वाली बात नहीं थी। बड़ी हैरानी अगले पड़ाव पर खड़ी है।

चलिए, चीन चलें। यहां यह आयोजन बसंत में होता है। चिंगमिंग का दिन किसी संत के नाम से नहीं, मौसम के चक्र से तय होता है, जब बारिश लौटती है और धरती नरम पड़ती है। परिवार सैकड़ों मील चलकर पूर्वजों की समाधियों तक पहुंचते हैं। घास-फूस हटाते हैं, सालभर में जो टूटा है, उसे ठीक करते हैं, पत्थर पोंछते हैं, सिर झुकाते हैं, और भोग रखते हैं।

अंग्रेज़ी में इसे ‘टूम्ब स्वीपिंग’ कहा जाता है, जिससे लगता है कि बस झाड़ू-पोंछा हो रहा है। अब वह बात, जिसके लिए यह पड़ाव ज़रूरी था। एक बार कन्फ़्यूशियस से किसी ने पूछा कि माता-पिता के लिए इतना लंबा शोक क्यों, इसे छोटा क्यों न कर दें। उन्होंने उत्तर में जीवन के उन आरंभिक वर्षों की याद दिलाई, जब शिशु न खड़ा हो सकता है, न स्वयं खा सकता है, न एक घंटा अकेला जी सकता है। कोई था, जो उसे गोद में उठाए फिरता था।

जो कर्ज़ स्मृति बनने से पहले चढ़ जाता है, उसे आज की सुविधा देखकर नहीं चुकाया जा सकता। हमारे यहां इसी का नाम ‘पितृ-ऋण’ है। ढाई हज़ार साल पहले, हज़ारों मील दूर, किसी और भाषा में वही तर्क दिया जा चुका था। तो क्या यह सब हमेशा गंभीर और उदास होता है? तीसरे पड़ाव पर इसका उत्तर ढोल की थाप के साथ मिलेगा।

पहले कोरिया। चुसोक आते ही शहर ख़ाली होने लगते हैं और गाड़ियां भर जाती हैं। घर पर चारये की मेज़ सजती है, प्रणाम होता है, और फिर लोग पहाड़ी पर बनी पुरखों की क़ब्रों तक चढ़ते हैं, वहां उग आई घास को काटते हैं और तब भोजन करते हैं।

अब जापान। गर्मियों में ओबोन होता है। दरवाज़े पर एक छोटी-सी आग जलाई जाती है, ताकि आने वालों को घर पहचानने में कठिनाई न हो। भीतर की वेदी पर भोग रखा जाता है, लालटेनें जलती हैं, लोग क़ब्रिस्तान जाते हैं। और, तीन दिन बाद विदा की आग जलती है।

यह क्रम ठहरकर सोचने लायक़ है। अपनों को बुलाना, मेहमाननवाज़ी करना और आदर के साथ विदा कर देना। याद को घर में स्थान दिया जाता है, पर जीवन को हमेशा के लिए ठहरने को नहीं कहा जाता है। उन्हीं दिनों ‘बॉन ओदोरी’ होता है। यानी एक तरह का खास नृत्य। विद्यालय के मैदान में ढोल बजते हैं, बीच में लालटेनों का मचान होता है और बूढ़ी दादियों से लेकर छोटे बच्चों तक सब गोल घेरे में घूमते हैं। इसका आरंभ पितरों के स्वागत और उन्हें तसल्ली देने से जुड़ा था और यह आयोजन आनंद का है। जो मानते हैं कि बिछुड़े हुए स्वजन से जुड़ाव बनाए रखना आगे न बढ़ पाने की निशानी है, उन्हें एक बार उस घेरे में खड़ा होना चाहिए।

अब तक की यात्रा एशिया की थी। अगला पड़ाव वहां है, जहां न कर्म का सिद्धांत है और न पुनर्जन्म की कल्पना। ईसाई मत में पितृलोक नहीं है। फिर भी 2 नवंबर को ‘ऑल सोल्स डे’ है, जो पुण्यात्माओं की स्मृति का दिन है। उस रोज़ गिरजाघरों में प्रार्थना होती है, क़ब्रिस्तानों में मोमबत्तियां जलती हैं और नाम एक-एक कर पुकारे जाते हैं। वहां भाव भोजन पहुंचाने का नहीं बल्कि दया याचना का है। पर साल की एक तिथि उनके नाम सुरक्षित है जो जा चुके हैं।

यहूदी धारा में एक क़दम और आगे बढ़ा दिया गया है। पुण्यतिथि पर याहरत्साइट का दीपक जलता है, त्योहारों पर यिज़कोर की स्मृति-प्रार्थना पढ़ी जाती है, जिसमें स्वर्गवासी का नाम लिया जाता है। और, इसके साथ त्सेदाका जुड़ा है, यानी दान। वह दीपक इतना ही कहता है कि एक विशेष जीवन कभी यहां था और उसका असर समाप्त नहीं हुआ। क्योंकि, आज किसी भूखे को जो मिला, वह उसी के नाम से मिला है।

और अब वह परंपरा, जहां लकीर हमसे अलग तरह खिंचती है। इस्लाम में व्यक्ति के लिए दुआ और मृत्यु का स्मरण किया जाता है। उसकी ओर से सदक़ा दिया जाता है, इस उम्मीद में कि लाभ वहां तक पहुंचे। क़ब्र पर जाना बहुत जगह चलन में है और उलेमाओं के बीच इस पर बहस भी है। लेकिन, इबादत सिर्फ़ ख़ुदा की है और किसी दिवंगत के नाम पर चढ़ावे से साफ़ इनकार है। यानी, यहां एक ऐसी धारा है, जो अपने बुज़ुर्गों के प्रति ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाती है और चढ़ावे की शक्ल को नहीं मानती।

अगले पड़ाव के लिए मेडागास्कर चलते हैं। यहां के पहाड़ी इलाक़ों में कुछ-कुछ वर्षों के अंतर पर ‘फ़माडिहाना’ होता है। परिवार अपने बड़े-बुज़ुर्गों की समाधि खोलते हैं, अवशेषों को नए रेशमी वस्त्र में लपेटते हैं, उन्हें कंधे पर उठाकर गाजे-बाजे के साथ घुमाते हैं और फिर वापस रख देते हैं। नौकरी और दूरी ने कुटुंब को जितना बिखेरा था, वह कुछ घंटों के लिए फिर जुड़ जाता है और नई पीढ़ी को पता चलता है कि वह किसकी संतान है।

पश्चिम अफ़्रीका के योरूबा समाज में एगुनगुन की प्रथा पितरों को सीधे सड़क पर ले आती है। वस्त्रों की परतों में ढका एक शख़्स ढोल और स्तुति-गीतों के बीच निकलता है; वहां पूर्वज आशीर्वाद भी देते हैं और समाज को उसकी भूलों पर डांटते भी हैं।

सबसे पुराना गवाह प्राचीन रोम है, जहां फ़रवरी के नौ दिन इसी काम के लिए तय थे। लोग कुल की समाधियों पर फूल, अनाज, थोड़ी मदिरा, नमक और रोटी रख आते थे। पत्ते के दोने में जल और तिल लिए एक भारतीय गृहस्थ और नमक-अनाज लिए एक रोमन गृहस्थ को एक-दूसरे का प्रयोजन समझने के लिए अनुवादक की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

इतनी दूर घूम आने के बाद अब वह सवाल, जिससे हम बचते आ रहे थे कि क्या इससे सिद्ध होता है कि आत्माएं लौटती हैं? नहीं। और यह बात साफ़ कह देना ही ईमानदारी है। 

किसी विश्वास को दुनियाभर के लोग मानते हैं, इससे वह सच नहीं हो जाता है। गिनती से कोई आध्यात्मिक प्रश्न कभी तय नहीं हुआ है। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि ये सारी प्रथाएं एक-दूसरे से निकली हैं। माता-पिता हर जगह एक दिन चले जाते हैं, संतानें हर जगह बिखरती हैं, समाधियां हर जगह टूटती हैं और स्मृति हर जगह धुंधली पड़ती है। एक जैसी स्थिति से एक जैसे उत्तर निकल आते हैं।

लेकिन, अब ईमानदारी की यही कसौटी दूसरी ओर घुमाइए। यहीं पूरी बहस पलट जाती है। अगर पिंडदान अंधविश्वास है, तो ‘याहरत्साइट’ की मोमबत्ती भी है। ‘ऑल सोल्स डे’ की प्रार्थना भी। चिंगमिंग पर पोंछा गया पत्थर भी। क्योतो की नदी में बहती लालटेन भी। मेक्सिको के गेंदे भी। मेडागास्कर का रेशमी वस्त्र भी। और रोम की समाधि पर रखा नमक भी।

कोई चाहे तो इन सबको ख़ारिज कर सकता है। यह उसका अधिकार है। जो वह नहीं कर सकता है, वह है भोजन, तिथि और पितरों को एक साथ जोड़ने के लिए केवल भारतीय रीत को मूर्ख ठहराना। उस तर्क को ईमानदारी से आगे बढ़ाइए तो वह अधिकांश मानवता के विरुद्ध चला जाता है। इतने बड़े पैमाने की अवहेलना एक रवैया ज़रूर बताती है, उस व्यवस्था की व्याख्या नहीं करती, जिसे इतने अलग-अलग समाजों ने, एक-दूसरे से लगभग बिना संपर्क के, बनाने लायक़ समझा।

और, अब वह सवाल, जो हम आपस में कभी नहीं पूछते हैं। उपहास केवल यहीं क्यों होता है? जापान में ओबोन के दिनों में कोई स्तंभ यह नहीं लिखता कि लालटेन जलाना पुरोहितों का धंधा है। चीन में चिंगमिंग की सरकारी छुट्टी होती है और कोई उसे सामंती युग का अवशेष कहकर हंसी नहीं उड़ाता है। मेक्सिको में जो ईश्वर को नहीं मानता है, वह भी ओफ़्रेंदा पर दादी की तस्वीर रख देता है और इसे अपनी संस्कृति कहता है, अंधविश्वास नहीं।

ऐसा भी नहीं है कि वहां बहस नहीं होती है। कोरिया में चारये पर ख़ूब बहस है, पर वह बहस ख़र्च की है, दिखावे की है, और इस बात की है कि रसोई का सारा बोझ स्त्रियों पर क्यों। इस्लाम में क़ब्र पर जाने को लेकर सदियों से गंभीर मतभेद है, पर वह मतभेद धर्मशास्त्र के भीतर का है। इन समाजों में लोग अपनी रीत को सुधारने की मांग करते हैं। उसका मज़ाक़ नहीं उड़ाते हैं।

भारत अकेला देश है, जहां पितरों के स्मरण के लिए एक पूरी तंज़ भरी शब्दावली गढ़ ली गई है, जहां बात शुरू होते ही ‘ब्राह्मणवादी पाखंड’ पर आकर बंद कर दी जाती है। और, जो बंद होता है, वह किसी पुरोहित का रोज़गार नहीं बल्कि वह उस बच्चे का अधिकार है, जिसे यह जानना था कि उसके परदादा का नाम क्या था।

यह कहना भी ज़रूरी है कि हर आलोचना ग़लत नहीं होती है। जहां किसी रीत में किसी को नीचा दिखाया गया हो, जहां ख़र्च कर्ज़ बन जाए, जहां स्त्री दिनभर रसोई में रहे और पंक्ति में पुरुष ही बैठें, वहां सवाल उठाना चाहिए, और हमारे यहां सुधार हमेशा परंपरा के भीतर से ही आया है। पर आलोचना और उपहास एक चीज़ नहीं हैं। सुधार मांगने वाला ढांचा बचाता है; उपहास करने वाला केवल दूसरे की स्मृति पर हंसता है। और, जो समाज अपनी विरासत पर हंसना सीख जाता है, वह दो पीढ़ी बाद यही भूल जाता है कि हंसी किस बात पर थी।

अब लौटिए उस पहली आपत्ति पर, जो आरंभ में रखी गई थी कि दिवंगत तक चावल नहीं पहुंचता है। सच है। और, हमारी विधि ने कभी यह दावा किया भी नहीं कि थाली अपने आप हवा में उठ जाएगी। यहां का विधान इससे कहीं अधिक व्यावहारिक है। श्राद्ध का अन्न किसी पत्थर पर रखकर छोड़ नहीं दिया जाता कि वह सूखे, सड़े या पक्षी उठा ले जाएं। वह किसी जीवित शरीर तक पहुंचता है।

पंचबलि में गाय, कौआ, श्वान, चींटी और देव का भाग अलग निकाला जाता है। इसके बाद अतिथि का भाग है, विद्वान का भाग है, और उसके बाद वह पंक्ति है जिसमें कोई भी बैठ सकता है। यानी, जिस दिन हम अपने पितरों का नाम लेते हैं, उस दिन हमारे घर से निकला अन्न किसी और के पेट में जाता है। कोई है, जो उसे सप्रेम ग्रहण करता है और तृप्त होकर उठता है। अन्न व्यर्थ नहीं होता, वह हाथ बदलता है।

दुनिया की अधिकतर रीतों में चढ़ावा या तो प्रतीक बनकर रह जाता है, या घूम-फिरकर उसी परिवार की थाली में लौट आता है। भारतीय विधि अकेली है, जो शुरू से ही इस तरह बनाई गई है कि भोजन परिवार से बाहर जाए। पितृ-यज्ञ यहां अकेला खड़ा नहीं है; उसके साथ भूत-यज्ञ और अतिथि-यज्ञ बांध दिए गए हैं। स्मृति और भोजन एक ही डोर में पिरोए गए हैं और यह किसी आधुनिक समाज-सुधार का विचार नहीं बल्कि हज़ारों साल पुराना ढांचा है।

लेकिन, यही बात हमारे ऊपर एक शर्त भी रख देती है। जिस दिन यह अन्न केवल भरे-पेट लोगों तक सिमट जाएगा, उस दिन आलोचक सही हो जाएगा और हम ग़लत। इसलिए, उत्तर पंक्ति मिटाना नहीं बल्कि पंक्ति चौड़ी करना है। इस बार उस पंक्ति में मोहल्ले का वह आदमी भी बैठे, जिसे शाम का भोजन मिलेगा या नहीं, यह निश्चित नहीं। तब आरोप अपने आप ख़त्म हो जाता है।

अब लौटिए उस घाट पर, जहां से यह यात्रा शुरू हुई थी। वह व्यक्ति अब भी पानी में खड़ा है और उसने वह चौथा नाम ले लिया है, किसी ऐसे का, जो उसके कुल का नहीं है। हमारी परंपरा में यह कोई भूल नहीं, विधान है। तर्पण के अंत में उन सबके लिए जल छोड़ा जाता है, जिनका नाम लेने वाला अब कोई नहीं बचा है, जिनकी संतान नहीं रही है, जिनका कुल समाप्त हो गया है, जो किसी यात्रा में, किसी युद्ध में या किसी अनाम दिन चले गए है। हर वर्ष, बिना किसी रिश्ते के, कोई अजनबी उनके हिस्से का जल छोड़ देता है। इसी एक वाक्य में इस पूरे पखवाड़े का उत्तर है। यह आयोजन लेन-देन नहीं है। अगर होता, तो अपने पितरों पर समाप्त हो जाता।

26 सितंबर से 10 अक्तूबर के बीच इस देश के घाटों पर लोग हथेलियों में जल लेकर नाम पुकारेंगे। फ़रवरी में रोम के लोग नमक और अनाज लेकर यही करेंगे। अप्रैल में चीन के लोग एक पत्थर साफ़ करेंगे। अगस्त में जापान के लोग दरवाज़े पर दीप जलाएंगे और फिर दूसरी लौ से विदा करेंगे। नवंबर में यूरोप के क़ब्रिस्तानों में मोमबत्तियां निकलेंगी और मेक्सिको में गेंदे बिछेंगे।

मृत्यु के बाद क्या होता है, इस पर मनुष्यता में आज तक सहमति नहीं बनी है। एक बात पर चुपचाप सहमति ज़रूर है कि परिवार केवल उतने लोग नहीं हैं, जो इस समय सांस ले रहे हैं। और एक प्रश्न, जिसे आप आज रात अपने साथ ले जाइए। जिस दिन हम नहीं रहेंगे, हमारा नाम कोई लेगा या नहीं, यह उस दिन तय नहीं होगा। यह आज तय हो रहा है, उस घर में, जिसमें हम रहते हैं।