भारत देश में लोकतांत्रिक शासन है। इसका अभिप्राय यह है कि यहां जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन करने का प्रावधान है। लेकिन, 75 साल से ज्यादा के आधुनिक भारतीय इतिहास में नेताओं के दल-बदल के चलते कई बार सरकारें अस्थिरता के भंवर में फंसती रही हैं। इस दौरान कहने को तो शासन जनता का ही होता है, लेकिन उसमें जनता की कितनी भागीदारी रहती है, यह हम सब जानते हैं।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद एक बार फिर भारतीय राजनीति इसी अस्थिरता के दौर में फंसती नजर आ रही है। देश की समृद्धि एवं विकास के लिए एक स्थिर सरकार का होना अति आवश्यक होता है। लेकिन, हमें याद है कि पूर्व में कैसे दलबदलू नेतागण जनता के विश्वास तथा भारतीय राजनीति की छवि को अपने तुच्छ स्वार्थों के कारण खंडित करते रहे हैं।
देश के प्रति प्रतिबद्धता तथा प्रेम का भाव प्रत्येक व्यक्ति में होना ही चाहिए। ऐसे में जनता की नेताओं से भी यह स्वाभाविक अपेक्षा रहती ही है कि वे उनके द्वारा चयनित होने के पश्चात अपनी कर्तव्यनिष्ठा व प्रतिबद्धता उस प्रमुख दल के साथ पूर्ण निष्पक्षता के साथ बनाए रखें, जिसके साथ कम से कम उन्होंने पिछला चुनाव लड़ा है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 240 उम्मीदवार चुनकर आए परन्तु सरकार के गठन के लिए 272 उम्मीदवारों की आवश्यकता होती है। हालांकि, अब तक सरकार यह कहती रही है कि उनके गठबंधन को पूरा बहुमत प्राप्त है। लेकिन, बीजेपी को बहुमत पाने के लिए जरूरी 32 सीटों की कमी को पूरा कर रहे जनता दल यू के नीतीश कुमार तेलुगू देशम के नेता चन्द्रबाबू नायडू पर आम जनता का फिलहाल पूरा भरोसा नहीं है।
मोदी सरकार के गठन के बाद से अब तक ऐसी अफवाहें लगातार सुनने को मिल रही हैं कि ये दोनों दल सगातार मोदी सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इसमें निहित सत्यता की पुष्टि तो नहीं की जा सकी है। परन्तु, यदि हम इन दोनों नेताओं के अतीत पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि ये दोनों ही दल विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में कई बार कई सरकारों को खंडित व निर्मित कर चुके हैं। इस प्रकार की प्रवृत्ति के नेताओं के कारण ही भारतीय राजनीति में अस्थिरता का वातावरण उत्पन्न होता रहा है। अभिप्राय यह है कि इन दोनों ही नेताओं को सरकारें तोड़ने और जोड़ने का अनुभव रहा है। अतः नरेंद्र मोदी इन दोनों को लेकर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त न रहें तो बेहतर है।
दूसरी ओर, चुनावों में मिले जनमत से तो यही महसूस होता है जनता की इच्छा इस सरकार को गतिमान बनाए रखने की है। निश्चित रूप से विपक्ष को पर्याप्त सीटें न देकर जनता ने इस तथ्य की पुष्टि की है।
बेहतर भविष्य के लिए हमें इस बात को कभी नहीं भुलाना चाहिए कि कोई भी सरकार देश की प्रगति में तभी सक्षम होगी, जब वह अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करे।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं और यहां व्यक्त विचार उनके स्वयं के हैं)






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