तेज़ी से बढ़ते शहरों में, पानी का इस्तेमाल होने के बाद पानी का चक्र खत्म नहीं होता है। घरों, कारखानों और आस-पड़ोस से बहकर निकलने वाले पानी को सही व्यवस्था के साथ, इस्तेमाल कर, पुन: एकत्र किया जा सकता है। उसका उपचार किया जा सकता है। पुनर्चक्रित किया जा सकता है और फिर से काम में लाया जा सकता है।
इसके केंद्र में इस्तेमाल किए जा चुके पानी का प्रबंधन है, जो इस्तेमाल किए गए पानी का उपचार करने, अनुपचारित सीवेज को जल स्रोतों में जाने से रोकने और सुरक्षित रूप से दोबारा इस्तेमाल करने पर बल देता है। इस प्रक्रिया में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो वेस्टवॉटर मैनेजमेंट को प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और आगे इस्तेमाल के लिए पानी बचाने के अवसर में बदल देते हैं।
इस दृष्टिकोण को 'वॉटर प्लस' सर्टिफ़िकेशन से और मज़बूती मिलती है, जो शहरों को घरों और व्यावसायिक स्थलों से निकलने वाले अपशिष्ट पानी का प्रबंधन करने के लिए दिशानिर्देश देता है। इसके अंतर्गत यह आवश्यक है कि पर्यावरण में छोड़े जाने से पहले अपशिष्ट पानी का उपचार पूरी तरह तय मानकों के अनुसार हो। इसमें सिर्फ़ ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि शहर अपने जल संसाधनों की योजना कैसे बनाते हैं और उनका प्रबंध कैसे करते हैं। शहरी स्थानीय निकायों को अपशिष्ट पानी के पुनः उपयोग के लिए दीर्घावधि, शहर-स्तर की योजनाएँ बनाने के लिए सशक्त बनाया जा रहा है।
साफ़ तौर पर तय ज़िम्मेदारियां और तकनीकी तरक्की शहरों को उपचार प्रणाली की क्षमता और असरदार तरीके से काम करने में सहायता कर रही हैं। खुले में शौच से मुक्ति + प्रोटोकॉल इस दृष्टिकोण को और मज़बूत करते हैं; ये मल के कीचड़ और सेप्टेज सहित पूरे सीवेज के सुरक्षित प्रबंध और उपचार का आकलन करते हैं।
ये सभी उपाय मिलकर टिकाऊ स्वच्छता और चक्राकार अर्थव्यवस्था की नींव रख रहे हैं, जहां इस्तेमाल किए गए पानी का प्रबंधन संसाधन के तौर पर किया जा सकता है। एसबीएम 2.0 के अंतर्गत, छोटे शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए ₹11,785 करोड़ की लागत वाली परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। इन परियोजनाओं से ट्रीटमेंट की क्षमता में 4,900 मिलियन लीटर प्रति दिन की वृद्धि होगी। इससे इस्तेमाल किए गए पानी के असरदार प्रबंधन के लिए आवश्यक अवसंरचना का विस्तार होगा।
इस्तेमाल किए गए पानी का प्रबंधन अब पारंपरिक ट्रीटमेंट और निपटान के तरीकों से आगे बढ़ रहा है। विभिन्न शहर ऐसे तरीके अपना रहे हैं जो उनकी अवसंरचना, पानी की ज़रूरतों और स्थानीय हालात के हिसाब से हों। इस प्रक्रिया में, उपचारित किए गए पानी का इस्तेमाल खेती, बागवानी, उद्योग, सड़क की सफाई और झीलों को फिर से जीवित करने में किया जा रहा है। जयपुर, इंदौर, सूरत और नवी मुंबई जैसे शहरों के अनुभव इन विविध तरीकों को दिखाते हैं।
जयपुर में 2020-23 के दौरान 22.50 हेक्टेयर में बने देहलावास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता राजस्थान में सबसे ज़्यादा, यानी 215 एमएलडी है। गंदे पानी को अच्छी तरह से उपचारित करके दोबारा इस्तेमाल लायक संसाधन में बदला जाता है। इससे चक्राकार अर्थव्यवस्था और पानी बचाने की परिकल्पना को बढ़ावा मिलता है। यह हाई-टेक्नोलॉजी प्लांट पूरी तरह से सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन सिस्टम से स्वचालित है।
जयपुर एसटीपी में अभी बहुत असरदार सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर लगा है। इस प्रक्रिया में, गंदा पानी क्लोरीन टैंक तक पहुंचने से पहले पार्शल फ़्लूम, प्राइमरी क्लेरिफ़ायर और बेसिन से गुज़रता है। फिर इसे साफ़ पानी में बदल दिया जाता है। प्राइमरी स्लज थिकनर और स्क्रू प्रेस मशीनों का इस्तेमाल करके ठोस कचरे को अलग किया जाता है। एसटीपी में उपचार होने के बाद, गंदा पानी फिर से कीमती संसाधन बन जाता है। इसका इस्तेमाल सिंचाई और कई तरह की औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जा रहा है, जिसे अपशिष्ट पुनर्चक्रण कहते हैं और यह आर्थिक रूप से भी फ़ायदेमंद विकल्प है।
अभी, उपचारित किए गए पानी का कुछ हिस्सा पास की कॉलोनी में बागवानी और अन्य कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बाकी साफ़ पानी द्रव्यवती नदी में छोड़ा जाता है। इसके साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय किए जा रहे हैं कि अनुपचारित गंदा पानी नदी में न जाए। प्लांट के आस-पास ग्रीन एरिया भी बनाया गया है, जहां 30 हजार से ज़्यादा पौधे जगह की हरियाली बढ़ा रहे हैं।
इस्तेमाल किए गए पानी के प्रबंधन में इंदौर का बदलाव आसान लक्ष्य से शुरू हुआ। यह लक्ष्य अनुपचारित गंदा पानी पर्यावरण में न जाने देना था। इस तरीके से इंदौर को 'वॉटर+' सर्टिफ़िकेशन पाने वाला पहला शहर बनने में सहायता मिली। इसके तरीकों ने दिखाया कि शहर के स्तर पर टिकाऊ स्वच्छता और इस्तेमाल किए गए पानी का प्रबंधन कैसे काम कर सकता है। इस मॉडल ने कई छोटे शहरों को भी इसी तरह के तरीके अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
आज, उपचारित किए बिना गंदा पानी इंदौर की नदियों या प्राकृतिक और मानव-निर्मित निकासी नालियों में नहीं बहाया जाता है। 2020 तक, शहर में तीन मौजूदा केंद्रीकृत एसटीपी के साथ-साथ सात विकेंद्रीकृत एसटीपी थे। इसने उपचारित अपशिष्ट जल को ले जाने के लिए 200 किलोमीटर से अधिक का पाइप नेटवर्क भी बिछाया था।
इंदौर ने इसके साथ ही भूजल और सतही जल दोनों के संरक्षण के उपाय भी मजबूत किए। 2022 में, आवासीय और गैर-आवासीय क्षेत्रों में 1.25 लाख से अधिक वर्षा जल संचयन इकाइयां स्थापित की गईं। यह कार्य केवल चार महीनों की अवधि में पूरा किया गया। उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग अब बगीचों, सड़क के किनारे पौधारोपण और बागवानी के लिए किया जाता है। इसका उपयोग सड़कों की धुलाई और सीवर मशीनों की सफाई के लिए भी किया जाता है।
सूरत ने गंदे पानी को पुनः इस्तेमाल के विचार को एक कदम आगे बढ़ाते हुए इसे आर्थिक मूल्य वाले संसाधन के तौर पर देखा है। सूरत नगर निगम ने चार टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए हैं, जिनकी कुल क्षमता 116 एमएलडी है। इन संयंत्रों ने ताजे पानी के स्रोतों पर निर्भरता कम करने में सहायता की है। शहर में उपचारित किए गए अपशिष्ट पानी का इस्तेमाल पीने के अलावा कई अन्य कार्यों में किया जाता है। इनमें सीधे सर्विस लाइनों और टैंकर भरने वाले स्टेशनों के ज़रिए औद्योगिक इस्तेमाल, झीलों का कायाकल्प, खेती, बड़े पैमाने पर पौधे लगाना, सीवर की सफाई आदि शामिल हैं। शहर में सीवर साफ करने वाली 170 मशीनें हैं, जिनमें अत्याधुनिक रोबोटिक तकनीक पर आधारित उपकरण भी शामिल हैं। इन मशीनों का इस्तेमाल सीवरेज सिस्टम की सफाई और रखरखाव के लिए किया जाता है।
नवी मुंबई की 'वॉटर+' यात्रा में ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर और उपचारित किए गए पानी के बड़े पैमाने पर दोबारा इस्तेमाल को शामिल किया गया है। यह महाराष्ट्र का एकमात्र शहर है जिसे फाइव-स्टार रेटिंग और 'वॉटर+' सर्टिफिकेशन मिला है। शहर ने अपनी सीवेज ट्रीटमेंट तकनीक को अपग्रेड किया और अपने एसटीपी को 30 लाख की जनसंख्या के लिए डिज़ाइन किया। ऊर्जा की लागत कम करने के लिए इसके पंपिंग स्टेशनों को भी अपग्रेड किया गया। ये स्टेशन सर्जित सीवेज को एसटीपी तक पहुंचाते हैं। हॉटस्पॉट से बचने के लिए सीवर नेटवर्क का प्रिवेंटिव मेंटेनेंस किया गया।
नवी मुंबई ने सीवर लाइनों और सेप्टिक टैंकों की 100 फीसदी मशीनीकृत सफाई हासिल कर ली है। नवी मुंबई नगर निगम शहर भर में लगे लेवल ट्रांसमीटर के ज़रिए सभी सेप्टिक टैंकों की केंद्रीय रूप से निगरानी करता है। उपचारित पानी का 30 फीसदी से ज़्यादा हिस्सा शहर के 30 से अधिक बगीचों में पुनः इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल सॉलिड-वेस्ट वाहनों, कॉम्पैक्टर और शहर की ट्रांसपोर्ट बसों को धोने के लिए भी किया जाता है। स्प्रिंकलर और रोड डिवाइडर में भी ट्रीट किए गए पानी का इस्तेमाल होता है, जिससे ताजे पानी पर निर्भरता कम होती है।
तिरुपति ने थुकिवकम में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चलाने के लिए आत्मनिर्भर मॉडल विकसित किया है। शहर को 'वॉटर प्लस' भी घोषित किया गया है। ₹19 करोड़ की लागत से बने इस एसटीपी की क्षमता 50 एमएलडी है। यह शहर भर के 1,04,057 घरों को सेवा देता है। ट्रीट किए गए पानी में से 24 एमएलडी का इस्तेमाल विभिन्न कार्यों के लिए दोबारा किया जाता है। यह प्लांट श्रीकालाहस्ती पाइप्स लिमिटेड को पांच एमएलडी इस्तेमाल किया हुआ उपचारित पानी बेचता है। इससे प्लांट हर महीने छह लाख रुपये की नेट कमाई कर पाता है।
इसके अलावा, 18 एमएलडी इस्तेमाल किया गया उपचारित पानी किसानों को खेती के लिए मुफ़्त में दिया जाता है। यूएलबी इसका कुछ हिस्सा सड़कों और गलियों की सफ़ाई के लिए भी दोबारा इस्तेमाल करता है। उपचारित पानी का इस्तेमाल शहरभर में सड़क के बीच की जगह, पार्कों और बगीचों में पानी देने के लिए भी किया जाता है। इन उपायों से उपचारित पानी का ज़्यादा से ज़्यादा दोबारा इस्तेमाल हो पाता है। तिरुपति का तरीका वेस्टवॉटर के दोबारा इस्तेमाल को कमाई करने वाले मॉडल के साथ जोड़ता है, ताकि एसटीपी का संचालन लंबे समय तक सही ढंग से होता रहे।
इस्तेमाल किए गए पानी के प्रबंधन पर बढ़ते ध्यान से शहरों का अपनी पानी की ज़रूरतों को पूरा करने का दृष्टिकोण बदल रहा है। ट्रीटमेंट का मतलब अब सिर्फ़ प्रदूषण रोकना नहीं रह गया है, बल्कि इसका मकसद पानी को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाना भी है। उपचारित पानी का इस्तेमाल सिंचाई, उद्योग, बागवानी और रोज़मर्रा की शहरी सेवाओं में किया जा रहा है। जैसे-जैसे ज़्यादा शहर उपचार की क्षमता बढ़ा रहे हैं और दोबारा इस्तेमाल के सिस्टम विकसित कर रहे हैं, शहरी जल प्रबंधन ज़्यादा चक्रीय और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने वाला बनता जा रहा है। यह बदलाव साफ़-सुथरे सैनिटेशन सिस्टम बनाने और पानी के हर उपलब्ध स्रोत का बेहतर इस्तेमाल करने में सहायता करता है।

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