‘पांच मिनट!’ ने फ्रांस को दिया झकझोर और भारत हुआ सोचने पर मजबूर

“बस पांच मिनट और!”  ये वही फेमस पांच मिनट हैं जो घर के टाइमर नहीं मानते हैं। पेरिस के एक घर में 14 साल का बेटा मोबाइल से चिपका बैठा है; मां चिल्लाती है, “खाना ठंडा हो रहा है,” पिता आधे गुस्से में आधा विनती करते हैं, “मोबाइल नीचे कर दे।” बेटा पलटकर कहता है, “पापा, यह आखिरी वीडियो है।” लेकिन, वह वीडियो आखिरी नहीं होता। खुद-ब-खुद चलने वाले अगले-नेक्स्ट ने पांच मिनट को पचास में बदल दिया, और खाना ठंडा हो गया।

यह सीन फ्रांस का है, पर भारतीय घरों में भी वही दिखेगा। पेरिस में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया में कितनी आज़ादी दें? फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एक सख्त रोक का कानून बनाया, लेकिन अगस्त में फ्रांस की संवैधानिक परिषद ने कह दिया कि पूरी तरह का बंद करना अभिव्यक्ति और निजता पर ज़रूरत से ज़्यादा चोट है।

लेकिन, मैक्रॉन ने हार नहीं मानी। एक नया प्रस्ताव आया, जिसमें 13-15 साल वालों के लिए माता-पिता की सहमति, रात में नोटिफिकेशन बंद, ऑटो-प्ले पर पाबंदी और अजनबियों से संपर्क पर रोक संबंधी प्रावधान थे। सरल भाषा में यह कि दरवाजा बंद नहीं करेंगे, पर खिड़कियों पर जाली लगा देंगे।

भारत को भी यह तमाशा दूर से नहीं देखना चाहिए। हमारे एक अरब से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में इंस्टाग्राम और यूट्यूब किशोरों की रोज़मर्रा की दुनिया बन चुके हैं। यूट्यूब पढ़ाई का वरदान है; वही यूट्यूब कभी-कभी मिर्च-मसाले वाला जाल भी बन जाता है, एक क्लिक और आप ‘अनसक्योर एरिया’ में। बच्चा फिर वही कहता है, “बस पांच मिनट…” और पांच मिनट पता ही नहीं चलता कब परीक्षा के पेपर जितने लंबा हो गया।

साल 2023 का हमारा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून अच्छी कोशिश है। अभिभावकों की सत्यापन योग्य सहमति, बच्चों पर लक्षित विज्ञापन पर रोक, सही कदम हैं। पर असली परीक्षा मोबाइल पर है। बच्चे जन्मतिथि बदलकर दर्ज कर दें, और पूरा सिस्टम उसी पल का ‘नो-शो’ कर देता है। ऑनलाइन उम्र छिपाना उतना आसान है जितना परीक्षा में पीछे की सीट से कॉपी देखना, और ज़्यादा स्मार्ट।

तो क्या सीधा बैन कर दें, जैसा फ्रांस ने सोचा? भारत और फ्रांस की दुनिया अलग है। ग्राम और शहर का डिजिटल गैप, माता-पिता की डिजिटल अनभिज्ञता, और वही इंटरनेट जो अवसर देता है, उसे काटना सही नहीं होगा। करोड़ों बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई, कौशल और नौकरी की जानकारी पा रहे हैं, इन्हें बंद कर देना समस्या का इलाज नहीं, सर्जरी होगी जिसकी सुई गलत जगह लगेगी।

प्रस्तावित रास्ता प्रतिबंध नहीं, पर ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। मजबूत अभिभावक-सहमति, बेहतर उम्र-प्रमाणीकरण तकनीक, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता पर जोर। सोशल प्लेटफॉर्म को भी जवाबदेह बनाइए। ऑटो-प्ले, लगातार नोटिफिकेशन और नशे जैसा डिजाइन, इन फीचर पर कड़ाई से पालन हो। बच्चों के लिए ‘डिजिटल ब्रेक’ मोड, रात में नोटिफिकेशन ब्लॉक और शिक्षकों-माता-पिता के लिए आसान टूल, ऐसे छोटे-छोटे सुधार बड़ा फर्क डाल सकते हैं।

मोबाइल अब सिर्फ फोन नहीं रहा है। वह जेब में रखा स्कूल भी है, खेल का मैदान भी और कभी-कभी मुसीबत का दरवाज़ा भी। डिजिटल जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है; वापस बंद करना मुश्किल है, पर लगाम किसके हाथ में होगी, यह फैसला अभी हमारे हाथ में है। सुरक्षा ज़रूरी है, पर वह स्वतंत्रता और निजता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

फ्रांस रास्ता तलाश रहा है; हम भी सीखें, पर काट-छांट करने से पहले समझदारी से चुनें। आपका बच्चा "बस पांच मिनट" कहेगा, पर कौन तय करेगा कि ये पांच मिनट हैं या गिरफ़्तार कर देने वाले पचास मिनट?