तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य है आसान, मगर...


भारत का तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनना अब उतना मुश्किल नहीं लग रहा है। अगले पांच वर्षों में यह पूरी तरह सम्भव लगता है। भारतीय अर्थव्यवस्था से ऊपर के दो पायदानों पर फिलहाल जापान व जर्मनी विराजमान हैं। इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि दर एक से दो फीसदी के बीच है जबकि भारत में यह अनुमान 7.6 फीसदी का है। स्पष्ट है कि यह दर हासिल करना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है।

संख्या के आधार पर भारत उपभोक्ताओं का सबसे बड़ा वैश्विक केन्द्र बन चुका है। इसके चलते, दुनियाभर के उद्योगपतियों की निगाहें अब भारत पर आकर ठहर गई हैं। ये उद्योगपति भारत में निवेश के नए अवसरों को लगातार तलाश कर रहे हैं। इस कारण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है और निश्चित रूप से यह वृद्धि ही हमारी अर्थव्यवस्था को विश्व में पांचवें से तीसरे पायदान पर लाने की सबसे बड़ी कुंजी बनेगी।

आजादी मिलने के समय से चुलना की जाए तो भारत की जीडीपी साल 2023-24 तक 301.75 लाख करोड़ यानी 3.75 ट्रिलियन की हो चुकी है, जबकि साल 1947 में यह महज 2.70 लाख करोड़ रुपये ही थी। यदि इसे शिक्षा से जोड़कर देखा जाए तो वर्ष 1947 में हमारी साक्षरता वृद्धि दर महज 12 फीसदी थी, जबकि आज के दिन यह 75 फीसदी तक पहुंच चुकी है। बढ़ती आर्थिक शक्ति के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण संसाधन है।

शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काम करने की जरूरत है। बेशक, स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, लेकिन देश के सरकारी अस्पतालों व सेवाओ की बदहाली किसी से छुपी हुई नहीं है। सरकारें स्वास्थ्य के महत्व को कितनी प्राथमिकता देती हैं, इस पर भी हमारी दुनिया में मौजूदगी तय होगी।   

वर्ष 1979 में भारत और चीन की जीडीपी एक समान थी। इसके पश्चात, चीन ने लगभग 10 प्रतिशत की दर से अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया और अब वह भारत की तुलना में बहुत आगे निकल चुका है। वर्ष 2022 में जहां भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,388 डॉलर थी, वहीं चीन 12,720 डॉलर प्रति व्यक्ति का स्तर प्राप्त कर चुका था। चीन की इस आर्थिक यात्रा से भारत को कई सबक सीखने की जरूरत है।

वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था पांचवें पायदान पर पहुंच तो गई है, परन्तु इसका वास्तविक वितरण अभी असमान है। आम जनता के मध्य भारत की प्रगति का संतुलित वितरण अभी तक असफल ही रहा है। दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में होने के बावजूद आज के दिन भारत की करीब अस्सी करोड़ जनता दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए सरकार द्वारा मुहैया कराए जा रहे मुफ्त के राशन पर निर्भर है।

देश के सर्वांगीण विकास के लिए सरकार को स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ-साथ, कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, न्याय व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं की राजनैतिक प्रभाव से मुक्ति, महिला सुरक्षा, कृषि का तकनीकी विकास, प्रौद्योगिकी और नवाचार में निवेश आदि क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा। राजनेताओं का कार्य योजना बनाना होता है और उस योजना को क्रियान्वित करना और सुविधापूर्ण बनाना अधिकारियों का कार्य है। लेकिन, एक बड़ा कड़वा सच यह है कि विधायिका और कार्यपालिका दोनों ही भारत की तथाकथित प्रगति को जनता के मध्य न्यायपूर्ण वितरित करने की एक ठोस नीति बनाने में असफल से दिखते हैं।

यदि भारत की प्रगति का लाभ यहां की सम्पूर्ण 140 करोड़ जनसंख्या को मिलने लगे तो भारत के लिए भी चीन के सदृश 10 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करना कतई असम्भव नहीं होगा।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं)



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