अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। टिकटों के लिए घेराबंदी तेज है, विपक्षी दल तालमेल की गांठें कस रहे हैं और भाजपा नेता पूरे भरोसे से कह रहे हैं, “हमारा काम बोलेगा।”
लेकिन, इस बार असली सवाल वोटर पूछ रहा है कि क्या सिर्फ जातीय गणित से चुनाव जीता जाएगा? वह पूछ रहा है, योगी सरकार ने ऐसा क्या बुरा किया है कि उसे सत्ता से बाहर किया जाए? और दूसरी तरफ विपक्ष के पास आखिर ऐसा नया क्या है, जिसके भरोसे जनता उसे एक और मौका दे?
कभी उत्तर प्रदेश का नाम सुनते ही जेहन में अपराध, रंगदारी, माफिया और राजनीतिक उठापटक की तस्वीर उभरती थी। शाम ढलते ही परिवारों की चिंता बढ़ जाती थी और गांव का नौजवान अक्सर एक ही सवाल पूछता था, “यहां काम मिलेगा या दिल्ली की ट्रेन पकड़नी पड़ेगी?”
आज तस्वीर कुछ अलग है। सड़कों पर पहले जैसी बेचैनी नहीं दिखती। कानून व्यवस्था को लेकर भरोसा बढ़ा है। एक्सप्रेसवे दौड़ रहे हैं, एयरपोर्ट चमक रहे हैं और निवेश के बड़े-बड़े ऐलान हो रहे हैं। लेकिन, असली सवाल फिर भी वहीं खड़ा है। क्या यह सिर्फ तस्वीर बदलने का मामला है, या उत्तर प्रदेश सचमुच छलांग लगा रहा है? यही सवाल इस समय सबसे दिलचस्प है।
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने कई मोर्चों पर बड़ा बदलाव देखा है। राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद करीब 13 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 36 लाख करोड़ रुपये बताया जा रहा है। प्रति व्यक्ति आय भी तीन गुने से ज्यादा बढ़कर 1.20 लाख रुपये के पार पहुंच गई है। यूपी अब देश की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है।
लेकिन, आंकड़ों की अपनी जुबान होती है और जिंदगी की अपनी। आगरा के किसी छोटे दुकानदार से पूछिए कि उसे बदलाव कैसा लगा। बुंदेलखंड के किसी नौजवान से पूछिए कि क्या उसे अपने गांव के पास नौकरी मिली। फिरोजाबाद के किसी कांच कारीगर से पूछिए कि उसकी मेहनत की कीमत बढ़ी या नहीं। इन जवाबों में शायद विकास की असली कहानी छिपी मिलेगी।
साल 2017 से पहले उत्तर प्रदेश की छवि अपराध, रंगदारी और राजनीतिक संरक्षण पाने वाले माफिया से गहराई से जुड़ी थी। कई परिवारों के लिए पुलिस और प्रशासन भरोसे का नहीं, मजबूरी का नाम था।
योगी सरकार ने कानून व्यवस्था को अपनी प्राथमिकता बनाया। सरकार के अनुसार हजारों इनामी अपराधी गिरफ्तार किए गए और माफिया की अरबों रुपये की संपत्तियों पर कार्रवाई हुई। अपराध में गिरावट और माफिया पर कार्रवाई को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाती है। इसका एक मनोवैज्ञानिक असर जरूर दिखाई देता है। निवेशक के लिए सड़क और बिजली जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भरोसा भी है कि उसका कारोबार किसी बाहुबली की जेब में नहीं जाएगा।
लेकिन, यहां भी एक सवाल बाकी है। क्या पुलिस कार्रवाई के साथ नागरिक अधिकार भी उतने ही मजबूत हुए हैं? क्या गरीब और कमजोर आदमी को भी वही इंसाफ मिलता है जो ताकतवर आदमी को मिलता है? बुलडोजर की तस्वीर प्रभावशाली हो सकती है, मगर लोकतंत्र की असली कसौटी निष्पक्ष कानून है।
योगी आदित्यनाथ जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उनके भगवा वस्त्र भी चर्चा का विषय बने थे। आलोचक पूछते थे, “एक संन्यासी अर्थव्यवस्था क्या चलाएगा?” समय ने इस सवाल का एक जवाब जरूर दिया है। संन्यास का मतलब हमेशा निष्क्रियता नहीं होता है। निजी मोह से दूरी कभी-कभी प्रशासन में कठोर फैसले लेने की ताकत भी दे सकती है। समर्थकों का कहना है कि योगी सरकार ने मंदिर और मठ की राजनीति से आगे बढ़कर सड़क, उद्योग, निवेश और राजस्व को भी शासन के एजेंडे में रखा।
लेकिन, सरकार की असली परीक्षा मठ में नहीं होती है। वह बाजार में होती है। कारखाने में होती है। खेत में होती है। स्कूल में होती है। अस्पताल में होती है। और सबसे ज्यादा उस घर में होती है, जहां बेरोजगार बेटा मां से पूछता है, “अम्मा, अब बाहर जाने की जरूरत तो नहीं पड़ेगी?”
साल 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में करीब 40 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों की घोषणा हुई थी। बाद में सरकार ने 2017 के बाद प्रस्तावित निवेश का आंकड़ा लगभग 45 से 50 लाख करोड़ रुपये तक बताया। इनमें से करीब 12 से 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं के जमीन पर उतरने या ग्राउंड-ब्रेकिंग होने का दावा किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, फार्मा, अक्षय ऊर्जा और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की योजनाएं सामने आई हैं।
सरकार का सपना 2029-30 तक यूपी को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है। सपना बड़ा है। हौसला भी बड़ा चाहिए। लेकिन, निवेश प्रस्ताव और चलती हुई फैक्ट्री के बीच वही फर्क है जो शादी के कार्ड और बारात में होता है। कार्ड छपना आसान है, बारात का पहुंचना थोड़ा मुश्किल।
इसलिए, अब असली सवाल है कि कितने कारखाने चालू हुए? कितने लोगों को स्थायी रोजगार मिला? कितने स्थानीय युवाओं को नौकरी मिली? और कितने निवेशक सरकारी फाइलों के जंगल से निकलकर उत्पादन की जमीन तक पहुंचे?
उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर इस बदलाव का दिलचस्प उदाहरण है। कानपुर, झांसी, चित्रकूट, लखनऊ, अलीगढ़ और आगरा इसके प्रमुख केंद्र हैं। बुंदेलखंड कभी सूखे, गरीबी और पलायन के लिए जाना जाता था। वहां का नौजवान अक्सर गांव छोड़कर दिल्ली, सूरत या मुंबई की ओर निकल जाता था। अब उसी इलाके में रक्षा उत्पादन और औद्योगिक निवेश की बातें हो रही हैं।
लखनऊ में ब्रह्मोस एयरोस्पेस की सुविधा शुरू होना भी इस नई तस्वीर का हिस्सा है। रक्षा उद्योग बढ़ता है तो उसके साथ छोटे कारखाने, तकनीकी प्रशिक्षण, परिवहन और स्थानीय कारोबार भी बढ़ सकते हैं। लेकिन, इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण किरदार मिसाइल नहीं, स्थानीय नौजवान है। अगर बुंदेलखंड के युवाओं को अपने ही इलाके में सम्मानजनक रोजगार मिलता है, तभी यह बदलाव सचमुच ऐतिहासिक कहलाएगा।
खजाना बेशक भर रहा है, मगर घर कितना सुधरा है? राज्य की अपनी कर आय में बड़ा इजाफा हुआ है। 2016-17 में अपना कर राजस्व करीब 86 हजार करोड़ रुपये था। अब यह दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है। जीएसटी, आबकारी और स्टांप शुल्क से भी राजस्व बढ़ा है। सरकार इसे बढ़ती आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय अनुशासन का परिणाम बताती है। बात सही भी हो सकती है। लेकिन, आम आदमी का सवाल बड़ा सीधा है। हुजूर, खजाना भर रहा है तो हमारी जिंदगी कितनी सुधरी?”
कर राजस्व तभी सार्थक है जब उससे अच्छी सड़क, साफ पानी, बेहतर अस्पताल, मजबूत स्कूल और सम्मानजनक रोजगार मिले। सरकारी खजाने की चमक तभी जनता के चेहरे पर दिखाई देगी। उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था केवल बड़े उद्योगपतियों से नहीं बनती है। इसे बनाने वाले हजारों छोटे हाथ हैं।
बनारस का बुनकर, मुरादाबाद का पीतल कारीगर, फिरोजाबाद का कांच मजदूर, आगरा का जूता कारीगर और लखनऊ का चिकनकारी कामगार। इनके हाथों में यूपी की पुरानी तहजीब भी है और नई अर्थव्यवस्था की उम्मीद भी। ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ ने इन स्थानीय उत्पादों को नई पहचान देने की कोशिश की है। सरकार के अनुसार लाखों कारीगरों को प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने का काम हुआ है।
मगर कारीगर की असली खुशी तब होगी जब उसके हुनर की कीमत बिचौलिये की जेब में नहीं, उसके अपने घर में पहुंचेगी। उसे उचित दाम चाहिए। सस्ता कच्चा माल चाहिए। बाजार चाहिए। और सबसे बढ़कर अपने काम पर भरोसा चाहिए।
जेवर का नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, यमुना एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और दूसरे बड़े संपर्क मार्ग उत्तर प्रदेश के बदलते ढांचे की तस्वीर पेश कर रहे हैं। सड़कें बेहतर होंगी तो उद्योग आएंगे। एयरपोर्ट बढ़ेंगे तो कारोबार बढ़ेगा। माल तेजी से पहुंचेगा तो यूपी का बाजार देश और दुनिया से ज्यादा जुड़ सकेगा। लेकिन, केवल सड़क बना देने से विकास नहीं आता है।
बिजली चाहिए। पानी चाहिए। कुशल श्रमिक चाहिए। साफ-सुथरा प्रशासन चाहिए। पर्यावरण की हिफाजत चाहिए। वरना, एक्सप्रेसवे चमकता रहेगा और उसके किनारे का गांव रोजगार की तलाश में धूल फांकता रहेगा।
योगी सरकार के समर्थक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश ने अपनी पुरानी छवि को पीछे छोड़ दिया है। उनके पास कानून व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश, राजस्व और रक्षा उत्पादन के आंकड़े हैं। विपक्ष और आलोचक दूसरी तस्वीर दिखाते हैं। उनका सवाल है कि रोजगार कहां है? महंगाई से राहत कितनी मिली? सरकारी स्कूल और अस्पताल कितने बदले? किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार और बेरोजगार युवा इस नई अर्थव्यवस्था में कहां खड़े हैं?
शायद सच इन दोनों तस्वीरों के बीच कहीं है। उत्तर प्रदेश बदल रहा है। यह बदलाव पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। सड़कें, एयरपोर्ट, उद्योग और प्रशासनिक संस्कृति में फर्क दिखाई देता है। कानून व्यवस्था को लेकर भी पहले की तुलना में एक नया आत्मविश्वास नजर आता है। लेकिन, मंजिल अभी दूर है, क्योंकि विकास की असली पहचान बड़े होर्डिंग नहीं होते हैं। विकास तब दिखाई देता है जब गांव का नौजवान मजबूरी में नहीं, अपनी पसंद से बाहर जाए। जब कारीगर को अपने हुनर की पूरी कीमत मिले। जब किसान को बाजार मिले। जब शहर में पैदल चलने वाला भी सुरक्षित महसूस करे। जब उद्योग आए तो नदी और हवा साथ-साथ बचें।
उत्तर प्रदेश की असली छलांग तब होगी जब विकास का स्वाद लखनऊ और नोएडा से निकलकर बुंदेलखंड, पूर्वांचल, ब्रज और गांव की चौपाल तक पहुंचेगा। तब कोई मां अपने बेटे से यह नहीं पूछेगी, “कब लौटोगे?” वह शायद पहली बार पूछेगी, “बेटा, अब यहीं काम मिल गया है न?” यही वह दिन होगा जब भगवा चोले से विकास की दौड़ तक पहुंची उत्तर प्रदेश की कहानी सचमुच पूरी होगी।

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