परिपक्व होते भारतीय लोकतंत्र में मतदाता तय कर रहे हैं एजेंडा


स्वतंत्रता के 75 सालों बाद अब भारत का लोकतंत्र परिपक्वता की ओर अग्रसर हो चुका है। अब से पहले जनता जाने-माने राजनीतिक चेहरों तथा आकर्षक नारों से प्रेरित होकर वोट देती रही है, लेकिन, मौजूदा चुनावी रुझानों का यदि आंकलन करें तो एक बड़ी संख्या में लोग राजनीतिक दलों द्वारा किए गए कार्यों की समीक्षा करके ही अपने मताधिकार का प्रयोग करते दिख रहे हैं।

हालांकि, जाति भी एक मुद्दा है लेकिन इसमें कुछ कमी आना दिखाई दे रहा है। यह स्पष्ट दिख रहा है कि जनता किसी भी प्रकार के प्रलोभन में न आने के लिए कटिबद्ध होती जा रही है।

नेताओं को भी जनता की इस बदलती मानसिक दशा का अहसास होना शुरू हो गया है। पुरानी परंपरा के अनुसार, सालभर पहले से ही अलग-अलग पार्टी के नेताओं ने अपने-अपने प्रदेशों में जनता को चुनावी रेवड़ियां देना शुरू कर दिया था, लेकिन, यह जनता की परिपक्वता ही है कि वह किसी भी प्रकार के प्रलोभन में फंसती हुई नजर नहीं आ रही है। 

लोकसभा के तीन चरणों का चुनाव समाप्त हो चुका है और आधे देश में चुनावी कार्य संपन्न हो चुका है। सरसरी तौर पर अब जनता का रुझान दिखाई देना भी प्रारम्भ हो गया है। अधिकांश लोग प्रासंगिक मुद्दों पर चिंतन करके ही मतदान करते दिख रहे हैं।

जनता जिस मुद्दे पर वोट करती हुई नजर आ रही है, उनमें पहला है स्थायी और भ्रष्टाचारमुक्त सरकार। जनता की अपेक्षा है कि केन्द्र में एक स्थायी व भ्रष्टाचारविरोधी सरकार का गठन हो। भारत जैसे देश के लिए यह अत्यधिक दुख का विषय है कि हम भारतवासी भ्रष्टाचार के क्षेत्र में विश्व के 180 देशों में से 93वें पायदान पर हैं। इस स्थिति में बदलाव के लिए ऐसे राजनेताओं की आवश्यकता है जो स्वयं भ्रष्टाचार से मुक्त हों। शीर्ष पर विराजमान नेतृत्व की कार्यशैली का ही अनुकरण अधीनस्थ नेता व अधिकारी करते हैं।

दूसरा मुद्दा है रोजगार। एक बड़ी संख्या में भारतीय युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करके भी रोजगारविहीन होकर भटक रहा है। जनता की अपेक्षा है कि आगामी सरकार युवाओं को रोजगार प्रदान करने वाली हो।

तीसरा मुद्दा है महिला उत्पीड़न को रोकना व अपराधों से सुरक्षा। देश की जनता को अपराधियों एवं भ्रष्टाचारियों पर कठोरता से कानूनी कार्रवाई करने में सक्षम सरकार की आवश्यकता है। वर्ष 2024 में देश की जनता को एक ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो कि महिला उत्पीड़न पर पूर्णतया नियन्त्रण स्थापित कर सके।

चौथा मुद्दा है चिकित्सा और शिक्षा के अवसर प्रदान करने वाली सरकार। जनता की मूलभूत आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान के पश्चात अन्य प्रमुख आवश्यकता चिकित्सा एवं शिक्षा की है। अतः जनता को एक समान चिकित्सा एवं रोजगारपूरक शिक्षा की सुविधा प्रदान करने में सक्षम सरकार ही चाहिए।

पांचवां मुद्दा है किसानों के हित को लेकर गंभीर सरकार। देश का किसान वर्ग सरकार से अपेक्षा कर रहा है कि आने वाली सरकार उनके हितों को गंभीरता से ले और उन पर ईमानदारी से काम करे।

छठवां मुद्दा है देश की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि। बेशक, देश दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, लेकिन प्रतिव्यक्ति आय का स्तर संतोषजनक नहीं है। इस मामले में हम भारतीय अपने पड़ोसी बांग्लादेश से भी नीचे यानी विश्व में 136वें पायदान पर हैं। आगामी सरकार से जनता यह अपेक्षा कर रही है कि वह प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की व्यवस्था करे।

सातवां मुद्दा है देश की न्याय प्रणाली। भारत की न्याय प्रणाली में कई त्रुटियां हैं। स्वतंत्रता से लेकर अब तक करोड़ों वाद न्यायालयों में लम्बित पड़े हैं। जनता को एक ऐसी सरकार चाहिए जो त्वरित न्याय दिलाने में सक्षम हो।

जनता की सरकार से आठवीं अपेक्षा यह है कि देश के कूटनीतिक मामले ऊंचाई के अगले पायदान पर पहुंचें। सीमाओं की दुश्मनों से रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम सेना व सैन्यतंत्र हो तथा पड़ोसी देशों से बेहतर व प्रभावी सम्बन्ध स्थापित हों।

जनता की आगामी सरकार से एक अन्य अपेक्षा यह भी है कि वह देश के औद्यौगिक विकास की दर में वृद्धि करे और सम्पूर्ण देश का विकास बिना किसी भेदभाव के करने में सक्षम हो। 

उपरोक्त सभी मुद्दों के अतिरिक्त कई ऐसे मुद्दे भी हैं, जिनके विषय में चिंतन करते हुए आज भारत की जनता अपने मत का प्रयोग कर रही है। आशा है कि आगामी 4 जून को जिस किसी दल की सरकार का गठन होगा, वह निश्चित रूप से भारत को विश्व के सम्मानित देशों की पंक्ति में अग्रणी स्थान दिलाने में सक्षम होगी।

(लेखक आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। यहां व्यक्त सभी विचार उनके स्वयं के हैं)



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