21 मई 1993 को आगरा की पानी की टोंटियों से मौत बह निकली थी। घटिया, खटीक पाड़ा और मंडी सईद खान की तंग गलियों में लोगों ने रोज़ की तरह वाटर वर्क्स का पानी पिया। कुछ ही घंटों में घरों में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों को उल्टियां और तेज़ बुखार होने लगा। पूरे परिवार अस्पतालों की तरफ भागे। 200 से ज़्यादा लोग बुरी तरह बीमार पड़े। दूषित पानी पीने से 21 लोगों की जान चली गई।
ग़ुस्सा बहुत था। वादे भी हुए। अफसरों ने जांच और जवाबदेही की बातें कीं। लेकिन, वक्त बीतता गया और शोर खामोशी में बदल गया। किसी को सचमुच सज़ा नहीं मिली। पीड़ित परिवार आज भी जवाब तलाश रहे हैं। गीता देवी जैसी महिलाएं, जिन्होंने इस हादसे में अपना पति खोया, आज भी कहती हैं कि गंदा पानी पाइपलाइनों से बहता रहता है।
यह त्रासदी सिर्फ गंदे पानी की नहीं थी। इसने भारत की पानी प्रबंधन, शहरों की योजना और सरकारी जवाबदेही की पुरानी लापरवाही को नंगा कर दिया। सिस्टम आगे बढ़ गया, मगर सबक पीछे छूट गया। अब 2026 में फिर एक खतरे की घंटी बज रही है। सवाल फिर डरावनी शक्ल में सामने खड़ा है। क्या हमने कुछ बदला भी है?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का आसमान पहले से थका हुआ दिखने लगा है। तपती गर्मी में धरती जगह-जगह फट रही है। गांवों के तालाब अब कीचड़ भरे गड्ढों जैसे लगते हैं। भैंसें सिकुड़ते पानी में चुपचाप खड़ी मक्खियां उड़ाती रहती हैं। किसान दूर आसमान को ऐसे देखते हैं जैसे कोई अधूरा वादा लौटने वाला हो।
यमुना भी अब थकी हुई लगती है। कई जगह नदी एक पतली, संघर्ष करती धारा में बदल गई है। कई इलाकों में भूजल स्तर 300 फीट से नीचे चला गया है। हैंडपंप हांफ रहे हैं। बोरवेल हर साल और गहरे खोदे जा रहे हैं।
चाय की दुकानों, अनाज मंडियों और गांव की चौपालों पर बातचीत का रंग बदल चुका है। किसान अब मुनाफे की नहीं, बचने की बात कर रहे हैं। डीजल महंगा हो रहा है। नहरें सूखी पड़ी हैं। पशुओं का चारा महंगा होता जा रहा है। गर्म हवा में बेचैनी तैर रही है।
भारत आज भी बारिश पर खतरनाक हद तक निर्भर है। देश की सालाना बारिश का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चार मानसूनी महीनों में आता है। आधे से ज्यादा खेत अब भी सिंचाई नहीं, बल्कि आसमान की मेहरबानी पर टिके हैं। एक कमजोर मानसून फसल बर्बादी, महंगाई, बेरोजगारी और गांवों की बदहाली ला सकता है। लेकिन, असली खतरा सिर्फ कम बारिश नहीं, बेतरतीब बारिश है।
एक जिला डूब सकता है, दूसरा प्यासा रह सकता है। देर से आने वाला मानसून, अचानक बादल फटना या लंबे सूखे दौर, कई बार पूरे सूखे से ज्यादा नुकसान करते हैं। खेती को कमी से ज्यादा अनिश्चितता डराती है। फिर भी भारत हर मानसून के पहले लगभग बिना तैयारी के खड़ा मिलता है।
नदियां गाद से भरी पड़ी हैं। झीलें और तालाब अतिक्रमण, कूड़े और कंक्रीट के नीचे गायब हो चुके हैं। गांवों की जीवनरेखा रहे पारंपरिक जल स्रोत दशकों से उपेक्षित पड़े हैं। वर्षा जल संचयन अब ज्यादातर भाषणों, सरकारी फाइलों और चमकदार सेमिनारों के बैनरों तक सीमित है।
विडंबना देखिए। हर मानसून में शहर कुछ घंटों की बारिश में डूब जाते हैं। सड़कें तालाब बन जाती हैं। पानी नालों में बहाकर बर्बाद कर दिया जाता है। फिर कुछ महीनों बाद वही शहर टैंकरों के पानी पर निर्भर हो जाते हैं। कुदरत दिल खोलकर देती है, मगर बदइंतजामी सब लूट लेती है।
उत्तर भारत का भूजल संकट अब खामोश खतरे में बदल चुका है। जरूरत से ज्यादा दोहन, कमजोर रिचार्ज सिस्टम और घटती बारिश ने जमीन के नीचे इमरजेंसी पैदा कर दी है। धरती को जितनी तेजी से खाली किया जा रहा है, उतनी तेजी से वह भर नहीं पा रही।
हल कोई रहस्य नहीं हैं। और नामुमकिन भी नहीं है। नहरों, जलाशयों और नदियों की तुरंत सफाई और गाद निकासी होनी चाहिए। गांवों के तालाब बचाए और दोबारा जिंदा किए जाएं। शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। किसानों को ड्रिप सिंचाई और सूखा सहने वाली फसलों के लिए मदद मिले। मनरेगा जैसी योजनाओं का इस्तेमाल जल संरक्षण के कामों में कहीं बेहतर तरीके से हो सकता है।
सरकारें ‘वॉर फुटिंग’ की बातें करती हैं, मगर हजारों गांवों में बुनियादी जल ढांचा टूटा या गायब है। बड़ी घोषणाएं सुर्खियां बनती हैं, जबकि जमीन पर रिसती पाइपलाइनें, सूखे हैंडपंप और मरते तालाब ही हकीकत बयान करते हैं।
आगरा के यमुना घाटों पर अच्छी बारिश के लिए विशेष प्रार्थनाएं शुरू हो चुकी हैं। आस्था मुश्किल समय में हौसला देती है। मगर सिर्फ दुआएं भूजल नहीं भर सकतीं, नहरें नहीं सुधार सकतीं और गंदी पाइपलाइनों को साफ नहीं कर सकतीं।
विज्ञान हमें पहले ही चेतावनी दे चुका है। अनुभव भी चेता चुका है। इतिहास भी अपना सबक दे चुका है। 1993 की आगरा जल त्रासदी को भारत की जल सुरक्षा और प्रशासनिक सोच बदल देनी चाहिए थी। लेकिन, वह भी सरकारी बेरुखी की धूल में दबा एक भूला हुआ अध्याय बन गई।

Related Items
हरित आंदोलन का हरा चश्मा और आगरा की धुंधली तस्वीर
नदियों के पानी की लहरों में छिपा है यूरोप का दिल!
तेजी से उभर रहा है भारत का सुपरकंप्यूटिंग परितंत्र...