जीणर्¨द्धार की बाट ज¨ह रही संत श्री नारायण स्वामी जी का समाधि स्थल

ब्रज क¢ रसिक संत श्री नारायण स्वामी जी का उपेक्षित पड़ा समाधि स्थल

ग¨वर्धन। रसिया क¨ नारि वनाब© री। कटि लहंगा उर माहिं कंचुकी, चुनरी सीस उडाव© री।। गाल गुलाल दृगन बिच काजर, बंेदी लाल लगाव¨ री। नारायण तारी बजाये कै, निकट यश©मति जाब©री।। ह¨री में लाज न कर ग©री। हम ब्रज क¢ रसिया तुम ग¨री,ली बनी है यह ज¨री।। ज¨ हम स©ं सूध्¨ नही ख्¨ल¨ं यार कंगे बरज¨री। नारायण अब निकस© द्वार प्©, छूट¨ नही बन क¢ ग¨री।।

 

ब्रज की यह प्रसिद्ध ह¨री किसी साधारण मनुष्य क¢ द्वारा रचित नहीं है। यह ह¨री ब्रज रस से अ¨त प्र¨त एवं ब्रज रस क¨ मूर्तीबान स्वरूप दिखाबे बारी लाह©र क¢ संमीप रावल पिंडी में सारस्वत ब्राह्मण कुल में सवंत् 1885 में जन्मे ब्रज क¢ रसिक संत श्रीनायारण स्वामी जी क¢ द्वारा रचित है।

 

कुसुम सर¨वर क¢ समीप इन्ही ब्रज सिक संत का समाधि स्थल जीणर्¨द्धार की बाट ज¨ह रहा है। किसी भी सरकारी व गैर सरकारी संस्था का ध्यान इस अ¨र कतई नही है, ऋतुराज वसंत का ब्रज प्रसिद्ध ह¨ली का उत्सब ह¨ अ©र स्वामी जी की रचित ह¨ली नही गाई जाये तो बृज रस आज भी कुछ फीका मालूम पडता है। आज बहुत से बृज क¢ प्रसिद्ध रासाचार्य एवं बृज क¢ कथा प्रवक्ता और संत श्री स्वामी जी की अक्षु अवल¨कित लीलाअ¨ं क¨ गाते है। अ©र श्र¨ताअ¨ं क¨ मंत्रमुग्ध कर देते है।

 

श्रीस्वामी जी 1955 में जब ग¨वर्धन पधारे अ©र गिरिराज जी की तीन ल¨क से न्यारी छटा क¨ देख अत्यधिक प्रसन्न हुए अ©र वह कहने लगे कि मैं त¨ यह मानता था कि प्रिय-प्रीतम का ज¨ सुख बृन्दावन में है वह सुख ब्रज में कहीं नही है। पन्तु वह जब गिरिराज ग¨वर्धन में आये त¨ उन्¨ने विश्¨ष सुख अनुभव ह¨ता है। उसी समय से स्वामी जी कुसुम सर¨वर के पास ही उद्धव जी की बैठक में अट्टालिका में रहने लगे। एक दिन की बात थी कि कुसुम सर¨वर पर प्रिय प्रियतम दृट्ठि ग¨चर हुए त¨ उनक¢ पीछ¢ पीछे द©डते ग¨वर्धन तक चले गये परंतु वह हाथ नही आये, अ©र थक हार कर एक इमली क¢ वृक्ष क¢ नीचे बैठ गये। जब उधर से ल©टते समय युगल सरकार क¨ जब देखा त¨ कुसुम सर¨वर तक आये अ©र र¨ र¨ कर क¢ स्वामी जी अपने हाल बेहाल कर लिया। प्र¨हित जी से कहा कि जब तक दर्शन नही ह¨ते तब तक उनकी बाते पूछने क¨ जी करता है। लेकिन दर्शन ह¨ने प न मालूम व¨ बाते कहा चली जाती है लेकिन मुख माधुर्य का पान करना ही श्¨ष रह जाता है। आज अत्यधिक आश्चर्य की बात है कि मात्र 75-80 वर्ष पूर्व हा¢ने वाले ब्रज क¢ अनुराग रस, गंभीर वाणी साहित्य क¢ धनी श्री स्वामी जी क¢ बारे में किसी साहित्यकार, श¨ध करता का ध्यान क्य¨ं नही गया। किसी लेखक की कलम ने भी एैसे रसिक संत क¢ बा में लिख कर यश प्राप्त नही किया। ब्रज क¢ विकास क¢ नाम पर अनेक¨ संस्थाऐं ब्रज का विकास कराने का डिडिम्ब घ¨ष कर रही है एवं पास में ही ब्रज क¢ प्रसिद्ध स्थल कुसुम सर¨वर क¢ लिए सरकार द्वारा पूर्व एवं वर्तमान में कर¨ड¨ं रूपये की धनराशि मुहैया कराई गई है। किंतु कुसुम सर¨बर पर ही उद्धव जी की बैठक क¢ पीछ¢ एक मात्र स्वामी जी की जीर्ण शीर्ण ह¨ चुकी समाधिस्त छतरी की तरफ किसी का ध्यान नही गया है।


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