
राजस्थान के कुम्हेर तहसील के छोटे से गांव पाउआ में सन 1920 में जन्मे स्वतं़त्राता सेनानी का जीवन विशेष कठनाइयों से गुजरा हुआ है जब भंवर सिंह चार वर्ष के थे। तो उनके माता पिता का निधन हो गया गंभीर परिस्थितियों में भंवर सिंह के मामा जोरावर राम इनको अपने साथ लेकर गोवर्धन आ गये मामा जोरावर ने भंवर सिंह को किशोर अनाथालय में सुपुर्द कर दिया। अनाथालय में अपने तीस अन्य साथियों के साथ मिडिल पास के उपरांत भवर सिंह ने सन 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और एक साल का काराबास व 50 रू जुर्माना अंग्रेजी हुकुमत को दिया। लेकिन इस सत्याग्रह से भंवर सिंह का जुनून भारत को आजाद कराने के लिऐ बढ़ता गया। और इस स्वतंत्राता सेनानी ने भारत के आजादी के जुनून को लेकर 25 जनवरी 1943 को अंग्रेजो भारत छोडो आंदोलन में भाग लिया। जहा पिफर एक बार अंग्रेजी हुकुमत की तानाशाही के चलते कठोर दण्ड के साथ साथ एक साल का पुनः जेल जाना पडा। इसके पश्चात स्वतंत्राता सेनानी भंवर सिंह राजस्थान के एक स्कूल में मास्टर हो गये दो साल तक बच्चों को विद्याअध्यन कराने के पश्चात सन 1946 में माहात्मा गांधी जी से मिलने के लिऐ गांधी सेवा आश्रम गऐ। जहां उन्होने सच्चाई और ईमानदारी का पाठ सीखा इसके पश्चात भंवर सिंह ने सन 1954 से 55 तक पंचायत सेकेट्री का कार्यभार सभाला लेकिन वहां के कुछ घूंस खोर अपफसरों की मनमानी के चलते सेकेट्री की नौकरी छोड दी इसके बाद सन 1957 में ब्रज गांव सेवा मण्डल खादी भण्डार में मेनेजर के पद पर तैनात रहे 1960 में गोवर्धन नगर पंचायत के अधिशाषी अधिकारी के पद पर कार्य किया और सन 1982 में सेवानिवृत हो गये।






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