मथुरा। जस्टिस फाॅर चिल्ड्रन के संयोजक एवं बाल कल्याण समिति सदस्य सतीश चन्द्र शर्मा ने कहा इस दिवस को मनाने का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की आवश्यकता को उजागर करना और बाल श्रम तथा विभिन्न रूपों में बच्चों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघनों को समाप्त करना है. खेलने कूदने के दिनों में कोई बालक श्रम करने को मजबूर हो जाय तो इससे बडी विडम्बना समाज के लिए हो नहीं सकती। बाल श्रम एक ऐसा सामाजिक अभिशाप है जो शहरो में, गाॅव में चारों तरफ मकडजाल की तरह बचपन को अपने आगोश में लिए हुए है। बाल श्रम से परिवारों को आय स्रोतों का केवल एक रेशा प्राप्त होता है जिसके लिए गरीब अपने बच्चों के भविष्य को इस गर्त में झोक देते है। वास्तव में बाल श्रम मानवाधिकारों का हनन है। मानवाधिकारों के तहत शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास का हक पाने का अधिकार प्रत्येक बालक को है। यह जानकर और आश्चर्य होता है कि खनन उद्योग, निर्माण उद्योगों के साथ साथ कृषि क्षेत्र भी ऐसा क्षेत्र है, जहां अधिकाधिक बच्चे मजदूरी करते हुए देखे जाते है। इन बच्चों को पगार के रूप में मेहनताना भी आधा दिया जाता है। बाल कल्याण समिति सदस्य सतीष चन्द्र शर्मा ने कहा ऐसा नहीं है कि बाल श्रम के निराकरण के लिए सरकारें चिन्तित न हों, लेकिन यह चिन्ता समाधान में कितनी सहयोगी साबित हुई है। यह मूल्याकंन का विषय है जिलाधिकारियों को आदेश दे रखें है कि वे बालश्रम को दूर करने के लिए हरसम्भव प्रयास करें। इसके लिए विशेष स्कूल संचालित किये जाये, बाल श्रमिकों के परिवारों हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाये एवं 18 वर्ष के पूर्व किसी भी दशा में उनसे मजदूरी न करायी जाये। इस सम्बन्ध में 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने भी श्रम विभाग को यह आदेश दिया है कि बच्चो को सामान्य कार्यो में 6 घण्टे से अधिक न लगाया जाये। उन्हें निर्धारित अवकाश के साथ कम से कम दो घण्टे जरूर पढाया जाये। यदि नियोजक ऐसे आदेशों की लापरवाही करें तो उस पर कम से कम 20000 रूपये का जुर्माना लगाया जाये, जो बच्चे के भविष्य के लिए उपयोग किया जाये हम यह भूल जाते है कि सब कुछ कानूनों एवं सजा से सुधार हो जायेगा लेकिन यह असम्भव है। हमारे घरों में, ढावों मे, होटलों में अनेक बाल मजदूर मिल जायेंगे, जो कडाके की ठण्ड या तपती धूप की परवाह किये वगैर काम करते है। लेबर आफिस या रेलवे स्टेशन के बाहर इन कार्यालयों में चाय पहुचाने का काम यह छोटे छोटे हाथ ही करते है और मालिक की गालिया भी खाते है। सभ्य होते समाज में यह अभिशाप क्यों बरकरार है। बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी न सिर्फ समाज व प्रशासन की है बल्कि समूचे समाज की है आॅर आपको कहीं भी बच्चों पर अत्याचार होते दिखाई दे तो बेझिझक 1098 पर फोन करके चाइल्ड हैल्प लाइन या बाल कल्याण समिति, बाल संरक्षण समिति को तुरन्त सूचित करें। आप चुप न बैंठे क्योकि आपकी आवाज किसी बच्चे को अत्याचार से मुक्ति दिला सकती है। यहां बाल श्रम से निपटने की दिशा में न सिर्फ नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है, बल्कि इसके लिए कार्यरत विभिन्न परियोजनाओं को वित्तीय सहायता आवंटित करने की भी जरूरत है इस देश से बाल मजदूरी मिटाने के लिए अधिक समन्वित और सहयोगात्मक रवैया अपनाने की सख्त आवश्यकता है।





