
वार्षिक भण्डारा सत्संग मेले के दौरान अनूठा सजा बाबा जय गुरूदेव का नाम योग साधना मन्दिर
मथुरा। जयगुरुदेव आश्रम में वार्षिक भण्डारा सत्संग मेले के दूसरे दिन सतीष चन्द्र जी ने श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुये कहा कि साधक को गुरु दरबार से सांसारिक चीजें नहीं मांगना चाहिये। संसारिक वस्तुएं प्रारब्ध के अनुसार मिलेंगी। आत्मकल्याण के लक्ष्य को आगे रखते हुये कर्म करना चाहिये और धीरे धीरे लोभ, मोह कम करते रहना चाहिये। अनेक जन्मों के पुण्य संचित होने के बाद हरि कृपा से सत्गुरु मिलते हैं। बाबा जयगुरुदेव जी ने जो रास्ता लोगों को बताया उसे नाम योग कहते हैं। इसमें गृहस्थ में रहते हुये मेहनत ईमानदारी के साथ नित्य कार्यों से निवृत्त होने के बाद बिस्तर पर सुबह शाम साधना करते रहना चाहिये। सन्त मत है सबसे आगे, पर कोई भाग्यवान ही जाने। आगे का अर्थ सुरतों के आदि देश सतलोक से है। शब्द मार्ग ऊपर से शुरू होता है। पिण्ड से अण्ड, अण्ड से ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड से पारब्रह्माण्ड और पारब्रह्माण्ड से सतलोक ले जाता है और अलख, अगम, अनामी पद में पहुंचाता है। वहां जाने का रास्ता केवल सन्तमत है। बाकी और जितने रास्ते साधना, उपासना के हैं वो अपने अपने स्थान पर सही हैं जिस प्रकार समुद्र के दूसरे तरफ के देशों में जाने का वायु मार्ग के अतिरिक्त कोई स्थल मार्ग नहीं है, उसी प्रकार सतलोक केवल नामयोग से ही पहुंचा जा सकता है। सन्त शब्द का वर्णन केवल कबीर साहब के आने के बाद के ग्रन्थों में मिलता है। सन्त हाड़ मांस के षरीर में दिखाई पड़ते हैं लेकिन उनको बोध होता है। बोध में जन्म लेते हैं और बोध के साथ शरीर छोड़ते हैं। डा0 करुणाकान्त जी ने रामायण की पंक्ति ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन कमल सहस सुखरासी को उद्धृत करते हुये कहा कि जीवात्मा चेतन है और ईष्वर की अंश है। इसकी बैठक मनुष्य शरीर में दोनों आंखों के मध्य भाग में पीछे ऊपर की तरफ है। उसको चारों तरफ से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार घेरे हुये हैं। जड़ शरीर में कर्मों के कारण इसको बन्द कर दिया गया और उसके ऊपर पाप, पुण्य की गन्दगी जमा हो गई है। जिससे उसके आंख, कान, नाक बन्द हो गयें। जिसके कारण अपना बोध नहीं होता है और हम अपने मालिक को भूल गयें। यह आपका सौभाग्य है कि प्रकट सन्तों के समय आपको मानव तन मिला। उनकी खोज करना चाहिये और उनसे रास्ता लेकर, उनके बताये हुये तरीके से साधना कर अपनी जीवात्मा को मालिक के घर सतलोक पहुंचा दें। यह धरती कल किसी और की थी, आज आपकी है, कल किसी और की होगी। शरीर देखते देखते इसी मिट्टी में मिल जाता है।






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