जब घरों में यादें ताला लगाकर रखी जाती थीं…


कभी घर सिर्फ ईंट और छत नहीं होते थे, यादों के गोदाम होते थे। उन यादों की रखवाली करते थे, कई भारी-भरकम ट्रंक और खनखनाते कनस्तर।

दिल की गहराइयों में आज भी वह पुराना ट्रंक चुपके से सांस लेता है। भारी, जिसके ऊपर पेंट से परिवार का नाम लिखा होता था “शर्मा परिवार, आगरा”। उसकी सलवटें, उसकी जंग लगी कुंडियां और वो मीठी-सी पुरानी  खुशबू… हर बार ढक्कन खोलते ही बचपन की गर्मियां लौट आती थीं। फौजी और रेलवे के गार्ड बाबू अभी भी काले चद्दर के बक्से का उपयोग करते हैं।

घर के अंदर बड़े संदूकों में कपूर की सफेद गोलियां नीम के पत्तों के साथ सोई रहतीं। गर्मियों के हल्के सूती कपड़े एक तरफ, सर्दियों की ऊनी रजाइयां और गद्दे दूसरी तरफ। शादी-ब्याह के मौके पर वह ट्रंक जादू की तरह खुलता; चादरें, गद्दे, रजाइयां निकलतीं और पूरा संयुक्त परिवार एक साथ हंसता-बोलता सज जाता। ट्रंक कभी पढ़ने की मेज बन जाता, कभी सोफा, कभी रेडियो का सिंहासन।

एक होता थे बिस्तरबंद, होलडोल, लेदर बेल्ट से कसकर बांधना, चादरें, रजाई, गद्दे कायदे से ज़माना, फिर खींच के टाइट करना, यह एक आर्ट थी जिसमें हर कोई माहिर नहीं होता था। आजकल तो यह प्रथा समाप्त हो चुकी है।

छुट्टियों में जब पूरा कुनबा स्टेशन पहुंचता, कुली सिर पर होल्डॉल और ट्रंक रखे, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही लिए आगे-आगे चलता। सीट न मिलने पर बच्चे ट्रंक पर ही बैठकर खिड़की से बाहर उड़ते बादलों को गिनते। दादी मां उसी ट्रंक में खोया-पाया, पुरानी चिट्ठियां, थैले और हर जुगाड़ संभालकर रखती थीं। हर बच्चे का अपना छोटा ट्रंक; लड़कियों की गुड़िया, चूड़ियां और गुप्त डायरी।

फिर आता कनस्तर। चमकता हुआ टिन का, जिसमें दादी छिपाकर लड्डू-मठरी रखतीं। चूहे डर के मारे भागते। गेहूं, आटा, गुड़, चीनी… कई महीनों का वारदाना उसमें सोया रहता। इमरतबान में आम का मीठा आचार और नींबू की खट्टी खुशबू घर भर में फैलती रहती थी।

आज अलमारी और पहिए वाले सूटकेस आ गए। दिल छोटे हो गए। न ट्रंक की वह गरिमा बची, न कनस्तर की वो मासूमियत। बच्चे अब बिस्तरबंद और होल्डॉल का नाम भी नहीं जानते।

ट्रंक… लोहे का, हरे या नीले रंग का, ऊपर सफेद पेंट से लिखा नाम। जैसे कोई पहचान पत्र। हर घर में एक नहीं, कई ट्रंक। छोटा, बड़ा, दहेज वाला, बच्चों वाला। खोलते ही खुशबू उड़ती थी। सर्दियों के स्वेटर, गर्मियों की मलमल, तह करके रखीं साड़ियां, जैसे मौसम भी उनमें सांस लेता हो।

पुराने ज़माने के सख्त मास्साब रघुनाथ प्रसाद यादों के समंदर में खो जाते हैं, "संयुक्त परिवार की धड़कन थे ये ट्रंक। शादी-ब्याह का मौसम आता, तो वही ट्रंक गद्दे, रजाई, चादरों से भर उठते। मेहमान आते, तो वही ट्रंक मेज बन जाता। रेडियो उस पर सजता, बच्चे उस पर उछलते, और बड़े उस पर बैठकर किस्से बुनते। ट्रंक कोई चीज़ नहीं था, घर का चुपचाप खड़ा बुजुर्ग था।"

सुशीला ताई कहती हैं, "छुट्टियां आतीं, तो ट्रंक का असली सफर शुरू होता। ट्रेन की सीट कम पड़ जाए, तो बच्चे उसी पर बैठ जाते। साथ में होल्डोल, कसकर बांधा हुआ बिस्तरबंद, और एक सुराही, जिसका पानी रास्ते भर मीठा लगता था। स्टेशन पर कुली सिर पर ट्रंक, कंधे पर बैग, हाथ में सुराही, और पीछे हमारा भरपूर परिवार, जैसे कोई चलता-फिरता जुलूस हो।"

दादी का ट्रंक तो जैसे खजाना था। खोया-पाया, पुराने खत, टूटे खिलौने, और अचानक जरूरत पड़ने पर निकल आने वाले थैले, सब उसी में। हर सवाल का जवाब, हर कमी का जुगाड़, उसी ट्रंक के भीतर छिपा होता था।

कभी-कभी लगता है, उन ट्रंकों में सिर्फ कपड़े नहीं, रिश्ते तह करके रखे जाते थे। कनस्तर में सिर्फ अनाज नहीं, घर की खुशहाली बंद होती थी। आज सब खुला है, सब उपलब्ध है, फिर भी कुछ कमी सी है।

शायद सच यही है: घर सिकुड़ गए, सामान सिमट गया, और दिल भी थोड़े छोटे हो गए। ट्रंक, कनस्तर और इमरतबान चले गए… और साथ ले गए एक पूरा जमाना, जो अब सिर्फ यादों में धीरे-धीरे खनकता है।



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