मथुरा। पूरे विश्व के लगभग 88 देशों में रहने वाले तकरीबन 350 मिलियन लोगों में कालाजार बीमारी के जोखिम है और लगभग 50 लाख लोग इस जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं। यह रोग दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में बहुत हीं आम है, लगभग 200 मिलियन लोगों के इसकी चपेट में आने का खतरा है। भारत में लगभग 165 मिलियन लोगों को कालाजार होने का जोखिम है। एक सर्वे के अनुसार देश में एक लाख मामले हर साल कालाजार के सामने आते हैं। जिनमें से लगभग प्रत्येक वर्ष 200 रोगी कालाजारी की बीमारी से मौत के मुंह में चले जाते हैं। इस बीमारी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह जानकारी केडी मेडिकल कालेज, हॉस्पीटल एवं रिसर्च सेंटर अकबरपुर मथुरा में आयोजित देश में बढती कालाजार बीमारी पर एक परिचर्चा कालेज के महिला एवं बाल रोग विभाग में आयोजित सेमिनार में बालरोग विशेषज्ञ डॉ़ डीके जुनेजा ने व्यक्त करते हुए दी। उन्होंने बताया कि कालाजार एक घातक संक्रमण है जो एक परजीवी के कारण होता है। कीट के काटने से यह एक व्यक्ति से दूसरे में फैल जाता है। उन्होंने बताया कि काला अजार या आंत लीशमनियासिस एक घातक संक्रमण होता है जो परजीवी प्रोटोजोआ लीशमनिया डोनोवनी के कारण होता है। यह एक संक्रमित व्यक्ति से, संक्रमित स्त्री जाति की सेंड मक्खी के काटने से, दूसरे स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकता है जिसका नाम फ्लेबोटोमस अर्जेन्टाप्सि है। स्त्री रोग विभाग की एमएस डॉ़ उषा वत्स ने कालाजार बीमारी से ग्रसित व्यक्ति या महिला को यदि उनमें अनियमित रूप से बुखार आते जाते रहते हैं जिसके साथ कोई जरुरी नहीं है कि किसी प्रकार की कठोरता या ठंड जुड़ा हुआ हो। कुछ रोगियों का वजन कम हो सकता है तथा हाइपरगामाग्लोब्युलिनेमिया के साथ हाइपोअल्ब्युनेमिया हो सकता है। स्त्री रोग चिकित्सक डॉ़ हसना हना चौधरी ने बताया कि काला अजार को अक्सर लोग मलेरिया, टाइफाइड या तपेदिक समझने की भूल कर बैठते हैं क्योंकि इनके लक्षण और बाकी रोगों के लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं। कुछ रोगियों को अन्य दूसरी बीमारियों के साथ काला अजार भी हो जाता है। संगोष्ठी की अध्यक्षता आरके ग्रुप के चेयरमैन डॉ़ रामकिशोर अग्रवाल, डायरेक्टर मनोज अग्रवाल ने की।





