‘रहें न रहें हम… महका करेंगे…’

प्रमोद कुमार पांडेय सुचित्रा सेन नहीं हैं३ अभिनय की सुंदरता नहीं है! ष्प्रियो बांधबीष् नहीं हैं। ष्देवदासष् की ष्पारोष् नहीं हैं। जी हांए अप्रतिम सौंदर्य और अभिनय की मिठास मृगनयनी सुचित्रा सेन बांग्ला सिने प्रेमियों के दिलों की रानी थीं। हिंदी सिनेमा जगत में भी उनकी बेहद लोकप्रियता थी।

सुचित्रा ने 1952 में बांग्ला फ़िल्म ष्शेष कोथायष् से अपना सिने करियर शुरू किया और आगे चलकर अनेक मशहूर फ़िल्में कीं। बांग्ला सिनेमा की विशिष्ट अभिनेत्री होने के साथ हिंदी सिनेमा में भी लोकप्रिय रहीं। लोगों की स्मृतियों में उनकी अदाएं स्थायी रूप से अंकित हो गई हैं।

हिंदी फिल्मों की बात करें तो विशिष्ट फिल्मकार बिमल रॉय की मशहूर फ़िल्म ष्देवदासष् में उन्होंने पारो का किरदार निभाया। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार देवदास की भूमिका में थीं। ष्देवदासष् में अभिनय के लिए उन्हें  राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था।

1978 में रिलीज़ हुई बांग्ला फ़िल्म ष्प्रनॉय पाशाष् के बाद उन्होंने फ़िल्मों से संन्यास ले लिया। इसके बाद वह सार्वजनिक जीवन से दूर हो गईं। अक्सर उनकी तुलना हॉलीवुड की ग्रेटा गार्बो से की जाती थीए जिन्होंने लोगों से मिलना.जुलना छोड़ दिया था। लम्बे समय तक सक्रिय नहीं रहने के बावजूद वह हमारी स्मृतियों में बनी थीं। लोग उन्हें चाहते थे। उनकी फिल्मों को याद करते थे।

सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक लोगों के दिलों पर राज किया और ष्अग्निपरीक्षाष्ए ष्देवदासष् तथा ष्सात पाके बंधाष् जैसी यादगार फिल्में कीं। उन्होंने कुल 60 फ़िल्मों में काम किया। 53 बंगाली और सात हिंदी फ़िल्मों में।

कहते हैं कि सुचित्रा सेन भारतीय सिनेमा इतिहास की पहली अभिनेत्री थीं जिन्होंने अपनी पहली फ़िल्म उस समय की जब वह एक बच्ची की माँ बन चुकी थीं।

बंगाल में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि दुर्गा पूजा के अवसर पर लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियों को उनकी शक्ल देने की कोशिश की जाती थी। चाहे उनका साड़ी बांधने का अंदाज़ हो या बाल काढ़ने का ढंग और धूप का चश्मा पहनने की अदा युवाओं में और सिने प्रेमियों में उन्माद की हद तक लोकप्रिय थी। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि उन्होंने महान फिल्मकार भारत रत्न सत्यजीत राय का उनके साथ काम करने का न्योता सिर्फ़ इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनकी शर्तें उनसे मेल नहीं खाती थीं।

कहते हैं कि हिंदी फ़िल्म ष्आंधीष्  में उनके निर्देशक कवि.गीतकार.फिल्मकार गुलज़ार तफ़रीह मेंए उन्हें हमेशा ष्सरष् कह कर पुकारा करते थे क्योंकि फ़िल्म की शूटिंग के दौरान बहुत वरिष्ठ होते हुए भी सुचित्रा गुलज़ार को ष्सरष् कहा करती थीं। अधिकतर फ़िल्मों में उन्होंने कामकाजी स्त्री की भूमिका को निभायाए हालांकि उस समय महिलाओं का बाहर काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था। ष्सप्तापदीष् में वह एक आर्मी नर्स थीं३ ष्हरानो सुरष् में उन्होंने एक डॉक्टर की भूमिका निभाई थी। ष्जीबन तृष्णाष् में वह कलाकार बनीं और ष्आंधीष् में उन्होंने एक राजनीतिज्ञ के रोल को बख़ूबी निभाया।

कहा जाता है कि सुचित्रा को एक फ़िल्म के लिए उस समय एक लाख रुपये की फ़ीस दी जाती थी और कई बार उनके नायक की पारिश्रमिक उनसे कम हुआ करती थी। 1962 में ष्बिपाशाष् में काम करने के लिए उन्हें एक लाख रुपये मिले थे जबकि उत्तम कुमार को सिर्फ़ अस्सी हज़ार रुपयों से संतोष करना पड़ा था।

ष्बिपाशाष् की खास सफलता के बाद उन्होंने यकायक अपनी फ़ीस डेढ़ लाख कर दी थी। स्क्रीन पर उत्तम कुमार के साथ उनकी जो कैमिस्ट्री थीए वह अप्रतिम जोड़ी के रूप में मशहूर है। उत्तम कुमार अकेले ऐसे शख्स थे जो उन्हें उनके असली नाम ष्रोमाष् से पुकार सकते थे। वह एक दूसरे को ष्तुईष् ;तूद्ध कहकर भी पुकारते थे। वे अच्छे दोस्त थे। ष्प्रियो बान्धबी थींष् वह।

जिस तरह से सुचित्रा सेन के जाने के बाद मीडिया सहित तमाम जगह उनकी चर्चा हुई। लोगों ने उन्हें ष्मिसष् किया। इससे उनकी जनप्रियता का प्रमाण मिलता है। लोगों के दिलों में उनका स्थायी प्रभाव बना हुआ है।

सुचित्रा सेन का कलात्मक कृतित्व भारतीय सिनेमा में जगमगाता रहेगा। उनकी कृतियां हमारे मन.प्राण को झंकृत करती रहेंगी। वह रहेंगी जीवन के साथ३ जीवन में उल्लास बनकर। सुचित्रा भारतीय सिनेमा इतिहास में बनी रहेंगी हमेशा.हमेशा३

;समीक्षा भारती न्यूज सर्विसद्ध


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