सुनील शर्मा
रंग गुलाल का अनूठा पर्व होली का त्यौहार अपने देश में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है जिसमें ब्रज की होली अपने आप में अनूठी होली होती है। यहां की होली अनौखी परम्पराओं के लिए पूरे देश में लोकप्रिय है।
ब्रज की होली की शुरूआत बसंत पंचमी से शुरू होकर चैत्र कृष्ण दशमी तक पूरे पचास दिनों तक चलती है समूचे ब्रज मण्डल के कण-कण में उल्लास और आनंद की अनुभूति की जा सकती है चैत्र कृष्ण द्वितीया से चैत्र कृष्ण पंचमी तक ब्रज में होली अपने पूर्ण यौवन पर होती है।
ब्रज के सभी मंदिरों में भगवान के श्री विग्रहों के साथ नित्य प्रति गुलाल लगाकर श्रृंगार किया जाता है। जगह-जगह होली का ढाड़ा गाड़ दिया जाता है शिवरात्रि के दिन ढप-ढोल के साथ रसिया गायन की परम्परा भी है। भंग और ठण्डाई की मस्ती में डूबे हुए लोगों को जगह-जगह देखा जा सकता है। इसके बाद भंग ठण्डाई का असर लोगों में देखने को मिलता है। इसी मस्ती में हुरिहारें गाते-बजाते टोलियों में निकलते है।
‘‘आज बिरज में होरी रे रसिया
होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया’’

होली की शुरूआत फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन मथुरा मांट मार्ग पर मथुरा से 18 किलोमीटर दूर स्थित मानसरोवर गांव में लगने वाला राधारानी के मेले से शुरू होता है।
फाल्गुन शुक्ला नवमी के दिन बरसाना में नंदगांव हुरियारे और बरसाने की हुरियारियों के साथ विश्व प्रसिद्ध लठामार होली का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। लठामार होली में नंदगांव के रहने वाले गुसाई परिवार के लोग बरसाने में आते है और बरसाने की गापिकाओं के साथ होली खेलते हैं। यहां नंदगांव के गुसाईयों को श्रीकृष्ण के प्रतीक स्वरूप में मानते हैं और बरसाने की गोपिकाओं के मध्य प्रेमभरी गालियों के साथ सम्मानित करने की परम्परा भी निभाई जाती है। यहां पर आपस में टेसू के फूलों के रंगों का प्रयोग किया जाता हैं। रंगों की बौछार और संगीत की मधुरता के बीच गोपिकाएं अपने-अपने घंूघटों की ओट के मध्य नंदगांव के हुरिहारों पर प्रेमभरी लाठियों की बौछार करती है।
नंदगांव के हुरियारे भी रसिया गा-गाकर अपनी ढाल पर उनकी लाठियों की मार को रोकने का प्रयास करते रहते हैं। लाठियों की बौछार कोई दिखावे मात्र को नहीं होती हैं।
अगले दिन फाल्गुन शुक्ला दशमी के दिन ठीक इसी प्रकार से बरसाने के गुसाई लोग नंदगांव में जाते है वहां पर भी ठीक इसी प्रकार की होली खेली जाती है।
रंग भरनी एकादशी के दिन सम्पूर्ण ब्रज में होली की धूममची होती है। सभी मंदिरों में रंग-गुलाल इत्र, केवड़ा और गुलाब जल आदि से होली खेली जाती है। एकादशी से पूर्णमासी के दिन तक पांच दिन वृंदावन स्थित ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में गुलाल, टेसू के रंग और इत्र गुलाब जल से यहां दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं पर मंदिरों के गोस्वामिओं द्वारा रंग डाला जाता है। रंग और गुलाल की वर्षा होती है। आनंद उल्लास के साथ-साथ भक्ति श्रद्धा में लोग डूब जाते है।
मथुरा से 53 किलोमीटर दूर व कोसीकलां से मात्र 9 किलोमीटर दूर छाता तहसील के छोटे से गांव फालैन में लगभग तीस फुट व्यास में और 25 फुट ऊंची होली सजाई जाती है। इस विशालकाय होली में यहां का पण्डा प्रहलाद मंदिर में लगभग एक माह से पूजा पाठ करता है और माला लेकर जप करता रहता है। जिस समय वह वहां रखे दीपक की लौ में शीतलता का आभास करता है उसके बाद मंदिर से निकलकर निकट बने कुण्ड में स्नान करके आता है उसी बीच उसकी बहन द्वारा होली को करुए (मिट्टी के पात्र) से जल देती है उसके बाद पण्डा विशाल जलती होली के बीच से होकर कूदते-फांदते हुए पार कर जाता है। कुछ इसी प्रकार मथुरा से 52 किलोमीटर दूर बसा छाता तहसील का जटवारी गांव में भी विशाल होली के मध्य से नंगे पांव जलती होली से निकलता है। इन दोनों स्थानों पर होने वाली होली किसी चमत्कार से कम नही है।
सुनील शर्मा 09319225654





