बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

क्या हम अपने बच्चों के लिए एक हरा-भरा भारत छोड़ेंगे, या धूल, धुएं और सूखी नदियों का देश? यह सवाल आज किसी पर्यावरणविद् की चिंता भर नहीं है। यह आगरा की यमुना के किनारे खड़े हर नागरिक का सवाल है। यह हिमालय की गोद में बसे गांवों की चिंता है। यह उन लाखों लोगों का डर है जो हर सर्दी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं...

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सावित्री देवी को वह शाम आज भी याद है जब उनकी बेटी ने किताब पढ़ते समय आंखें सिकोड़ना बंद कर दिया था। उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव में वर्षों तक बारह साल की प्रिया मिट्टी के तेल की ढिबरी के सामने बैठकर पढ़ती थी। पीली, कांपती हुई लौ। धुएं से भरा कमरा। आंखों में जलन। कई बार तेल खत्म हो जाता और पढ़ाई भी। फिर, पिछले साल उनकी छत पर एक सौर पैनल लग गया...

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यदि किसी दिन आपको पता चले कि आपके शहर की आबादी लाखों बढ़ गई है, स्कूलों में सीटें कम पड़ रही हैं, अस्पतालों में कतारें लंबी होती जा रही हैं, मजदूरी घट रही है और सरकारी योजनाओं का बोझ लगातार बढ़ रहा है, तो क्या आप इसे महज संयोग मानेंगे?

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आज रात खाने में क्या बनेगा? यह सवाल शायद दुनिया का सबसे साधारण सवाल है। हर घर में पूछा जाता है। कभी प्यार से, कभी शिकायत के साथ, कभी मज़ाक में। लेकिन, अगर यही सवाल किसी की जान ले ले तो?

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"हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जिसका इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया हो... हर मामले को अदालत में घसीट लिया जाता है... इस देश में ऐसी याचिकाएं सिर्फ़ विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दाखिल की जाती हैं।" ये तीखी टिप्पणियां गत 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने कीं, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे। मामला गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार और आधुनिकीकरण की पर्यावरण मंज़ूरी को चुनौती देने वाली याचिका का था...

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आगरा के पास उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे में 1970 के दशक में स्कूल मास्टर रघुनाथ प्रसाद सुबह अंधेरे में उठते थे। घर में न बिजली का भरोसा था, न नल में पानी आता था। लालटेन की रोशनी में बच्चे पढ़ते थे। राशन की दुकान पर लाइन लगती थी। साइकिल या बैलगाड़ी ही सफर का सहारा थी। बीमारी में डॉक्टर मिल जाए, तो गनीमत समझिए। टेलीफोन किसी बड़े साहब के घर दिखता था...

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